Spirit of a Fighter – Chapter 56
मेरा दिल धक से रह गया।
"कब से?"
"कल शाम से। मैंने दरवाज़ा खटखटाया, कोई जवाब नहीं आया। फिर गुड़िया आई, बोली माँ सो रही हैं। पर बेटा, सोने वाला आदमी चूल्हा क्यों नहीं जलाता?"
मैं दौड़ा। टिंकू मेरे पीछे भागा। सुक्खी बुआ की आवाज़ पीछे रह गई — "क्या हुआ? मैंने कुछ गलत कह दिया?"
आँगन का दरवाज़ा खुला था। चक्की वहीं खड़ी थी, पर उस पर आटा नहीं, धूल जमी थी। माँ की चप्पल दरवाज़े के बाहर पड़ी थी, एक उलटी, एक सीधी।
"माँ!" मैंने अंदर जाकर आवाज़ दी।
कोई जवाब नहीं।
रसोई में चूल्हा ठंडा था। तसलों में पानी सूखा हुआ था। माँ कमरे के कोने में, चटाई पर, दीवार से टिककर बैठी थीं। उनका सिर झुका हुआ था और माथे का हल्दी का टीका पसीने से फैल गया था।
"माँ!"
वो धीरे से सिर उठाया। उनकी आँखें लाल थीं, पर पानी नहीं था। जैसे कोई बहुत देर तक रोया हो और अब आँसू सूख गए हों।
"आ गया?" उन्होंने कहा। आवाज़ ऐसी जैसे किसी ने गला दबाकर रखा हो।
"माँ, तुम ठीक हो?"
"मैं ठीक हूँ।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा और उनकी नज़र मेरे हाथ पर जाकर रुक गई। फिर वो कुछ नहीं बोलीं। बस उठीं, चूल्हे के पास गईं, उसमें से राख निकाली और मेरे सामने आकर बैठ गईं।
"हाथ दो।"
"माँ, ये कुछ नहीं—"
"हाथ दो," उन्होंने दोहराया।
मैंने हाथ आगे किया। उन्होंने पट्टी खोली। खून सूखकर काला पड़ गया था, पर कटाव गहरा था — तीन उँगलियों जितना लंबा। माँ ने एक पल उसे देखा, फिर राख उठाकर घाव पर रखी।
राख गरम थी। मेरी साँस रुक गई।
वो राख को उँगली से फैलाने लगीं — बहुत धीरे, बहुत सावधानी से, जैसे कोई पुरानी चीज़ मरम्मत कर रहा हो। फिर उन्होंने मेरा हाथ अपने दोनों हाथों में लिया। उनके हाथ चक्की से सख्त थे, पर उनकी पकड़ में वो नरमी थी जो सिर्फ़ माँ के हाथ में होती है।
और फिर उन्होंने घाव पर फूँक मारी।
एक लंबी, धीमी फूँक। जैसे बचपन में घुटने पर लगी चोट पर मारती थीं। जैसे कोई ठंडी हवा ज़ख्म के अंदर तक जाती हो।
मेरी आँखें भर आईं। मैंने तेज़ी से दूसरी तरफ़ देखा, पर माँ ने देख लिया। वो कुछ नहीं बोलीं। उन्होंने बस मेरा हाथ छोड़ा और कहा —
"जो काम डर से छुपाकर किया जाए, वो कभी पूरा नहीं होता।"
"माँ—"
"मुझे बताने की ज़रूरत नहीं," उन्होंने कहा। "मुझे पता है। रात को मैं जाग रही थी। दरवाज़ा खुला था और तेरा पलंग खाली था।"
मैं चुप रहा।
"मैंने सोचा — अगर मैं रोकने गई, तो तू ये काम छुपाकर करेगा। और छुपाकर किया काम आधा रहता है। इसलिए मैं बैठी रही।"
"तुम्हें पता था मैं कहाँ गया था?"
"मुझे पता था कि तू वहाँ गया जहाँ तेरे पापा जाते थे।" उन्होंने राख की आखिरी लकीर घाव पर खींची। "रघुवीर भी रातों को उठकर अखाड़े जाता था। मैं उस वक़्त भी बैठी रहती थी। मैंने कभी नहीं रोका।"
"तो फिर तुम रोई क्यों?"
माँ ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में वो चीज़ थी जो शब्दों से नहीं आती।
"मैं नहीं रोई, बेटा। मैं सिर्फ़ रात भर यही सोचती रही कि तेरे पापा ने भी राख लगाई थी, और फिर देखा — राख घाव भर देती है, पर उस आदमी को नहीं भर पाई जिसने घाव दिया।"
मैंने सिर झुका लिया।
टिंकू दरवाज़े पर खड़ा था, आधा अंदर आधा बाहर। माँ ने उसकी तरफ़ देखा।
"तू भी आ जा, टिंकू। तेरी टोपी फटी है और तेरे होंठ सूखे हैं। बैठ, पानी पी।"
टिंकू की आँखें भर आईं। "माँ—"
"माँ मत बोल, बैठ जा।" वो उठीं और तसले से पानी लेकर आईं। "तुम दोनों ने रात भर में जो किया है, वो मुझे नहीं पता। पर एक बात जान लो — अब आगे जो होगा, वो अंधेरे में नहीं होगा। सबके सामने होगा।"
"माँ," मैंने धीरे से कहा, "भैरव दो आदमी लेकर लौटा है। शहर से।"
माँ का हाथ पानी के लोटे पर रुक गया।
"कैसे पता?"
