Spirit of a Fighter – Chapter 553
वो रुक गए। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
"शायद एक दिन कोई आएगा जो इन्हें माँगेगा," उन्होंने कहा।
मैंने पलटकर मीरा की तरफ़ देखा। वो मेरी तरफ़ देख रही थी, और उसकी आँखों में वो चमक थी जो मुझे अच्छी लगती थी — वो चमक जो तब आती थी जब उसे कोई सुराग़ मिलता था।
"चलो," मैंने कहा। "अभी।"
हम चले — मैं, मीरा, रणवीर सिंह की कुर्सी, माँ, कालू काका, और मुंशीजी। भीड़ हमारे पीछे-पीछे चली, जैसे कोई नदी अपना रास्ता बदल रही हो। टिंकू सबसे आगे था, और उसके हाथ में अभी भी वही लोहे के छल्लों वाली रस्सी थी जो उसने सुरंग से निकाली थी।
मुंशीजी का कमरा अखाड़े की उस दीवार के पीछे था जो हमने तोड़ी थी। दरवाज़ा खुला था, और अंदर से एक अजीब-सी गंध आ रही थी — पुराने काग़ज़ की, नमी की, और कुछ और जो मैं पहचान नहीं पाया।
मुंशीजी ने अंदर जाकर तख़्त उठाया। उसके नीचे से जो निकला, वो देखकर मेरी साँस रुक गई।
एक लोहे का बक्सा था। छोटा, मुक्के से थोड़ा बड़ा, और ज़ंग लगा हुआ। पर उस पर ताला नहीं था। और बक्से पर धूल इतनी थी कि मुंशीजी ने उसे पोंछा तो उनकी उँगलियाँ गंदी हो गईं।
उन्होंने बक्सा खोला।
अंदर लिफ़ाफ़े थे। बहुत सारे। सब बंद। सब पर एक ही मोहर — एक छोटा-सा त्रिकोण, और उसके ऊपर एक बिंदु।
मीरा ने आगे झुककर देखा। "ये… ये तो वही निशान है जो रघुवीर के दरवाज़े पर था। और चाबी पर भी।"
"नहीं," मुंशीजी ने धीरे से कहा। "ये निशान रघुवीर का नहीं है। ये उसका है जो लिफ़ाफ़े भेजता था। मैंने रघुवीर के दरवाज़े पर ये निशान देखा था और डर गया था। इसीलिए मैंने उससे कभी बात नहीं की। मुझे लगा…"
"क्या लगा?" रणवीर सिंह ने पूछा।
"मुझे लगा कि रघुवीर ही भेजता है लिफ़ाफ़े," मुंशीजी ने कहा, और उनकी आवाज़ फिर टूट गई। "मेरा दिमाग़ खराब हो गया था, सर। मैं बीस साल इसी डर में जिया कि जो मेरे पास आता है, वही मुझे मार देगा।"
मैंने बक्से से एक लिफ़ाफ़ा उठाया। वो हल्का था, जैसे अंदर सिर्फ़ एक काग़ज़ हो। मैंने उसे खोला।
अंदर एक पर्ची थी, और उस पर बहुत साफ़ लिखाई में सिर्फ़ तीन शब्द थे।
"राजू — दिल की बीमारी।"
मेरे हाथ काँपने लगे। मैंने दूसरा लिफ़ाफ़ा खोला।
"बसंता — कमज़ोरी।"
तीसरा।
"हरनाम का भतीजा — तपेदिक।"
चौथा।
"जगदीश — भाग गया।"
मैंने पांचवां खोला, और मेरी आँखें रुक गईं।
"शेर सिंह — कुदरत का सितम।"
मैंने उसे माँ की तरफ़ बढ़ाया। माँ ने उसे देखा, और उनका चेहरा ऐसा हो गया जैसे किसी ने उनके दिल पर पत्थर रख दिया हो।
"ये लिखाई," माँ ने धीरे से कहा। "ये मैं जानती हूँ।"
"कैसे?" मैंने पूछा।
माँ ने कोई जवाब नहीं दिया। उन्होंने बस अपनी उँगली उस लिखाई पर रखी — उसके घुमाव पर, उसके झुकाव पर — जैसे कोई पुरानी आवाज़ को छू रहा हो।
"माँ?" मैंने फिर कहा।
"ये लिखाई," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ बहुत धीमी थी, "बीस साल पहले मेरे हाथ में आई थी। एक लिफ़ाफ़े में। तेरे पापा की मौत के बाद। और उस काग़ज़ पर लिखा था — 'अब चुप रह, वरना तेरा बेटा भी जाएगा।'"
कमरे में सन्नाटा छा गया।
"तूने मुझे क्यों नहीं बताया?" रणवीर सिंह की आवाज़ काँप रही थी।
"क्योंकि तुम भी उस वक़्त मर रहे थे, सर," माँ ने कहा, और उनकी आँखों में आँसू नहीं थे — सिर्फ़ एक बीस साल पुरानी थकान थी। "तुम्हारे पैर जा चुके थे। और मेरे पास एक बेटा था। बारह साल का। मैंने सोचा — अगर मैं बोलूँगी, तो क्या होगा? मेरे पास कुछ नहीं था। बस ये चक्की थी, और ये बेटा।"
मैंने अपनी मुट्ठी कस ली। मेरी आँखों में कुछ जल रहा था, और मैं उसे रोकना चाहता था, पर मैं रोक नहीं पाया।
"तो तू बीस साल से जानती थी?" मेरी आवाज़ फट पड़ी। "तू जानती थी कि पापा को किसी ने मारा है? और तू मुझे बता नहीं?"
