Spirit of a Fighter – Chapter 539
कमरे में चुप्पी। सिर्फ़ दीये की लौ की फुफकार सुनाई दे रही थी।
"मेरी माँ," वैद्य ने कहा, और उसकी आवाज़ टूट गई, "वो मेरी आँखों के सामने मरी। और मैं उसके पास नहीं जा सका, क्योंकि मैं डर गया था। बीस साल मैं इसी झोपड़ी में बैठा रहा, अपनी ही शीशियों के बीच, और हर रात सोचता रहा कि अगर उस दिन मैं बोल पाता, तो कितने बेटे बच जाते।"
उसने अपना चेहरा हाथों में छुपा लिया।
टिंकू उसकी तरफ़ बढ़ा। उसने वैद्य का कंधा पकड़ा।
"वैद्य जी," उसने कहा, "मेरी दुकान जल गई।"
वैद्य ने हाथ हटाए। उसकी आँखें लाल थीं।
"मैं जानता हूँ," उसने कहा। "मैंने धुआँ देखा था।"
"तो जानते हो," टिंकू ने कहा, "कि मैं तुम्हें क्यों नहीं माफ़ करता? तुम बीस साल चुप रहे। तुम्हारी चुप्पी से मेरी दुकान जली।"
वैद्य ने सिर झुकाया।
"माफ़ी मत माँगो," टिंकू ने कहा। "बस ये बताओ कि उस आदमी का पता कहाँ है।"
वैद्य ने सिर उठाया। उसकी आँखों में कुछ बदल गया था।
"पता नहीं," उसने कहा। "पर एक जगह है जहाँ वो हर महीने की पहली रात आता है।"
"कहाँ?"
"पुराना श्मशान। नहर के उस पार।" उसने कहा। "वहाँ एक टूटा मंदिर है। वो वहाँ आता है, और वहाँ वो अपने काग़ज़ जलाता है।"
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसने सिर हिलाया — हाँ।
"आज महीने की कौन सी तारीख़ है?" मैंने पूछा।
मीरा ने मोबाइल देखा। "पहली।"
मेरा पेट ठंडा हो गया।
"तो वो आज रात वहाँ होगा," मैंने कहा।
"नहीं," वैद्य ने कहा। "वो अभी वहाँ है। और वो तुम्हारा इंतज़ार कर रहा है। उसने मुझसे कहा था — 'अगर रघुवीर का बेटा आए, तो उसे बता देना कि मैं उसे श्मशान में मिलूँगा।'"
मैं उठा।
"तो चल।"
"रुको।" मीरा ने मेरा हाथ पकड़ा। "ये जाल है। वो चाहता है कि तू वहाँ जाए।"
"मुझे पता है।"
"तो फिर?"
मैंने उसकी आँखों में देखा।
"मीरा," मैंने कहा, "मेरे पास आधा काग़ज़ है। उसके पास आधा है। अगर मैं आज नहीं गया, तो कल वो काग़ज़ जला देगा, और सच हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा।"
मीरा ने एक पल मेरी आँखों में देखा। फिर उसने मेरा हाथ छोड़ दिया।
"तो मैं साथ चलूँगी," उसने कहा।
"नहीं।"
"वीर।"
"तू घर जा," मैंने कहा। "माँ अकेली है। और गुड़िया। अगर मुझे कुछ हो गया, तो उन्हें कोई चाहिए।"
मीरा की आँखें भर आईं। पर उसने कुछ नहीं कहा।
टिंकू ने अपनी टोपी ठीक की।
"मैं चलूँगा," उसने कहा।
"टिंकू…"
"भाई," उसने कहा, "मेरी दुकान जली है। मेरे पास खोने को कुछ नहीं बचा। और तेरे पास मैं हूँ।"
मैंने उसे देखा। वो मुस्कुराया — वो मुस्कान जो उसके चेहरे पर हमेशा रहती थी, पर आज उसमें कुछ और था। ठंडा ज़ोर।
"ठीक है," मैंने कहा।
वैद्य उठा। उसने अलमारी से एक छोटी शीशी निकाली और मेरी तरफ़ बढ़ाई।
"ये ले," उसने कहा। "इसमें तुलसी और काली मिर्च का तेल है। अगर वो तुम्हें कुछ पिलाने की कोशिश करे, तो ये एक बूँद अपनी ज़ुबान पर रख लेना। ज़हर का असर धीमा हो जाएगा। बस एक मिनट — पर एक मिनट ज़िंदगी होते हैं।"
मैंने शीशी ली।
"वैद्य जी," मैंने कहा, "आपने बीस साल पहले रघुवीर सिंह को दवा दी थी। आज मुझे वो दवा चाहिए।"
वैद्य ने मेरी तरफ़ देखा।
"तू पहलवान बनना चाहता है?" उसने पूछा।
"नहीं," मैंने कहा। "मैं सच को ताकत बनाना चाहता हूँ।"
वैद्य ने एक पल मेरी आँखों में देखा। फिर वो मुड़ा और अलमारी की सबसे ऊपर वाली शेल्फ से एक मिट्टी का बर्तन निकाला।
"ये," उसने कहा, और मेरी हथेली पर रख दिया। "इसमें तहखाने की मिट्टी है। असली मिट्टी। मैंने बीस साल पहले भरी थी। इसे रोज़ सुबह अपने माथे पर लगाना। बस एक उँगली।"
"इससे क्या होगा?"
