Spirit of a Fighter – Chapter 551
"ऐसा?" मैंने पूछा।
कालू काका ने देखा और उनका चेहरा सफ़ेद पड़ गया।
"हाँ," उन्होंने कहा। "बिलकुल ऐसा।"
मैंने काग़ज़ को पलटा। पीछे की तरफ़ कुछ नहीं था — बस खाली पीलापन।
"काका," मैंने कहा, "उस आदमी ने आपको देखा नहीं। पर आपने उसे देखा। उसकी कोई आवाज़? कोई हरकत?"
कालू काका ने आँखें बंद कीं, जैसे याद कर रहे हों। फिर उन्होंने खोलीं।
"वो गुनगुना रहा था," उन्होंने कहा। "कोई पुराना गीत। मुझे धुन याद है, बोल नहीं।"
"धुन कैसी?" मीरा ने पूछा।
कालू काका ने धीरे से गुनगुनाया — कुछ ऐसा जो किसी शादी के गीत जैसा था, पर उसमें एक सुर टूटा हुआ था।
और तभी मैंने देखा — माँ हिल गई थीं।
वो अपने होंठों पर हाथ रखकर खड़ी थीं, और उनकी आँखें फैल गई थीं।
"माँ?" मैंने कहा।
"वो धुन," माँ ने फुसफुसाया, और उनकी आवाज़ सूख गई थी, "वो मेरे शादी का गीत है।"
अखाड़े में जो लोग खड़े थे, वो सब चुप थे। पर मुझे कुछ सुनाई नहीं दे रहा था। मेरे कान में सिर्फ़ माँ की आवाज़ थी, और वो लगातार दोहरा रही थी — मेरे शादी का गीत।
"माँ," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ काँप रही थी, "आपकी शादी का गीत तहखाने में कौन गुनगुना रहा था?"
माँ ने मेरी तरफ़ देखा, और उनकी आँखों में वो सच था जो मुझे डरा रहा था।
"वो गीत," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ रुक-रुक कर आ रही थी, "सिर्फ़ दो लोग जानते हैं। मैं और…"
"और कौन?" मैंने पूछा।
"तुम्हारे पापा," माँ ने कहा।
मेरे पैरों तले मिट्टी खिसक गई। मैंने कालू काका की तरफ़ देखा, फिर रणवीर सिंह की तरफ़, फिर मीरा की तरफ़। सबके चेहरे पर वही सवाल था जो मेरे दिल में था।
"पर पापा तो…" मैंने कहा।
"मर गए," माँ ने कहा, और उनकी आवाज़ पत्थर जैसी थी। "हाँ। मरे। मैंने उनका मुँह अपने हाथों से बंद किया था। मैंने उन्हें जलाया था। मैं जानती हूँ वो मरे हैं।"
वो रुकीं। उनकी आँखों में पानी था, पर आँसू नहीं गिर रहे थे — जैसे बीस साल से जमा हुआ पानी अब भी नहीं फूटा हो।
"तो वो गीत," उन्होंने कहा, "कोई और गा रहा है। कोई जो वो गीत जानता है।"
और तभी अखाड़े के गेट की तरफ़ से एक आवाज़ आई। कोई हँस रहा था। धीमी, पुरानी हँसी।
मैं पलटा।
गेट पर एक बूढ़ा आदमी खड़ा था। सफ़ेद दाढ़ी, कुबड़ी कमर, हाथ में लाठी। उसने सफ़ेद धोती पहनी थी और उसके माथे पर चंदन का टीका था।
और उसके होंठों पर वो धुन थी।
"कौन है वो?" सुक्खी बुआ ने कहा।
मैंने अपनी आँखें सिकोड़ीं। मेरी नाक में एक गंध आई — चंदन, पुराना काग़ज़, और मिट्टी। वही मिट्टी।
और मैंने उसका चेहरा देखा।
मेरी साँस रुक गई।
वो चेहरा मैंने तस्वीरों में देखा था। रणवीर सिंह के कमरे में, दीवार पर, पुरानी तस्वीरों के बीच। तीन जवान आदमियों की तस्वीर थी — रणवीर सिंह, शेर सिंह, और तीसरा।
तीसरा वही था।
"ये…" रणवीर सिंह ने कहा, और उनकी आवाज़ पहली बार पूरी तरह टूट गई, "ये रघुवीर है।"
अखाड़े में सन्नाटा छा गया।
"रघुवीर?" मीरा ने कहा। "पर रघुवीर तो…"
"मर गया," रणवीर सिंह ने कहा, और उनकी आवाज़ में वो सब था जो बीस साल से दबा हुआ था। "बीस साल पहले। ज़हर से।"
बूढ़ा आदमी गेट से अंदर आया। उसकी लाठी मिट्टी में धँस रही थी। वो धीरे-धीरे चल रहा था, और उसकी हँसी अब बंद हो गई थी।
वो रुका। मेरे सामने।
"वीर सिंह," उसने कहा, और उसकी आवाज़ सूखी थी, पुरानी, "तू बड़ा हो गया।"
मेरी मुट्ठी बंध गई। "आप कौन हैं?"