"सुक्खी बुआ ने बताया।"
माँ ने लोटा टिंकू को दिया और दीवार से टिककर खड़ी हो गईं। उनका चेहरा शांत था, पर उनकी उँगलियाँ उनकी साड़ी का पल्ला दबा रही थीं।
"शहर से आदमी लाने का मतलब सिर्फ़ एक होता है," उन्होंने कहा। "वो यहाँ लड़ने नहीं आया। वो यहाँ कुछ ऐसा करने आया है जिसमें गवाह की ज़रूरत न हो।"
मैं समझ गया। मेरे पेट में ठंडा लगा।
"वो गाँव वालों को सामने रखेगा," मैंने कहा। "अगर कुछ होगा, तो सब देखेंगे कि वो बेकसूर था।"
"तू ठीक कहता है," माँ ने कहा।
तभी बाहर गुड़िया की आवाज़ आई। स्कूल की घंटी बज चुकी थी और उसकी छुट्टी हो गई थी।
"भैया! माँ!"
वो अंदर घुसी, बस्ता दरवाज़े पर पटका। फिर उसकी नज़र मेरे हाथ पर पड़ी — राख से ढका घाव, और उसके नीचे लाल पट्टी का किनारा।
उसका चेहरा एक पल में बदल गया। वो कुछ नहीं बोली। बस मेरे पास आकर मेरा हाथ दोनों हाथों से पकड़ लिया और उसे देखने लगी।
फिर उसका मुँह टेढ़ा हो गया और आँसू टप-टप गिरने लगे — तेज़, बिना आवाज़ के, जैसे छोटी बच्ची के आँसू होते हैं जो रोना नहीं चाहती पर रुक नहीं सकती।
"गुड़िया—"
"किसने किया?" उसने कहा, आवाज़ी फटी हुई।
"कोई नहीं, मैं गिर गया।"
"झूठ!" उसने मेरा हाथ छोड़ दिया और पीछे हट गई। "तुम दोनों झूठ बोलते हो। रात को तुम घर में नहीं थे। मैंने देखा था — तुम्हारा पलंग खाली था। मैंने माँ को बताया तो माँ ने कहा चुपचाप सो जा।"
वो अपनी आँखें रगड़कर रोने लगी। फिर अचानक रुकी। आँसू पोंछे। सीधी मेरी तरफ़ देखा और ऐसी बात कही जो मैंने उससे उम्मीद नहीं की थी।
"भैया, तू डर मत।"
मैं स्तब्ध रह गया।
"मैं तेरे लिए मिट्टी लाती रहूँगी।"
"गुड़िया—"
"रोज़ सुबह। जब तू अखाड़े जाए, मैं चुपके से जाऊँगी और थैली भरकर लाऊँगी। जैसे पहले लाई थी। मैं किसी को नहीं बताऊँगी।"
मेरा गला भर गया। मैंने उसे अपनी तरफ़ खींचा और उसका सिर अपनी छाती पर रखा। वो मेरी कमीज़ में मुँह छुपाकर सिसकने लगी।
माँ चूल्हे के पास खड़ी थीं। उन्होंने कुछ नहीं कहा, बस धीरे से आटा गूंधने लगीं — गीला आटा, और उनके हाथों में वो हरकत थी जो सिर्फ़ तब आती है जब वो भीतर से काँप रही हों और बाहर से शांत दिखना चाहती हों।
टिंकू ने धीरे से कहा, "मैं दुकान देख आता हूँ।" वो उठा और चला गया।
घर में सिर्फ़ चूल्हे की फूँक की आवाज़ बची।
अखाड़े में जो हुआ, वो टिंकू ने शाम को बताया। वो दुकान पर था जब लुट्टन दौड़ता हुआ आया और सबको बुलाने लगा।
"भैरव सिंह सबको अखाड़े में बुला रहे हैं! सबको! हर पहलवान, हर मज़दूर, हर आदमी जो अखाड़े की मिट्टी छूता है!"
जब मैं पहुँचा, अखाड़े में तीस-चालीस आदमी जमा थे। कुछ पहलवान, कुछ गाँव वाले, और कुछ वो नए चेहरे — दो लंबे, भूरे कुर्ते वाले, जो दरवाज़े के दोनों तरफ़ खड़े थे। उनकी आँखें हिलती नहीं थीं। ऐसे खड़े थे जैसे दीवार का हिस्सा हों।
भैरव सिंह मैदान के बीच खड़ा था। उसने आज लाल धोती नहीं पहनी थी — सफ़ेद धोती पहनी थी, जैसे कोई साधु तपस्या में बैठा हो। उसकी मूँछों में तेल चमक रहा था और गले की सोने की चेन आज और चमकीली लग रही थी।
"सब आ गए?" उसने कहा। आवाज़ मीठी थी, जैसे गुड़ का शरबत।
कोई नहीं बोला।
"मैंने सुना है कि कुछ लोगों को शक है," भैरव ने कहा। "कुछ लोग कह रहे हैं कि रात को अखाड़े में कोई बाहर वाला घुसा।"
लुट्टन आगे आया। "हाँ, सर। मिट्टी में पैरों के निशान हैं। पीछे की दीवार के पास। कोई दीवार फाँदकर आया था।"
"देखो," भैरव ने हाथ फैलाया, "मेरा अखाड़ा। मेरी मिट्टी। कोई इसमें घुसे, ये मैं कैसे सहूँ?"
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