Spirit of a Fighter – Chapter 577
"तो चंदन तेरे पापा जैसा दिखता था?" उसने कहा।
"नहीं, मेरे जैसा।"
वो कुछ देर चुप रही। फिर उसने धीरे से कहा, "वीर, तुझे कभी लगा कि तेरे पापा की कोई और तस्वीर क्यों नहीं है? घर में सिर्फ़ एक तस्वीर है, और वो भी धुंधली।"
मैंने सोचा। सच था। माँ के पास पापा की सिर्फ़ एक तस्वीर थी, पुरानी, धुंधली, जिसमें उनका चेहरा ठीक से दिखता भी नहीं था। मैंने कभी पूछा नहीं क्यों।
"तेरे मन में क्या है?" मैंने पूछा।
मीरा ने अपना बैग खोला और उसमें से एक काग़ज़ निकाला। पुराना, मुड़ा हुआ।
"ये मुझे पापा की अलमारी से मिला," उसने कहा। "जब वो सो रहे थे। इसमें चंदन सिंह की मौत का ज़िक्र है — लिखा है कि वो नहर में डूबा।"
"पर कालू काका कहते हैं लाश नहीं मिली।"
"हाँ।" मीरा ने काग़ज़ मेरी तरफ़ बढ़ाया। "और ये देख — नीचे हस्ताक्षर हैं। हरनाम के।"
मैंने काग़ज़ पढ़ा। सूखी स्याही, पीला काग़ज़, और नीचे हरनाम का हस्ताक्षर। हरनाम — जो नहर किनारे मरा मिला था। जिसके मुँह से झाग निकल रहा था।
"हरनाम ने चंदन की मौत की रिपोर्ट लिखी थी," मीरा ने कहा। "और अब हरनाम खुद मरा है।"
मैंने काग़ज़ को सूंघा। स्याही की गंध पुरानी थी, पर उसके नीचे कुछ और था — हल्का, फीका, बादाम जैसा। ठाकुर का इत्र।
मैंने काग़ज़ नीचे रख दिया।
"मीरा," मैंने कहा, "तेरे पापा को ठाकुर के बारे में क्या पता है?"
वो कुछ देर चुप रही। फिर बोली, "मुझे नहीं पता। पर आज सुबह जब उन्होंने चंदन का नाम लिया, तो उनकी आवाज़ में वो डर था जो मैंने कभी नहीं सुना।"
हम दोनों चुप बैठे रहे। अखाड़े में हवा चल रही थी और मिट्टी की महक आ रही थी।
अगले तीन दिन मैंने खुद को मिट्टी में झोंक दिया। सुबह चार बजे उठना — माँ की चक्की की आवाज़ याद करके। मिट्टी में बैठना, साँस गिनना, फिर उठकर दौड़ना। अमर मेरे साथ दौड़ता — उसका पैर दुखता था, पर वो रुकता नहीं था। टिंकू रोज़ खीर लाता — अब वो चुपके से नहीं लाता था, खुलेआम लाता था, और कहता, "खा ले भाई, वरना मेरी मिठाई का नाम कौन लेगा।" और मीरा रोज़ दवा लाती, और रोज़ कुछ नया बताती — कौन-सी जड़ी कब देनी है, कब साँस रोकनी है, कब पानी पीना है।
चौथे दिन शाम को मैं अखाड़े में अकेला था। अमर गाँव गया था — माँ से मिलने, गुड़िया के लिए मिठाई लेने। मीरा अपने पापा के पास थी।
मैं दीवार के पास बैठा था और वो तस्वीर देख रहा था। चंदन की तस्वीर। मैंने उसे बहुत देर देखा। और फिर मुझे लगा — वो मुस्कुरा रहा है। नहीं, वो पहले भी मुस्कुरा रहा था। पर अब उसकी मुस्कान में कुछ और था। जैसे वो मुझसे कह रहा हो — "आ गया तू।"
मैंने आँखें बंद कीं और साँस ली। और उस साँस में मुझे कुछ दिखा — धुंधला, पर साफ़। एक कमरा। एक चारपाई। एक आदमी बैठा है, और उसके हाथों में एक शीशी है। वो शीशी मैंने देखी है। पीली शीशी। और उस आदमी के चेहरे पर वो मुस्कान है जो मैंने भैरव के चेहरे पर देखी थी — ठंडी, चिकनी, ज़हरीली।
मैंने आँखें खोलीं।
"चंदन," मैंने धीरे से कहा, जैसे कोई नाम पुकार रहा हो। "तू मुझे क्या बताना चाहता है?"
