Spirit of a Fighter – Chapter 537
"वो काग़ज़ मीरा मैडम के पास है।"
"तो चल। हम उसे यहीं उठाकर पढ़ते हैं। और सुबह होने से पहले उस वैद्य का घर ढूँढते हैं।"
टिंकू उठा। उसने आख़िरी बार चूल्हे को छुआ, फिर अपनी टोपी ठीक की।
"भाई," वो बोला, "एक बात कहूँ?"
"कह।"
"अगर ये दुकान जाती है, तो मैं मिठाई सड़क पर बनाऊँगा। पर मैं उस वैद्य को उस नींद से जगाऊँगा जिसमें उसने रणवीर सिंह को सुलाया था।"
हम बाहर निकले। रात गहरी थी और नहर की तरफ़ से ठंडी हवा आ रही थी। मीरा दरवाज़े पर खड़ी काग़ज़ पकड़े थी, और उसकी आँखें लालटेन की लौ में चमक रही थीं।
"वीर," उसने कहा, "नाम है — वैद्य रघुनाथ। और पता…" वो रुकी। उसकी उँगली काग़ज़ पर काँपी।
"क्या?"
"पता है — हमारे गाँव का कुआँ।"
मैं जम गया।
"कुआँ?"
"हाँ," मीरा ने कहा। "पुराना कुआँ। वही जिसकी सीढ़ियाँ भैरव ने तुड़वाई थीं।"
मेरे हाथ में मिट्टी की थैली थी — वही जो गुड़िया ने दी थी। मैंने उसे मुट्ठी में दबाया। ठंडी थी।
"तो वो वैद्य," मैंने धीरे से कहा, "कुएँ के नीचे है। उसी तहखाने में। जहाँ सब कुछ शुरू हुआ था।"
टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा। "तो चलें?"
मैंने नहर की तरफ़ देखा। वो छोटी लालटेन की रोशनी अब भी जल रही थी — बिल्कुल स्थिर, जैसे कोई हमारा ही इंतज़ार कर रहा हो।
"नहीं," मैंने कहा। "पहले एक काम।"
"क्या?"
"उस लालटेन वाले को देखना। क्योंकि जो आदमी आज रात काग़ज़ लेकर आया, उसने कहा था — साहब ने कहा था कि तुम लोगों को ढूँढना पड़ेगा। मतलब साहब जानता था कि हम कहाँ होंगे।"
मीरा ने काग़ज़ नीचे किया। "मतलब कोई हमें देख रहा है।"
"हाँ," मैंने कहा। "और वो कोई हमारे बीच से ही देख रहा है।"
ठंडी हवा एक बार फिर आई। नहर के पुल की लालटेन एक पल के लिए हिली — जैसे किसी ने उसे उठाया हो।
और फिर बुझ गई।
॥
लालटेन बुझी, और अँधेरा ऐसा उतरा जैसे किसी ने नहर पर कंबल डाल दिया हो।
टिंकू ने मेरी बाँह पकड़ी। उसकी उँगलियाँ ठंडी थीं।
"भाई, वो बुझी नहीं। किसी ने बुझाई।"
"पता है।" मैंने मीरा की तरफ़ हाथ बढ़ाया। "काग़ज़ मुझे दे।"
उसने दिया। मैंने काग़ज़ को नाक के पास लाया और गहरी साँस खींची। काग़ज़ की गंध में एक चीज़ और थी — वो स्याही। वो हल्की सी कड़वी गंध जो मैंने राघव के काग़ज़ों में सूँघी थी, वो गंध जो मैंने मुंशीजी की फ़ाइल में पहचानी थी।
"ये काग़ज़ राघव के दफ़्तर से आया है," मैंने कहा। "स्याही वही है।"
मीरा ने एक पल सोचा, फिर बोली, "नहीं। राघव तो भाग गया। उसके दफ़्तर पर अब किसी और का हाथ है।"
"मतलब वही आदमी," टिंकू ने धीरे से कहा, "जिसके पास राघव के काग़ज़ हैं।"
हम तीनों नहर के पुल की तरफ़ बढ़े। पुल तक जाने वाली पगडंडी पर घास गीली थी, और हवा में पानी की गंध के साथ कुछ और था — मिट्टी के तेल की तीखी बू। जैसे कोई लालटेन लेकर यहाँ से अभी-अभी गुज़रा हो।
पुल के पास पहुँचे तो लालटेन वाला नहीं था। बस पत्थर के किनारे पर एक जगह तेल की गोली थी, और उसके अगल-बगल पैरों के निशान।
मैं झुका। निशान मुझे परिचित लगे — बायाँ पैर दायें से थोड़ा घसीटता था।
मेरा पेट ठंडा हो गया।
"ये निशान," मैंने कहा, "मैंने आज दिन में देखे हैं। पंचायत के चबूतरे के पीछे।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। "किसके?"
"मुझे नाम नहीं पता," मैंने कहा। "पर जब मैं मंच पर चढ़ा था, तब भीड़ के पीछे कोई खड़ा था। बैसाखी टेक रहा था।"
हम वापस चले। रास्ते में मीरा ने काग़ज़ को मोड़कर अपने बैग में रखा और बोली, "वीर, वैद्य रघुनाथ का पता कुएँ वाला है। पर कुएँ की सीढ़ियाँ टूटी हैं, और तहखाने में भैरव के आदमी थे। अब तहखाना पुलिस के हाथ में है।"
"तो?"
