Spirit of a Fighter – Chapter 552
मुंशीजी पीछे हट रहे थे, और भीड़ उन्हें रास्ता दे रही थी — जैसे कोई नदी अपने बीच से पत्थर हटा दे। पर वो ज़्यादा दूर नहीं जा पाए। भीड़ के आख़िरी किनारे पर एक बूढ़ी औरत ने अपनी लाठी उनके सामने टेक दी।
"मुंशी," वो औरत बोली, "तू भाग रहा है? बीस साल से तू इन बच्चों के नाम लिखता आया है, और आज भाग रहा है?"
मुंशीजी रुक गए। उनकी गर्दन ऐसे झुकी जैसे किसी ने हाथ रखकर दबा दी हो।
रणवीर सिंह की कुर्सी आगे बढ़ी। पहियों की आवाज़ उस चुप्पी में ऐसे चुभी जैसे सुई। "मुंशीजी," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में गुस्सा नहीं था — कुछ और था, जो गुस्से से भी ज़्यादा डरावना लगता है, "मेरी तरफ़ देखिए।"
मुंशीजी नहीं देखा। उन्होंने अपनी बही उठानी चाही जो धूल में गिरी थी, पर उनके हाथ काँप रहे थे, और बही फिर गिर गई।
"तीस साल," रणवीर सिंह ने कहा। "तीस साल तू मेरे अखाड़े का हिसाब रखता आया। मेरे पहलवानों के नाम, उनकी मेहनत, उनकी जीत — सब तेरी उँगलियों के नीचे से गुज़रा। और मुझे आज पता चल रहा है कि तू…"
वो रुक गए। उनकी साँस फूल रही थी।
मुंशीजी ने धीरे से सिर उठाया। उनके चश्मे पर धूल थी, और उस धूल के पीछे उनकी आँखें ऐसी दिखीं जैसी मैंने कभी नहीं देखी थीं — थकी, बुझी, जैसे कोई बहुत दिन का जागा हुआ आदमी हो।
"मैं भाग नहीं रहा था, सर," उन्होंने कहा। आवाज़ बैठी हुई थी। "मैं बस… मुझे लगा मैं गिर जाऊँगा। मेरे पैर…"
"तेरे पैर नहीं, तेरी नीयत गिरी है," माँ ने कहा। वो आगे आईं और मुंशीजी के सामने खड़ी हो गईं। उनका हाथ अभी भी पीतल का ढक्कन थामे था। "बता। जो रघुवीर ने कहा, वो सच है?"
मुंशीजी ने कोई जवाब नहीं दिया। उन्होंने बस अपनी जेब से एक रूमाल निकाला और माथे का पसीना पोंछा। वो रूमाल पुराना था, कोनों से घिसा हुआ।
"मैंने कोई ज़हर नहीं बनाया," वो धीरे से बोले। "मैंने कोई बोतल नहीं भरी। मैं तो सिर्फ़…"
"सिर्फ़ क्या?" मीरा की आवाज़ तेज़ थी। "सिर्फ़ हिसाब रखा? सिर्फ़ नाम लिखे? मुंशीजी, जब किसी पहलवान की मौत होती थी, तो काग़ज़ पर क्या लिखा जाता था — 'बीमारी'?"
मुंशीजी ने उसकी तरफ़ देखा, और उनकी आँखों में कुछ ऐसा चमका जो मुझे अच्छा नहीं लगा।
"मैडम," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में अचानक एक अजीब-सी सफ़ाई आ गई, "तुम्हारे पापा की कुर्सी का हिसाब भी मैंने ही रखा था। बीस साल। हर महीने की दवा, हर महीने का पैसा। और तुम कभी नहीं पूछने आईं कि ये पैसा कहाँ से आता है।"
मीरा का चेहरा सफ़ेद पड़ गया। उसने कुछ कहना चाहा, पर रणवीर सिंह ने हाथ उठा दिया।
"बस," उन्होंने कहा। "मुंशी, तू मेरे साथ चल। पंचायत के सामने सब बोल।"
"मैं नहीं चलूँगा।" मुंशीजी की आवाज़ में पहली बार ज़िद आई। "मैं जानता हूँ पंचायत क्या करेगी। मुझे गाँव से निकाल देगी। और मैं… मैं कहाँ जाऊँगा? मेरा कोई नहीं है, सर। मेरी बीवी मर गई, बच्चे नहीं हुए। ये अखाड़ा ही मेरा घर है।"
वो बोलते-बोलते रुक गए, और उनकी आवाज़ टूट गई। भीड़ में कुछ लोगों ने एक-दूसरे की तरफ़ देखा।
मैंने अपनी मुट्ठी कस ली। मुझे उन पर तरस आ रहा था — और यही सबसे खराब बात थी। मुझे तरस नहीं आना चाहिए था।
"मुंशीजी," मैंने कहा, और अपनी आवाज़ सुनकर मुझे खुद हैरानी हुई कि वो कितनी शांत थी, "आपने मेरे पापा का नाम उस रजिस्टर में लिखा। आपने उन्हें 'बीमार' लिखकर दफ़ना दिया। और आप कह रहे हैं कि आपका कोई नहीं?"
मुंशीजी ने मेरी तरफ़ देखा, और कुछ पल के लिए उनके चेहरे पर वो सफ़ाई गायब हो गई।
"तेरे पापा का नाम," उन्होंने धीरे से कहा, "मैंने नहीं लिखा था। मैंने तो बस… नक़ल की थी। जो काग़ज़ मेरे पास आया, उससे।"
"किसने दिया था वो काग़ज़?"