हवा चली। दीवार पर लगी तस्वीर हिली। और उसके पीछे से एक काग़ज़ गिरा — पीला, मुड़ा हुआ, जैसे बरसों से वहीं छिपा था।
मैंने उसे उठाया। उस पर लिखाई थी — छोटी, काँपती, किसी बीमार आदमी की लिखाई।
"जो इसे पढ़े, वो जान ले — मुझे माधव ने नहीं मारा। मुझे उसने मारा जिसे मैंने अपना भाई समझा। वो मेरे पास आया, मुस्कुराया, और कहा — 'चंदन, तू बहुत बोलता है।' और फिर उसने मेरे मुँह में वो शीशी डाल दी। मैं मरा नहीं। मैं मिट्टी में हूँ। और मिट्टी मेरी गवाह है।"
नीचे हस्ताक्षर था — चंदन सिंह।
मेरे हाथ काँप रहे थे। मैंने उसे दोबारा पढ़ा। तीसरी बार पढ़ा।
"जिसे मैंने अपना भाई समझा।"
भैरव। चंदन को भैरव ने मारा था। अपने ही भाई ने।
मैं वहीं बैठ गया। मेरी आँखों में पानी आ गया — उस लड़के के लिए जिसका चेहरा मेरा था, जो मेरे जैसा दिखता था, जो बीस साल से मिट्टी में था और जिसे कोई नहीं जानता था।
तभी पीछे से आवाज़ आई।
"मैं जानता हूँ वो काग़ज़।"
मैं पलटा।
रणवीर सिंह थे — व्हीलचेयर पर, अकेले, दीवार के पास खड़े। उनके हाथ पहियों पर थे और उनकी आँखों में वो पानी था जो बीस साल से रुका हुआ था।
"आप?" मैंने कहा। "आप यहाँ कैसे?"
"मीरा ने बताया कि तू यहाँ अकेला है।" उन्होंने अपनी व्हीलचेयर आगे बढ़ाई। "मैं तुझसे कुछ कहना चाहता था। बीस साल से कहना चाहता था, पर हर बार डर जाता था।"
वो मेरे पास आए और उन्होंने मेरे हाथ से काग़ज़ लिया। उसे देखा। उनके होंठ काँपे।
"चंदन मेरा दोस्त था," उन्होंने कहा। "मेरा सबसे अच्छा दोस्त। और उस रात जब वो मरा, मैं वहीं था। मैंने देखा — भैरव ने उसके मुँह में शीशी डाली। और मैं… मैं कुछ नहीं कर सका। मैं जम गया था।"
उनकी आवाज़ टूट गई।
"मैं भागा। मैंने माधव को बताया। और माधव ने मुझे डराया — 'अगर तू बोलेगा, तो तेरी बेटी मरेगी।' मेरी बेटी। मीरा। वो तब छोटी थी।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "मैं चुप रहा। बीस साल। और उसी चुप्पी में मेरे पैर गए।"
मैंने उनका हाथ पकड़ा। उनके हाथ ठंडे थे, सूखे, काँपते।
"अंकल," मैंने कहा, "अब आप अकेले नहीं हैं।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में वो चमक आई जो बुझ चुकी थी।
"बेटा," उन्होंने कहा, "सात दिन में तू अपनी साँस से खेलना सीख जाएगा। और सातवें दिन मैं तेरे साथ मैदान में खड़ा होऊँगा। व्हीलचेयर पर नहीं — खड़ा होकर।"
"पर आपके पैर…"
"मेरे पैर सून्न हैं," उन्होंने कहा, "पर मेरी रीढ़ नहीं। और जिस दिन मैं उस मैदान में खड़ा होऊँगा, उस दिन माधव को पता चलेगा कि उसका डर बीस साल पुराना नहीं, आज का है।"
उस रात मैं सोया नहीं। मैं अखाड़े की मिट्टी पर लेटा रहा और आसमान देखता रहा। मेरे पास चंदन का काग़ज़ था, और मेरे सीने पर वो मिट्टी की गोली थी जिस पर माँ की हल्दी की गंध थी।
मैंने आँखें बंद कीं और साँस ली। और इस बार मुझे चंदन दिखा — साफ़, बिलकुल साफ़। वो मुस्कुरा रहा था, और उसके होंठ हिल रहे थे। इस बार आवाज़ आई।
"धीरे, वीर। मिट्टी जल्दी में नहीं होती।"
मैंने आँखें खोलीं। मेरी आँखों में पानी था, पर मेरे होंठ मुस्कुरा रहे थे।
अगली सुबह जब मैं उठा, तो सूरज अभी निकला नहीं था। मैंने मिट्टी में हाथ डाले और साँस गिननी शुरू की। एक। दो। तीन।
और फिर मेरी जेब में फ़ोन बजा।
मैंने निकाला। मीरा का नाम था।
"वीर?" उसकी आवाज़ काँप रही थी। "वीर, सुन…"
"क्या हुआ? तू ठीक है?"
"मैं ठीक हूँ। पर…" उसकी साँस टूट रही थी। "पापा… पापा को ठाकुर के आदमी उठा कर ले गए हैं।"
मेरे हाथ से फ़ोन फिसलने लगा। "क्या?"
"मैं सुबह उनके कमरे में गई, तो बिस्तर खाली था। खिड़की खुली थी। और फ़र्श पर ये…" वो रो रही थी। "एक लाल पोटली पड़ी है, वीर। वही पोटली जो तेरी माँ ने भैरव को दी थी। और उस पर लिखा है — 'सातवें दिन मैदान में मिल। वरना तेरे पापा की व्हीलचेयर खाली लौटेगी।'"
मैं वहीं खड़ा रह गया। मेरे पैरों तले मिट्टी ठंडी थी, और मेरे हाथों में वो गोली थी जिस पर माँ की हल्दी थी।
"मीरा," मैंने धीरे से कहा, "मैं आ रहा हूँ।"
मैंने फ़ोन रखा और अखाड़े की दीवार की तरफ़ देखा। चंदन की तस्वीर वहीं थी, और उसकी आँखें मुझ पर थीं।
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