Spirit of a Fighter – Chapter 538
"नहीं।" वैद्य ने सिर हिलाया। "जिससे ग्यारह पहलवान मरे, वो मेरी दवा नहीं थी। मेरी दवा में मैंने कभी कुछ मिलाया नहीं। जो उसमें मिलाया गया, वो मेरे हाथ से नहीं गया।"
मीरा ने काग़ज़ निकाला और उसकी तरफ़ बढ़ाया।
"ये काग़ज़ पर आपका नाम है। रणवीर सिंह के हस्ताक्षर के नीचे।"
वैद्य ने काग़ज़ देखा। उसने चश्मा उतारा, आँखों पर हाथ फेरा, फिर फिर पहना।
"मेरा नाम?" उसने कहा। "ये मेरा नहीं है।"
"कैसे?"
"ये रघुनाथ का नाम है," उसने कहा। "पर लिखाई मेरी नहीं है। मेरी लिखाई ऐसी नहीं होती।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "मैं अंगूठा लगाता हूँ, बेटा। मुझे लिखना नहीं आता।"
कमरे में चुप्पी छा गई।
"तो ये नाम किसने लिखा?" मीरा ने पूछा।
वैद्य ने दीये की लौ देखी। उसकी आँखों में कुछ ऐसा आया जो बीस साल से जमा हुआ था।
"बैठो," उसने कहा। "मैं तुम्हें एक कहानी सुनाता हूँ। पर पहले वो दरवाज़ा बंद कर दो।"
मैंने दरवाज़ा बंद किया।
"बीस साल पहले," वैद्य ने कहा, "मैं इसी झोपड़ी में था। रघुवीर सिंह मेरे पास आते थे। हम दोनों… हम दोनों एक ही मिट्टी के थे। उन्होंने मुझे अपना भाई कहा था। और मैंने उन्हें।"
उसकी आवाज़ धीमी हो गई।
"फिर एक दिन रघुवीर ने मुझसे कहा — 'भाई, मुझे एक दवा चाहिए जो पहलवान को ताकत दे, पर उसका शरीर न खाए।' मैंने बनाई। महीनों लगे। और मैंने उसे बनाकर उन्हें दी।"
"फिर?"
"फिर माधव सिंह आया।" वैद्य ने मेरी तरफ़ देखा। "वो मेरे दरवाज़े पर आया, एक रात। हाथ में एक थैली थी, और उसने कहा — 'वैद्य, तुम्हारी दवा से पहलवान ताकतवर हो रहे हैं। ये अच्छी बात नहीं है। तुम इसमें ये मिला दो।' और उसने थैली खोली।"
"उसमें क्या था?"
"मुझे नहीं पता," वैद्य ने कहा। "पर मैंने मना कर दिया। मैंने कहा — 'मैं ज़हर नहीं बनाऊँगा।' और उस रात, मैंने अपनी झोपड़ी का दरवाज़ा बंद कर लिया।"
उसने साँस ली, जैसे बहुत दूर से आ रहा हो।
"तीन दिन बाद रघुवीर के पैर गए। और मुझे पता था कि मेरी दवा से नहीं गए। मेरी दवा में ज़हर नहीं था। किसी ने उसमें मिलाया था। पर मैं किसी को बता नहीं सका, क्योंकि…" उसकी आवाज़ टूटी, "क्योंकि मेरा नाम उसी काग़ज़ पर था जो माधव ने बनवाया था। और अगर मैं बोलता, तो सब मुझे ही ज़हर देने वाला कहते।"
"तो आप चुप रहे?" मेरी आवाज़ में गुस्सा आ गया। "बीस साल आप चुप रहे?"
"हाँ।" उसने मेरी आँखों में देखा। "और इसीलिए आज रात मैंने लालटेन जलाई। मैं जानता था कि तुम आओगे। रघुवीर का बेटा मुझे ढूँढने आएगा।"
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसकी आँखें चौड़ी थीं।
"पर आपने काग़ज़ भेजा क्यों?" मीरा ने कहा। "टिंकू की दुकान पर लाल मोहर वाला काग़ज़? वो आपने भेजा?"
वैद्य ने सिर हिलाया, ना में।
"मैंने कुछ नहीं भेजा," उसने कहा। "पर मैं जानता हूँ किसने भेजा। वो आदमी जो राघव के काग़ज़ों तक पहुँचा। वो मेरे पास भी आया था — दो हफ़्ते पहले। उसने मुझसे पूछा कि रघुवीर की दवा का फ़ॉर्मूला कहाँ है।"
"आपने बताया?"
"नहीं।" उसकी आवाज़ में पहली बार ज़ोर आया। "मैंने कहा — 'वो फ़ॉर्मूला मेरे सीने में है, और सीना तभी खुलेगा जब मैं मरूँगा।' फिर वो चला गया, और उसने कहा — 'वैद्य, तेरा भी वही हाल होगा जो रघुवीर का हुआ।'"
"वो कौन था?"
वैद्य ने अपनी बैसाखी उठाई और उसकी नोक से ज़मीन पर एक निशान बनाया — त्रिकोण और बिंदु।
"ये निशान," उसने कहा, "सिर्फ़ तीन आदमियों के पास था। मेरे पास, रघुवीर के पास, और उस आदमी के पास जिसने ये निशान बनाया था।"
"किसने बनाया?"
