Spirit of a Fighter576 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 576

6 min read November 5, 2026

वो चली गई। मैं उसकी बात सोचता रहा।

अंदर का आदमी। कौन? लुट्टन? नहीं, लुट्टन तो गवाही देने पर राज़ी हो गया था। मुंशीजी? नहीं, वो भाग नहीं सकते। तो कौन?

मैं अखाड़े की मिट्टी पर बैठ गया। नीचे ठंड थी। मैंने अपनी हथेलियाँ मिट्टी पर रखीं। कालू काका ने मुझे सिखाया था — साँस से मिट्टी को सुनो, मिट्टी तुम्हें सुनेगी।

मैंने धीरे-धीरे साँस ली। पहली बार में कुछ नहीं हुआ। दूसरी बार में सिर्फ़ हवा आई। तीसरी बार में… कुछ हुआ।

मिट्टी की गंध बदली। जैसे कोई पुरानी परत खिसकी हो। और उसके नीचे से एक और गंध आई — पसीना, खून, और… चंदन।

चंदन?

मैंने आँखें खोलीं। मेरे चारों तरफ़ अंधेरा था। पर उस अंधेरे में मुझे कुछ दिखा — अखाड़े की दीवार पर लगी पुरानी तस्वीरें। चाँदनी उन पर पड़ रही थी।

मैं उठा और दीवार के पास गया।

वहाँ तस्वीरें थीं — पुराने पहलवानों की, बीस साल पुरानी। बीच में एक बड़ी तस्वीर थी — रणवीर सिंह, नौजवान, मिट्टी में लिपटे, मूँछें काली, आँखों में आग। उनके नीचे एक और तस्वीर थी।

मैंने उसे देखा। और मेरा दिल धक्क से रह गया।

वो तस्वीर मेरी थी।

नहीं — मेरी नहीं थी। उसमें एक लड़का खड़ा था, मिट्टी में लिपटा, घुंघराले बाल, चौड़े कंधे। वो मैं था। बिलकुल मैं। पर वो तस्वीर बीस साल पुरानी थी।

मैंने उसे छुआ। काँच के नीचे काग़ज़ सूखा था, पीला पड़ा हुआ। मैंने उस तस्वीर के नीचे लिखा पढ़ा — नाम, साल, और एक लाइन।

"चंदन सिंह — जो मिट्टी में घुल गया।"

चंदन। चंदन सिंह।

मेरी साँस रुक गई। मैंने वो नाम कभी नहीं सुना था। पर उस लड़के का चेहरा मेरा था। बिलकुल मेरा।

मैं पीछे हटा, और मेरी एड़ी किसी चीज़ से टकराई। मैंने नीचे देखा — एक छोटी मिट्टी की गोली पड़ी थी, जैसी तहखाने की मिट्टी की होती है। मैंने उसे उठाया। उस पर उँगली से कुछ लिखा था।

"तेरे जैसा कोई था, वीर। मिट्टी उसे भूली नहीं।"

मैंने उसे सूंघा। हल्दी। माँ के हाथ की हल्दी।

मैं वहीं बैठ गया। मेरे हाथ काँप रहे थे। मेरे कानों में कालू काका की वो बात गूँजने लगी — "तेरी आँखें वैसी हैं।" वैसी किसकी? चंदन की?

मैंने तस्वीर फिर देखी। उस लड़के की आँखें मेरी आँखों जैसी थीं। पर उसकी नाक थोड़ी चपटी थी, और उसके होंठ मेरे से पतले। वो मैं नहीं था। पर वो मेरे जैसा था। बहुत ज़्यादा।

मैं उठा और कालू काका के कमरे की तरफ़ भागा।

वो जाग रहे थे। रामदीन उनके पास सो रहा था, और उसकी साँस में वो घरघराहट थी जो बूढ़े आदमी की नींद में होती है।

"काका," मैंने दरवाज़े से ही कहा, "चंदन सिंह कौन था?"

कालू काका के हाथ रुक गए। वो मेरी तरफ़ देखते रहे, बहुत देर तक, जैसे तौल रहे हों कि कितना बताऊँ।

"तूने वो तस्वीर देखी," उन्होंने कहा।

"देखी। और उस लड़के का चेहरा मेरा है।"

कालू काका ने लाठी उठाई और धीरे-धीरे उठे। उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा और मुझे बाहर, आँगन में ले आए। चाँद ऊपर था, और उसकी रोशनी में कालू काका का चेहरा और भी पुराना लग रहा था।

"चंदन सिंह," उन्होंने कहा, "शेर सिंह का बड़ा बेटा था। भैरव से बड़ा।"

मेरे पैर जम गए।

"भैरव का भाई?"

"हाँ। और वो माधव सिंह का सबसे बड़ा डर था। क्योंकि चंदन में वो बात थी जो माधव को अखाड़े में सबसे ज़्यादा डराती थी — सच। चंदन सच बोलता था, बेटा। बिना डरे।"

"तो वो कहाँ गया?"

कालू काका ने आसमान की तरफ़ देखा।

"वो मिट्टी में घुल गया," उन्होंने कहा। "बीस साल पहले। उसी रात जिस रात तेरे पापा गिरे थे। उसी रात जिस रात शेर सिंह मरे थे। चंदन उस रात अखाड़े में था। और वो किसी को कुछ बताने से पहले ही… गायब हो गया।"

"गायब?"