"कुछ नहीं," उसने कहा। "ये सिर्फ़ याद दिलाएगी कि तू किसकी मिट्टी का बेटा है।"
मैंने बर्तन लिया। वो ठंडा था, और उसमें वो गंध थी — वो गंध जो मैंने तहखाने में सूँघी थी। मिट्टी की, पसीने की, और किसी बहुत पुरानी चीज़ की।
मैंने बर्तन अपने सीने से लगाया।
"चल," मैंने टिंकू से कहा।
हम बाहर निकले। रात अब भी गहरी थी। आसमान में तारे नहीं थे, बस एक ठंडी सी धुंध थी।
मीरा दरवाज़े पर खड़ी रही। जब मैं आधा रास्ता पार कर गया, तो उसने पुकारा।
"वीर!"
मैं रुका।
वो दौड़कर आई। उसने मेरे हाथ में कुछ रखा — एक छोटा सा पत्थर, जो गरम था।
"ये मेरे पिता का है," उसने कहा। "वो इसे अपनी जेब में रखते थे। उन्होंने कहा था — 'जिस दिन ये ठंडा हो जाए, उस दिन मुझे बता देना।' ये आज तक ठंडा नहीं हुआ।"
मैंने पत्थर मुट्ठी में दबाया।
"मीरा," मैंने कहा, "अगर मैं लौटा, तो…"
"अगर तू लौटा," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में पहली बार काँपन आया, "तो मैं तुझे अखाड़े की मिट्टी में गिरा दूँगी। और फिर कभी उठने नहीं दूँगी।"
मैं हँसा। पहली बार उस रात।
"वादा?"
"वादा।"
मैं मुड़ा और टिंकू के साथ श्मशान की तरफ़ बढ़ा। पीछे से मीरा की आवाज़ आई, बहुत धीमी, जैसे हवा में घुल गई हो।
"और वीर — वो पत्थर जेब में रख। मेरे पिता कहते थे, ये डर को दूर रखता है।"
मैंने पत्थर जेब में रखा। वो मेरी जाँघ से चिपका रहा, गरम।
श्मशान के टूटे मंदिर के पास पहुँचे तो सामने एक आग जल रही थी। छोटी सी आग। और उसके पास एक आदमी बैठा था, काग़ज़ जलाते हुए।
वो हमें देखकर नहीं हिला। बस आग में एक और काग़ज़ डाला और बोला, बिना पलटे, "आ गए, वीर सिंह। मैं सोच रहा था, तुम रात भर लगाओगे।"
मैं रुका। मेरी मुट्ठी में वैद्य की शीशी थी, और जेब में मीरा का पत्थर।
"तुम कौन हो?" मैंने पूछा।
वो हँसा। आग की लौ में उसका चेहरा दिखा — चालीस के आस-पास, पतला, चश्मा, और हाथ में बैसाखी।
वही बैसाखी। वही घसीटता बायाँ पैर।
वो उठा। उसने अपना चश्मा उतारा।
और मैं जम गया।
"मैं," उसने कहा, "तुम्हारा वो हिस्सा हूँ जिसे तुमने कभी नहीं देखा।" उसने आग में आखिरी काग़ज़ डाला और मुस्कुराया। "मैं तुम्हारा बड़ा भाई हूँ, वीर। और मैं तुम्हें यहाँ इसलिए बुलाया है कि तुम्हें वो सच बताऊँ जो माँ ने तुमसे छुपाया है।"
उसने जेब से आधा काग़ज़ निकाला और मेरी तरफ़ बढ़ाया।
"देखो," उसने कहा। "हमारे दोनों हिस्से मिलते हैं या नहीं।"
॥
वो आधा काग़ज़ मेरी तरफ़ बढ़ा रहा था, और आग की लौ उसके चश्मे पर ऐसे नाच रही थी जैसे किसी ने आँखों में दो दीये जला दिए हों।
मैंने काग़ज़ नहीं लिया। मेरी मुट्ठी वैद्य की शीशी पर कस गई, और जेब में मीरा का पत्थर जाँघ से चिपका हुआ था, गरम।
"मेरा भाई?" मैंने कहा। "मेरी माँ के तीन बच्चे हैं। मैं, गुड़िया, और बस।"
आदमी मुस्कुराया। वो मुस्कान उसके चेहरे पर अजीब लगी, जैसे किसी और का कपड़ा पहन लिया हो।
"तीन बच्चे गिने तो तूने," उसने कहा। "चौथा गिना कभी?"
उसने बैसाखी ज़मीन पर टिकाई और उसके सहारे थोड़ा झुककर आग के पास बैठ गया। उसका बायाँ पैर सीधा रह गया, न हिला, न मुड़ा। वही घसीटता पैर। वो पैर जो मैंने अखाड़े की दीवार के बाहर कई बार घसीटते सुना था, रातों में, जब मैं चुपके से मिट्टी सूँघने आता था।
"तू वही है," मैंने धीरे से कहा। "रात में अखाड़े के बाहर घूमता है। वो चश्मा। वो बैसाखी।"
"हाँ।" उसने काग़ज़ आग के पास रख दिया, पर जलने नहीं दिया। "दो साल से। तू जब मिट्टी में लेटता था, मैं दीवार के उस पार खड़ा तेरी साँस गिनता था।"
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