माँ ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में वो पानी आ गया जो वो कभी नहीं दिखाती थीं।
"बेटा," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ ऐसी थी जैसे कोई टूटी हुई चीज़ जोड़ रहा हो, "मैं तुझे बताती, तो तू उसी दिन मर जाता। तू पांच साल का था। तेरे हाथ में चक्की की लकड़ी देकर मैं तुझे कैसे बताती कि तेरे पापा को कोई मार गया है?"
मैंने अपना सिर नीचे कर लिया। मेरे गाल पर पानी गिरा — मुझे पता भी नहीं चला कब आया — और मैंने उसे जल्दी से पोंछ लिया।
तभी टिंकू ने कुछ कहा, और उसकी आवाज़ में वो सब कुछ था जो मैं महसूस कर रहा था पर बोल नहीं पा रहा था।
"अरे," वो बोला, "ये सब तो ठीक है, पर… पर मुंशीजी, इन लिफ़ाफ़ों में किसी का नाम तो है, पर भेजने वाले का नाम नहीं है क्या कोई?"
मुंशीजी ने बक्से के सबसे नीचे से एक लिफ़ाफ़ा निकाला। वो बाक़ियों से बड़ा था, और उस पर मोहर नहीं थी।
"ये अलग है," उन्होंने कहा। "ये पहला है। ये तब आया जब मैंने पहली बार कोई नाम रजिस्टर में लिखा। और इसमें…"
उन्होंने लिफ़ाफ़ा खोला। अंदर एक काग़ज़ था, और उस काग़ज़ पर वही लिखाई थी, पर इस बार कुछ ज़्यादा शब्द थे।
मुंशीजी ने उसे पढ़ा, और उनका चेहरा जम गया।
"क्या है?" मैंने पूछा।
उन्होंने काग़ज़ मेरी तरफ़ बढ़ाया। मैंने उसे पढ़ा।
"मुंशी, तू जो कर रहा है, वो तेरे नाम से जाएगा। मैं तेरा नाम नहीं लिखूँगा, क्योंकि तू मेरा हाथ है। पर अगर तू कभी पलटा, तो याद रखना — तेरे पास एक बात है जो मेरे पास नहीं है। तू मरे हुए लोगों के नाम जानता है। और मैं सिर्फ़ काग़ज़ जानता हूँ। मुझे मत भूलना। — वो नाम जो तू कभी नहीं पढ़ेगा, क्योंकि तूने मेरा चेहरा कभी नहीं देखा।"
मैंने यह पढ़कर मुंशीजी की तरफ़ देखा।
"तूने चेहरा कभी नहीं देखा?"
"नहीं," मुंशीजी ने कहा। "हर बार कोई और आता था। कोई नौजवान, कोई बूढ़ा, कोई बच्चा भी। सब बस लिफ़ाफ़ा देकर चले जाते थे। एक बार एक बच्चा आया था — शायद दस साल का — और उसने मेरी झोपड़ी के दरवाज़े पर लिफ़ाफ़ा रखकर भाग गया। मैंने उसे पकड़ना चाहा, पर वो नहर की तरफ़ भाग गया और… और मैंने उसे फिर कभी नहीं देखा।"
मेरे कान खड़े हो गए। "कौन-सा बच्चा? कैसा दिखता था?"
"मुझे याद नहीं," मुंशीजी ने कहा। "पर वो लंगड़ाकर भाग रहा था।"
मेरी साँस रुक गई।
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वही सवाल था जो मेरे दिमाग़ में चक्कर काट रहा था।
"अमर," मैंने धीरे से कहा। "वो अमर था।"
कालू काका ने अपना सिर उठाया। "कौन अमर?"
मैंने उन्हें वो सब बताया जो नहर के पुल पर हुआ था — वो लंगड़ा आदमी, वो आधा काग़ज़, वो नाम जो उसने अपना बताया था। और जब मैंने बताया कि वो खुद को मेरा बड़ा भाई कहता है, तो कालू काका की आँखें फैल गईं।
"तो वो… वो ज़िंदा है?" कालू काका ने कहा, और उनकी आवाज़ काँप रही थी। "वो बच्चा जो पैदा हुआ था और… और मर गया था?"
"मरा नहीं था," माँ ने कहा, और उनकी आवाज़ में एक अजीब-सी खालीपन थी। "उसे छोड़ दिया गया था। नहर पार। माधव सिंह के आदमियों ने।"
कमरे में फिर सन्नाटा छा गया। और उस सन्नाटे में मुझे एक आवाज़ सुनाई दी — बाहर से, दूर से, किसी गाड़ी का हॉर्न।
टिंकू ने खिड़की से झाँका। "अरे," वो बोला, "बाहर एक बड़ी गाड़ी आई है। सफ़ेद। और उसमें से कोई उतर रहा है।"
मैं खिड़की के पास गया। गाड़ी अखाड़े के गेट पर रुकी थी, और उसमें से एक आदमी उतर रहा था — सफ़ेद कपड़े, चमकते जूते, हाथ में एक छोटा बैग। उसके पीछे दो और आदमी थे, काले कपड़ों में।
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