Spirit of a Fighter – Chapter 578
"अब तेरी बारी," मैंने धीरे से कहा। "देखता हूँ, तू क्या सिखाता है।"
मैं दौड़ा।
॥
दौड़ते वक़्त मेरी चप्पल टूट गई। मैंने उसे उतारकर फेंक दिया और नंगे पैर भागता रहा। सड़क के कंकड़ पैरों में चुभ रहे थे, पर मुझे दर्द नहीं हो रहा था। डर दर्द से बड़ा था।
मीरा मेरे साथ थी। उसकी साँसें फूल रही थीं, पर वो रुकी नहीं।
“वीर, गाड़ी…” उसने हाँफते हुए कहा।
“नहीं। गाड़ी वाला रास्ता लंबा है। नहर के किनारे से छोटा रास्ता है।”
“तू कैसे जानता है?”
“मुझे गंध याद है। पिछली बार जब हम शहर आए थे, नहर के पास वो लोहे की फैक्ट्री थी। उसकी गंध से रास्ता पकड़ लूँगा।”
हम नहर के किनारे-किनारे भागे। सुबह की हवा में पानी की बू थी, और उसके नीचे कुछ और भी — तेल, धुआँ, और दूर से आती गरम लोहे की गंध। मेरी नाक ने रास्ता पकड़ लिया।
मीरा मेरे पीछे थी, पर एक पल को वो रुकी। मैंने पलटकर देखा।
वो अपनी जेब से कुछ निकाल रही थी। एक छोटी सी शीशी। उसने उसे मेरी तरफ़ बढ़ाया।
“ले। मेरी बनाई दवा। अगर फिर सिर दर्द हो या नाक से खून आए, तो इसे सूँघ लेना।”
मैंने शीशी ली। उसमें तुलसी और अदरक की गंध थी, और उसके नीचे मीरा के हाथों की गंध — वही जो मुझे नहर किनारे वाली रात याद थी।
“तू मेरे साथ क्यों आ रही है?” मैंने पूछा। “तेरे पापा…”
“मेरे पापा मेरे पापा हैं,” उसने कहा। उसकी आवाज़ में वो ज़िद थी जो मुझे अब पहचानने लगी थी। “और वो ठाकुर के पास हैं। मैं उन्हें अकेला नहीं छोड़ूँगी।”
हम फिर भागे।
शहर के बाहर जब हम पहुँचे, तो सूरज सिर पर आ चुका था। ठाकुर का अखाड़ा बड़ा था — पक्की ईंटों की दीवार, लोहे का बड़ा फाटक, और फाटक पर दो आदमी खड़े। वो लाल कुर्ते में थे, ठाकुर की वर्दी।
मैं सीधा फाटक की तरफ़ बढ़ा। एक आदमी ने हाथ उठाया।
“रुक। किससे मिलना है?”
मैंने उसकी आँखों में देखा। मेरी साँस अभी भी भाग रही थी, पर मेरी आवाज़ ठंडी थी।
“रणवीर सिंह से।”
“कौन हो तुम?”
“उसका दामाद।”
वो आदमी रुक गया। मीरा ने मेरी तरफ़ देखा — एक पल के लिए उसकी आँखें बड़ी हो गईं, फिर वो नीचे देखकर मुस्कुरा दी।
“दामाद?” आदमी ने हँसने की कोशिश की। “अभी तो…”
“सुन,” मैंने धीरे से कहा। “मेरे पैरों में खून है, मेरी चप्पल रास्ते में टूट गई, और मेरी माँ का दिया हुआ आदमी अंदर बंद है। तू मुझे रोकेगा, तो मैं तेरे ऊपर से निकल जाऊँगा।”
उसका हाथ नीचे आ गया।
मैं अंदर गया। अखाड़े की मिट्टी लाल थी, पर मुझे इस मिट्टी में वो गंध नहीं मिली जो अपने अखाड़े में थी। यहाँ की मिट्टी बहुत दिनों से सूखी पड़ी थी — जैसे किसी ने इसे छोड़ दिया हो।
अंदर बरामदे में रणवीर सिंह बैठे थे। व्हीलचेयर पर। उनके हाथ बेड़ी से बँधे नहीं थे, पर उनके दोनों तरफ़ ठाकुर के दो आदमी खड़े थे। और सामने, ऊँची कुर्सी पर, ठाकुर महेंद्र सिंह बैठे थे। हाथ में चाय का कप, होंठों पर हल्की मुस्कान।
उन्होंने मुझे देखा। मुस्कान थोड़ी बढ़ी।
“आ गया,” उन्होंने कहा। “मैंने कहा था ना, ये लड़का दौड़कर आएगा। लड़के की माँ का दूध ऐसे ही तो नहीं जाता।”
मैंने रणवीर सिंह की तरफ़ देखा। वो शांत बैठे थे। उनकी पीठ सीधी थी, मूँछें वैसी ही, पर उनकी आँखों में वो आग जल रही थी जो मैंने पहली बार उनके चेहरे पर देखी थी।
“अंकल,” मैंने कहा। “आप ठीक हैं?”