"कोई लाश नहीं मिली। कोई निशान नहीं। बस उसकी धोती मिली — कुएँ के पास, खून से भीगी।" कालू काका ने मेरी तरफ़ देखा। "बीस साल से मुझे लगता था वो भाग गया। पर आज तेरी सूंघने की बात सुनकर, और ये तस्वीर देखकर… मुझे लगता है वो नहीं भागा। मुझे लगता है उसे मिट्टी में मिला दिया गया।"

मेरे हाथ ठंडे हो गए। "और उसका चेहरा मेरा क्यों है?"

कालू काका कुछ देर चुप रहे। फिर उन्होंने मेरे कंधे पर हाथ रखा।

"क्योंकि तू उसी मिट्टी का है, बेटा," उन्होंने कहा। "और मिट्टी अपने बेटों को एक जैसा बनाती है।"

अगली सुबह मैंने अपने आप को मिट्टी में डुबो दिया।

कालू काका मेरे पास बैठे रहे और वो मुझे साँस सिखाते रहे। "लंबी साँस। नाक से। पेट तक। रोक। छोड़।" और मैं करता रहा। बार-बार। पहले घंटे में मेरा सिर घूमने लगा। दूसरे घंटे में मेरी आँखें बंद होने लगीं। तीसरे घंटे में मुझे कुछ दिखने लगा।

अंधेरा। फिर उसमें एक लाल रंग। फिर एक चेहरा।

चंदन का चेहरा। मेरा चेहरा।

वो मुस्कुरा रहा था, और उसके होंठ हिल रहे थे जैसे कुछ बोल रहे हों। मैं सुनने की कोशिश करता रहा, पर आवाज़ नहीं आई। बस एक गंध आई — चंदन की लकड़ी की, और उसके नीचे माँ की हल्दी।

मैंने आँखें खोलीं और मैं हाँफ रहा था।

"काका," मैंने कहा, "मुझे चंदन दिखा।"

कालू काका मुस्कुराए। उनकी आँखों में पानी था।

"तो अब तू मिट्टी से बात करने लगा है, बेटा," उन्होंने कहा। "अब सात दिन में तू वो करेगा जो बलवंत बीस साल में नहीं कर पाया।"

उस दिन दोपहर में अमर आया। उसका पैर अब अच्छा हो गया था — हल्का लंगड़ाता था, पर चल सकता था। वो अखाड़े के फाटक पर खड़ा हुआ और मुझे देखता रहा।

"तू मिट्टी में लिपटा है," उसने कहा। "मुझे लगा कोई मूर्ति है।"

"आ, बैठ," मैंने कहा। "मिट्टी ठंडी है।"

वो आया और मेरे पास बैठ गया। उसने भी हाथ मिट्टी पर रखे। फिर उसने कहा, "मैं भी लड़ूँगा।"

"किससे?"

"बलवंत से। उसके साथ लड़ने के लिए मुझे ठाकुर ने पैसे दिए थे। पर मैं तेरे साथ लड़ूँगा। मुकाबले से एक दिन पहले, मैं उसके सामने खड़ा होकर कहूँगा — 'मैं तेरा सौतेला भाई नहीं, तेरा दुश्मन हूँ।'"

मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसके चेहरे पर वो ज़िद थी जो मेरे पास भी है। हम दोनों एक ही मिट्टी के निकले हैं, अलग-अलग घरों में पले-बढ़े, पर एक जैसे ज़िद्दी।

"अमर," मैंने कहा, "तू मेरे साथ लड़ेगा, पर बलवंत से नहीं। उससे तो मैं लड़ूँगा। तू उस आदमी से लड़ेगा जो लालटेन लेकर दीवार पर चढ़ा था।"

अमर ने सिर हिलाया। "कौन है वो?"

"नहीं जानता। पर उसकी गंध भैरव के तेल और ठाकुर के इत्र दोनों में लिपटी है। जो आदमी दोनों के बीच आता-जाता है, वो कोई पुराना नौकर है। कोई ऐसा जो दोनों के घर में आता-जाता है।"

अमर की आँखें सिकुड़ीं। "ठाकुर के घर में भैरव का आदमी?"

"या भैरव के पास ठाकुर का आदमी।"

उस दिन शाम को मीरा आई — अपनी दवाओं की डिब्बी लिए, बाल थोड़े खुले, आँखों में वो थकान जो रात भर सोने से भी नहीं जाती। उसने मुझे दवा दी और मेरे पास बैठ गई।

"पापा ठीक हैं?" मैंने पूछा।

"ठीक हैं।" वो कुछ देर चुप रही। फिर बोली, "पर वो आज सुबह से कुछ बोल नहीं रहे।"

"क्यों?"

"नहीं पता।" उसने अपने हाथ देखे। "मैंने उनसे पूछा, तो उन्होंने सिर्फ़ इतना कहा — 'आज मुझे चंदन याद आ रहा है।'"

मेरा हाथ रुक गया। "चंदन?"

मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। "तू उसे जानता है?"

मैंने उसे सब बताया — तस्वीर, नाम, कालू काका की बातें। मीरा सुनती रही, और उसका चेहरा बदलता रहा।

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