"शेर सिंह ने।" वैद्य ने कहा। "भैरव का बाप।"
कमरे में सन्नाटा छा गया। टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा, और उसके होंठ हिले पर आवाज़ नहीं निकली।
"शेर सिंह मरा," मैंने कहा। "बीस साल पहले।"
"शेर सिंह मरा," वैद्य ने कहा। "पर उसका निशान ज़िंदा है। और जो आदमी उस निशान का इस्तेमाल करता है, वो शेर सिंह का बेटा नहीं है। वो उसका… उसका शिष्य है। उसने शेर सिंह के मरने से पहले सब कुछ सीख लिया था।"
मेरे हाथ ठंडे हो गए।
"आप उसे जानते हैं?"
वैद्य ने दीये की तरफ़ देखा। लौ काँप रही थी।
"मैं उसका चेहरा जानता हूँ," उसने कहा। "पर नाम नहीं जानता। वो अपना नाम कभी नहीं बताता। वो सिर्फ़ अपने काम से पहचाना जाता है।"
"कैसे?"
"वो हर काग़ज़ पर अपना अँगूठा लगाता है।" वैद्य ने मेरी तरफ़ देखा। "पर वो अँगूठा असली नहीं होता। वो अँगूठा बनाया हुआ होता है — लकड़ी का। और उस लकड़ी पर त्रिकोण और बिंदु खुदा होता है।"
मीरा ने अचानक मेरा हाथ पकड़ा।
"वीर," उसने कहा। "कालू काका।"
मैं उसकी तरफ़ पलटा।
"कालू काका ने कहा था कि भैरव ने उनसे भी अँगूठा लगवाया था।"
मेरा दिल रुक गया।
"वो अँगूठा," मैंने धीरे से कहा, "असली था या लकड़ी का?"
मीरा ने कुछ नहीं कहा। पर उसकी आँखों में जवाब था।
मैं वैद्य की तरफ़ पलटा।
"वैद्य जी," मैंने कहा, "आपने कहा कि रघुवीर की दवा का फ़ॉर्मूला आपके सीने में है। अगर मैं उसे निकालना चाहूँ तो?"
वैद्य ने एक पल मुझे देखा। फिर उसने अपनी कमीज़ का बटन खोला।
उसके सीने पर, बाईं तरफ़, एक पुराना निशान था — जला हुआ। और उस निशान के ऊपर, काले धागे से बँधी, एक छोटी सी थैली लटक रही थी।
"ये थैली," उसने कहा, "मैंने बीस साल पहले बाँधी थी। जिस दिन रघुवीर के पैर गए, उस रात। मैंने कसम खाई थी कि जिस दिन कोई रघुवीर का बेटा मेरे दरवाज़े पर आएगा, उस दिन ये थैली खुलेगी।"
उसने थैली खोली। अंदर एक छोटा सा काग़ज़ था, जो मुड़ा हुआ था और दो हिस्सों में फटा था।
"ये आधा काग़ज़ मेरे पास है," वैद्य ने कहा। "आधा उस आदमी के पास है जिसने इसे फाड़ा था। जिस दिन दोनों हिस्से मिलेंगे, उस दिन पता चलेगा कि असली ज़हर किसने बनाया था।"
मैंने काग़ज़ लिया। आधा काग़ज़। ऊपर कुछ लिखा था, और नीचे एक मोहर।
"इस पर क्या है?"
"रघुवीर की लिखाई में एक गवाही," वैद्य ने कहा। "और एक नाम।"
"किसका?"
वैद्य ने मेरी आँखों में देखा। उसकी आँखें पानी से भरी थीं, पर आवाज़ साफ़ थी।
"तुम्हारे मामा का," उसने कहा। "राघव का।"
मेरे हाथ से काग़ज़ छूटने लगा। मैंने उसे बचाया।
"राघव?" मैंने कहा। "वो तो भाग गया। वो तो…"
वैद्य ने सिर हिलाया।
"वो भागा नहीं," उसने कहा। "वो बंधक है। और जिसने उसे बंधक बनाया है, वो तुम्हारे मामा से ये आधा काग़ज़ छीनना चाहता है। वो जानता है कि राघव के पास क्या है।"
मीरा ने धीरे से कहा, "तो राघव ने झूठ नहीं बोला था जब उसने कहा था कि उसकी बेटी बंधक है।"
"नहीं," वैद्य ने कहा। "पर वो आधी बात बोला। बंधक सिर्फ़ उसकी बेटी नहीं है। बंधक वो खुद है — अपने ही डर का।"
टिंकू ने अचानक कुर्सी की तरफ़ बढ़कर कहा, "वैद्य जी, मेरे पास एक सवाल है।"
"पूछो।"
"आपने ये थैली बीस साल पहले बाँधी थी। आप जानते थे कि कोई आएगा। तो आपने बीस साल इंतज़ार क्यों किया? आप गाँव आकर सबको बता सकते थे।"
वैद्य एक पल चुप रहा। फिर उसने अपनी बैसाखी उठाई और दिखाई।
"मेरी एक टाँग है, बेटा," उसने कहा। "और मेरा मुँह भी बीस साल पहले बंद कर दिया गया था। जिस रात रघुवीर के पैर गए, उस रात माधव सिंह के दो आदमी मेरे पास आए थे। उन्होंने मेरी टाँग तोड़ी, और मेरी ज़ुबान पर चाकू रखकर कहा — 'वैद्य, अगर तूने एक शब्द बोला, तो तेरी बूढ़ी माँ जो काशी में रहती है, उसका मुँह कल से खाना नहीं देखेगा।'"
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