उसने अपना हाथ उठाया, और उसकी उँगलियों में एक पीला लिफ़ाफ़ा था।
"मैं वही हूँ," उसने कहा, "जिसे तू बीस साल से मरा हुआ समझ रहा था।"
उसने लिफ़ाफ़ा मेरी तरफ़ बढ़ाया।
"और ये," उसने कहा, "तेरे पापा का आख़िरी ख़त है। जो उन्होंने मरने से पहले लिखा था।"
मेरे हाथ काँपे। मैंने लिफ़ाफ़ा नहीं लिया।
"मेरे पापा मरने से पहले बोल नहीं सकते थे," मैंने कहा। "वो ज़हर से मरे थे।"
बूढ़े ने मेरी आँखों में देखा, और उसकी आँखों में वो चीज़ थी जो मुझे अंदर तक डरा गई।
"इसलिए तो," उसने धीरे से कहा, "उन्होंने ये ख़त लिखा था।"
उसने लिफ़ाफ़ा मेरे हाथों में रख दिया।
लिफ़ाफ़ा मेरे हाथ में था, हल्का-सा, जैसे किसी ने सूखी पत्ती रख दी हो। पर मेरी उँगलियाँ उसे ऐसे पकड़े हुए थीं जैसे किसी की कलाई पकड़ी हो।
"आप झूठ बोल रहे हैं," मैंने कहा। आवाज़ मेरी अपनी नहीं लगी।
रघुवीर ने कुछ नहीं कहा। उसने बस अपनी लाठी पर झुककर मेरा हाथ देखा — वो हाथ जो काँप रहा था।
"तू अभी भी वैसा ही है," वो धीरे से बोला। "जब तेरे पापा से पहली बार अखाड़े में मिला था, तब भी उनके हाथ ऐसे ही काँपते थे। डर से नहीं। गुस्से से।"
"मेरे पापा के हाथ काँपते थे, ये आपको कैसे पता?"
"क्योंकि मैंने उन्हें पकड़ा था," रघुवीर ने कहा। "जिस रात उन्हें ज़हर दिया गया, उस रात मैं उनके साथ था।"
अखाड़े में हवा तक रुक गई।
माँ आगे आईं। उनके कदम लड़खड़ा रहे थे, पर आँखों में आग थी। "तू उस रात वहाँ था," माँ ने कहा, और उनकी आवाज़ में बीस साल का ज़हर था, "और तूने मेरे पति को बचाया नहीं?"
रघुवीर ने माँ की तरफ़ देखा। उसकी आँखें नीची हो गईं।
"बचा नहीं सका, बहू," वो बोला। "जिसने ज़हर दिया, उसने मुझे भी पिला दिया था। मैं उसी रात मरा था। पर मरने से पहले शेर सिंह ने मेरा हाथ पकड़ा और कहा — रघु, ख़त ले जा। मेरे बेटे के लिए। जब वो बड़ा हो जाए तब देना।"
"तो आपने बीस साल इंतज़ार क्यों किया?" मेरी आवाज़ फट पड़ी। "मैं आज तक अनाथ की तरह जिया हूँ। आप आज आए?"
रघुवीर की आँखों में कुछ टूटा। वो धीरे-धीरे मेरे पैरों के पास झुका — उसकी कमर ने दर्द से कराह दी — और उसने मुट्ठी में अखाड़े की मिट्टी उठाई।
"ये मिट्टी मेरी नहीं, तेरी है," उसने कहा, और वो मिट्टी मेरे हाथ में रख दी। "मैंने बीस साल इस पर ज़हर बोया। अब तू इसे अपने पसीने से धो दे।"
मेरी साँस रुक गई। उसकी आँखों में पहली बार कुछ दिखा जो मैंने उस आदमी में कभी नहीं सोचा था — सच्चा पछतावा। बीस साल का, जमा हुआ, भारी।
रणवीर सिंह आगे आए। उनका चेहरा पत्थर था, पर हाथ मुट्ठी में बंधे थे। "रघुवीर, तू चाहे जो बोले, अदालत का फ़ैसला तेरे खिलाफ़ है। तुझे जेल जाना होगा।"
"जानता हूँ सर," रघुवीर ने कहा, और वो उठ खड़ा हुआ। "पर जेल जाने से पहले एक आख़िरी बात बताना चाहता हूँ। जिस आदमी ने मुझे ये सब सिखाया, जिसने मेरे हाथ से ज़हर पिलवाया — वो अभी भी बाहर है। और वो ठाकुर महेंद्र सिंह नहीं है।"
रणवीर सिंह का चेहरा बदल गया। "क्या कह रहा है तू?"
रघुवीर ने धीरे से कहा, जैसे हर शब्द तौल रहा हो, "महेंद्र तो बस मोहरा है। असली आदमी वो है जिसके पास बीस साल का सारा असली रजिस्टर है — हर हिसाब, हर नाम, हर रक़म। और वो तुम्हारे गाँव में ही रहता है। तुम्हारे बीच।"
और वो पलटा।
उसकी नज़र भीड़ पर पड़ी। भीड़ चुप थी, हर चेहरा जमा हुआ। और उसकी नज़र रुकी — सीधे मुंशीजी पर।
मुंशीजी का चेहरा सफ़ेद पड़ गया। उनके हाथ से बही खिसक गई और धूल में गिर पड़ी। वो धीरे-धीरे पीछे हटने लगे, और उनके होंठ काँप रहे थे, जैसे कोई शब्द ढूँढ रहे हों और मिल ही नहीं रहा हो।
"मुंशीजी?" मीरा ने धीरे से कहा।
मुंशीजी रुके नहीं। वो और पीछे हटे — और भीड़ ने रास्ता दे दिया।
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