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। उनके होंठ हिले।
“मैं ठीक हूँ, बेटा। ठाकुर साहब ने मुझे आराम से बिठाया है। कहते हैं, पुरानी यादें ताज़ा करनी हैं।”
ठाकुर ने चाय की चुस्की ली। फिर उन्होंने कप नीचे रखा और खड़े हो गए। उनका कद लंबा था, और उनकी चाल में वो ठहराव था जो सिर्फ़ उन लोगों में आता है जिनके पास पैसा हो और पैसे के पीछे ताकत।
“वीर सिंह,” उन्होंने कहा। “तू समझ रहा होगा कि मैंने तेरे रणवीर अंकल को ज़बरदस्ती उठाया है। ऐसा नहीं है। मैंने उन्हें बस याद दिलाने बुलाया है — बीस साल पहले उन्होंने मुझसे कैसे हार मानी थी।”
रಣवीर सिंह की मुट्ठी कुर्सी के हत्थे पर कस गई। मैंने देखा — उनकी उँगलियाँ सफ़ेद पड़ गईं।
“हार?” मैंने कहा। “आपने कभी नहीं हारे। आपको ज़हर दिया गया था।”
ठाकुर हँसे। हँसी मीठी थी, पर आँखें वैसी ही ठंडी।
“ज़हर? शब्द बड़े भारी हैं, बेटा। बीस साल पुरानी बात है। कोई गवाह है? कोई काग़ज़ है?” उन्होंने कुर्सी के पीछे खड़े हरनाम की तरफ़ इशारा किया — हरनाम जो अब भी वहीं खड़ा था, काला सूट पहने, हाथ में फ़ाइल। “मेरा हिसाब तो साफ़ है। हर काग़ज़ पर मुहर है, हर मौत पर डॉक्टर का हस्ताक्षर। तेरे पास क्या है?”
मैं आगे बढ़ा। मेरे अंदर गुस्सा उबल रहा था — वो गुस्सा जो माँ के ज़हर की कड़वाहट से आता है, जो टिंकू की जली दुकान से आता है, जो चंदन की तस्वीर से आता है। मेरे हाथ कस गए।
पर तभी रणवीर सिंह का हाथ मेरी कलाई पर आया। उनकी पकड़ कमज़ोर थी, पर उनकी उँगलियाँ मेरी नस पकड़ चुकी थीं।
“बेटा,” उन्होंने धीरे से कहा, बिना ठाकुर की तरफ़ देखे। “मिट्टी में लड़ने वाले को गुस्सा नहीं चाहिए। साँस चाहिए।”
मैं रुक गया।
“गुस्सा आदमी को जल्दी भगाता है,” वो बोले। “और साँस उसे ठहरना सिखाती है। जो ठहरता है, वो देखता है। और जो देखता है — वो जीतता है।”
उन्होंने मेरी कलाई छोड़ी। मेरा गुस्सा वहीं रुक गया, किसी कुएँ में गिर गया।
ठाकुर ने ये सब देखा। उनकी मुस्कान थोड़ी फीकी पड़ी। फिर वो फिर हँसे।
“वाह। बीस साल में पहली बार रणवीर सिंह ने कुछ ऐसा कहा जो सुनने लायक है।” उन्होंने अपनी उँगली उठाई। “पर याद रख, लड़के। सात दिन बाद मैदान में फ़ैसला होगा। और उस दिन — या तो तेरा अखाड़ा मेरा होगा, या तेरा नाम।”
“मेरा नाम?” मैंने पूछा।
“हाँ।” ठाकुर मेरे पास आए। उनकी इत्र की गंध मेरी नाक में घुसी — चंदन और केसर और उसके नीचे कुछ और। कोई तेल। कोई पुराना तेल जो मैंने भैरव के तेल में सूँघा था।
“अगर तू जीता,” उन्होंने धीरे से कहा, “तो तेरा नाम इतिहास में लिखा जाएगा। भारत केसरी। और अगर हारा — तो तेरा नाम किसी काग़ज़ पर नहीं, किसी कब्र पर लिखा जाएगा। बिना नाम की कब्र। समझा?”
मैंने उनकी आँखों में देखा। उनकी आँखें ठंडी थीं, बिलकुल कुएँ जैसी। पर मैंने उनमें एक झिझक देखी — एक छोटी सी काँप, जो सिर्फ़ उस आदमी में आती है जिसने बहुत दिनों तक झूठ पाला हो और जिसे अब लगने लगा हो कि झूठ का वज़न बढ़ रहा है।
“ठाकुर साहब,” मैंने कहा। “उस दिन मिट्टी फ़ैसला करेगी। इंसान नहीं।”
मेरी आवाज़ में वो ठहराव था जो मैंने रणवीर सिंह से अभी सीखा था। ठाकुर एक पल रुके। फिर उन्होंने हाथ हिलाया।
“ले जाओ इसे,” उन्होंने अपने आदमियों से कहा। “और रणवीर सिंह को… उन्हें यहीं रहने दो। मेहमान हैं।”
मेरे पेट में झटका लगा। “आप उन्हें नहीं ले जा सकते।”
“मैं किसी को नहीं ले जा रहा,” ठाकुर ने कहा। “वो खुद रुक रहे हैं। पूछ ले उनसे।”
मैंने रणवीर सिंह की तरफ़ देखा। वो शांत बैठे थे, पर उनके होंठों पर एक हल्की मुस्कान थी — वो मुस्कान जो सिर्फ़ उस आदमी के होंठों पर आती है जो अपने दुश्मन को अपने ही जाल में फँसने का इंतज़ार कर रहा हो।
“बेटा,” उन्होंने कहा। “मैं यहीं रहूँगा। सात दिन। ठाकुर साहब के पास। खाना अच्छा है, बिस्तर आरामदायक है। और मुझे यहाँ रहकर कुछ काम भी है।”
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