"तो वैद्य वहाँ नहीं होगा," उसने कहा। "वो अपने पते पर नहीं रहता। रघुवीर सिंह ने एक बार मुझे बताया था कि जो आदमी ज़हर बनाता है, वो कभी अपनी रसोई का पता नहीं देता।"
"फिर हम क्या करें?"
टिंकू ने अचानक कदम रोक लिए।
"रुको," वो बोला। "मुझे कुछ याद आ रहा है। जब मैं छोटा था, मेरी माँ मुझे एक वैद्य के पास ले गई थी — पेट में कीड़े के लिए। वो वैद्य गाँव के बाहर था, नहर के उस पार, जहाँ पुरानी ईंटों की भट्ठी है। उसने मुझे कड़वा पाउडर खिलाया था। और उसने माँ से कहा था — 'बहन, अब इसे मीठा मत खिलाना, वरना कीड़े वापस आ जाएंगे।'"
मैंने उसे देखा।
"उस वैद्य का नाम?"
"नाम नहीं पता," टिंकू ने कहा। "पर उसके दरवाज़े पर एक लोहे का त्रिकोण लटका था। साथ में एक बिंदु।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "वही निशान जो तेरी शीशी पर था।"
मेरा दिल एक बार ज़ोर से धड़का।
"तो चल।" मैंने कहा। "अभी।"
"अभी?" मीरा ने घड़ी की तरफ़ देखा। "रात के दो बज रहे हैं।"
"वैद्य सोया होगा," टिंकू ने कहा।
"वैद्य नहीं सोया," मैंने कहा। "जिसने अभी-अभी लालटेन बुझाई है, वो सो नहीं रहा। वो हमें देख रहा है।"
हम नहर के पुल से उतरकर ईंटों की भट्ठी की तरफ़ बढ़े। रास्ता पथरीला था और टिंकू की चप्पल बार-बार फिसल रही थी। मीरा ने अपना बैग कसकर पकड़ लिया।
भट्ठी दूर से टूटी हुई दीवार जैसी दिख रही थी। उसके पीछे एक झोपड़ी थी, और झोपड़ी के दरवाज़े पर — मैंने आँखें सिकोड़ीं — हाँ, वही लोहे का त्रिकोण, और बीच में बिंदु।
दरवाज़ा बंद था। पर ऊपर की खिड़की से धुआँ निकल रहा था। रात के दो बजे धुआँ।
"कोई जाग रहा है," मीरा ने धीरे से कहा।
मैंने दरवाज़ा खटखटाया। अंदर से कोई आवाज़ नहीं आई। मैंने फिर खटखटाया, ज़ोर से।
"वैद्य जी," मैंने कहा। "हम दवा के लिए आए हैं।"
एक पल चुप्पी। फिर अंदर से लकड़ी की चरमराहट। दरवाज़ा खुला।
सामने एक बूढ़ा आदमी खड़ा था। बहुत बूढ़ा — सत्तर से ऊपर। कमर झुकी हुई, सिर पर सफ़ेद बालों की पतली परत, आँखों पर मोटा चश्मा। एक हाथ में बैसाखी, दूसरे में दीया।
"दवा के लिए?" उसने कहा। आवाज़ सूखी थी, जैसे पुरानी लकड़ी। "रात के दो बजे?"
"हमें देर हो गई," मैंने कहा।
उसने दीया थोड़ा ऊपर किया और हम तीनों के चेहरे देखे। उसकी नज़र मेरे चेहरे पर रुकी। फिर मेरे कंधों पर। फिर मेरे हाथों पर।
और उसका चेहरा बदल गया।
"तू…" उसने धीरे से कहा। "तू रघुवीर का बेटा है।"
मैं जम गया।
"तूने मुझे कैसे…"
"तेरे नाक में," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में एक अजीब सी हँसी थी, "तेरे नाक में उसकी गंध है। मैं बीस साल से उस गंध को भूला नहीं हूँ।"
मीरा ने मेरी कलाई पकड़ी। मैंने उसे महसूस किया।
"आप वैद्य रघुनाथ हैं?" मैंने पूछा।
"हाँ।" वो पीछे हटा और दरवाज़ा खोल दिया। "अंदर आ।"
झोपड़ी के अंदर सैकड़ों शीशियाँ थीं — अलमारियों में, ज़मीन पर, खूँटियों पर लटकी हुईं। हर शीशी पर एक काग़ज़ चिपका था। और हवा में इतनी गंध थी कि मेरा सिर चकरा गया — अदरक, हल्दी, काली मिर्च, तुलसी, और उसके नीचे… उसके नीचे वो कड़वी गंध। वो गंध जो मैंने लुट्टन के पसीने में सूँघी थी।
मैंने अपनी नाक पर हाथ रख लिया।
"आप बनाते हैं," मैंने कहा। "वो ज़हर। आप बनाते हैं।"
वैद्य मुड़ा। उसने दीया मेज़ पर रखा और धीरे से बैठ गया, जैसे उसके पैर अब और नहीं उठा सकते थे।
"मैं बनाता हूँ," उसने कहा। "पर वो ज़हर नहीं है, बेटा। वो दवा है।"
"दवा?" टिंकू की आवाज़ फूट पड़ी। "जिससे ग्यारह पहलवान मरे?"
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