मुंशीजी ने होंठ सिकोड़े। फिर उन्होंने कुछ ऐसा कहा जो मेरे पेट में ठंडा उतर गया।
"वो आदमी आज भी आता है," उन्होंने कहा। "हर साल। बरसात के बाद। एक बंद लिफ़ाफ़े में आता है, और उस पर सिर्फ़ एक मोहर होती है। मुझे नाम नहीं पता। मैंने कभी खोलकर नहीं देखा कि कौन भेजता है। मैं बस…"
"बस क्या?" कालू काका आगे आए। उनकी आवाज़ काँप रही थी। "बस पैसा लेकर चुप रहा?"
मुंशीजी ने कालू काका की तरफ़ देखा, और उनकी आँखों में कुछ ऐसा था जो मैंने पहले किसी में नहीं देखा — शर्म। सच्ची, गहरी शर्म, जो इंसान को अंदर से खोखला कर देती है।
"कालू भाई," वो बोले, "तू मुझे क्या समझेगा। तू तो सारी उम्र मिट्टी में रहा। तूने कभी मेरी अलमारी नहीं देखी। मेरे पास एक जोड़ी चप्पल नहीं थी। बीस साल मैंने उसी अखाड़े के काग़ज़ों में सोते हुए बिताए जिन पर मेरा नाम तक नहीं था।"
"और इसलिए तूने उन बच्चों के नाम मिटा दिए?" कालू काका की आवाज़ भर्रा गई। "जो मेरे सामने मिट्टी में पसीना बहाते थे? जिन्हें मैं अपने हाथों से पानी पिलाता था?"
मुंशीजी ने कुछ नहीं कहा।
भीड़ में से एक आवाज़ आई — कोई पुराना पहलवान, जिसके बाल सफ़ेद थे और कंधे अब भी चौड़े थे। "मुंशी, तूने मेरे भाई का नाम भी लिखा था। याद है? राजू। बीस साल पहले। तूने लिखा — 'दिल की बीमारी'। और मेरा भाई मरते वक़्त अपनी छाती पकड़े हुआ था, मुंशी। उसकी छाती में कुछ जल रहा था।"
वो आदमी आगे आया, और उसकी आँखों में आँसू थे।
"मैं उस दिन तेरे पास आया था," वो बोला। "मैंने कहा था — मुंशी, मेरे भाई को कुछ हुआ है, कुछ गड़बड़ है। और तूने मेरा कंधा थपथपाया और कहा — 'भाई, कुदरत का सितम है।'"
मुंशीजी ने अपनी आँखें बंद कर लीं।
"कुदरत का सितम," वो आदमी दोहराया, और उसकी आवाज़ भारी हो गई। "मैंने वो लाइन बीस साल अपने सिर में रखी। हर रात सोचता रहा — कुदरत का सितम। और आज पता चला कि वो सितम एक इंसान था। और वो इंसान तेरे पीछे खड़ा था, मुंशी।"
फिर जो हुआ, वो मैंने सपने में भी नहीं सोचा था।
मुंशीजी घुटनों के बल बैठ गए। उनकी बही उनके सामने धूल में पड़ी थी, और उन्होंने उसे दोनों हाथों से उठाया — जैसे कोई मंदिर में प्रसाद उठाता है — और अपने सिर पर रख लिया।
"मारो," उन्होंने कहा। "जो सज़ा देनी है, दे दो। पर ये बही मत छीनो। इसमें… इसमें मेरी ज़िंदगी है।"
"तेरी ज़िंदगी?" वो बूढ़ा पहलवान चीखा। "इसमें मेरे भाई की ज़िंदगी है, तेरी नहीं!"
वो आगे बढ़ा, पर रणवीर सिंह ने अपनी लाठी की नोक उसकी छाती पर रख दी।
"रुक," उन्होंने कहा। "ये अखाड़ा है। यहाँ हाथ से नहीं, सच से लड़ते हैं।"
वो पहलवान रुक गया, पर उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे। वो पलटकर भीड़ में चला गया, और मैंने उसे अपना चेहरा हाथों में छिपाते देखा।
माँ ने मुंशीजी की तरफ़ देखा। उनका गुस्सा कहीं उतर गया था। अब उनके चेहरे पर सिर्फ़ एक अजीब-सी शांति थी।
"उठ," उन्होंने कहा। "अखाड़े की मिट्टी में घुटने मत टेक। वो तेरे लिए नहीं है।"
मुंशीजी उठे, पर उनके घुटनों में दर्द था। वो लड़खड़ाए, और कालू काका ने — मुझे यक़ीन नहीं हुआ — अपना हाथ बढ़ा दिया।
मुंशीजी ने उस हाथ को देखा, फिर कालू काका को। और फिर उन्होंने वो हाथ थाम लिया।
"मैं सब बताऊँगा," मुंशीजी ने कहा, और उनकी आवाज़ अब टूटी नहीं थी, बस थकी हुई थी। "पर पहले… पहले मुझे वो लिफ़ाफ़े देखने दो जो मैंने बीस साल से छुपाए हैं।"
"कहाँ हैं?" मैंने पूछा।
"मेरे कमरे में। तख़्त के नीचे। एक लोहे का बक्सा है। उसमें हर साल का लिफ़ाफ़ा है। मैंने… मैंने सब फेंका नहीं। मैंने सोचा, शायद एक दिन…"
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