Spirit of a Fighter – Chapter 517
रणवीर सिंह ने अपनी आँखें बंद कीं। फिर खोलीं।
"हाँ," उन्होंने कहा। "दयाराम ने मुझे उस रात बचाया था। पर उसने मुझे ये नहीं बताया कि ज़हर किसने दिया। उसने कहा कि कोई अजनबी था। बीस साल मैं यही सोचता रहा।"
"तो आप जानते थे?" मीरा ने कहा। उसकी आवाज़ में वो तेज़ी थी जो अब तक सिर्फ़ सबूतों में थी। "पापा, आप जानते थे कि दयाराम भैरव के साथ था?"
रणवीर सिंह ने धीरे से सिर हिलाया। "नहीं। मुझे शक था, पर सबूत नहीं। और दयाराम वो आदमी था जो मेरे पास रोज़ आता था, मेरी दवा लाता था, मेरी बेटी को स्कूल छोड़ता था। उस पर शक करने के लिए मेरे पास कुछ नहीं था।"
दयाराम ने एक कदम आगे बढ़ाया। दो सिपाही उनके पीछे थे, पर उन्होंने उन्हें रोका नहीं। वो सीधे भैरव की तरफ़ बढ़े।
"भैरव," दयाराम ने कहा। "या जो भी तेरा नाम है। तूने मेरा नाम क्यों लिया?"
भैरव ने उनकी तरफ़ देखा। उसके होंठों पर वो थकी हुई मुस्कान थी जो आज पहली बार आई थी।
"क्योंकि तूने मुझे बेचा था," भैरव ने कहा। "बीस साल पहले। जब मैं पंद्रह साल का था और तहखाने में ज़हर बनाना सीख रहा था। तू आया था माधव के साथ। तूने मुझे देखा और कहा — 'ये लड़का तो अच्छा है, इसे अखाड़े का मालिक बना दो।' और माधव ने हँसकर कहा — 'ये तो मेरा बेटा है, इसका तो काम ही यही है।'"
दयाराम का चेहरा पहली बार बदला। उनका चश्मा फिसल गया, उन्होंने उसे उँगली से ऊपर धकेला।
"तूने ये बात किसी को नहीं बताई," दयाराम ने कहा।
"क्यों बताता?" भैरव ने कहा। "तूने मुझे नहीं बेचा था। तूने मुझे खरीदा था। तूने मेरी माँ को तहखाने में बंद करवाया, और मुझे माधव के हाथ में सौंप दिया। तू वो आदमी है जिसने मेरी ज़िंदगी का पहला सच छुपाया।"
कमला ने आगे कदम बढ़ाया। उसकी आँखों में अब वो पानी नहीं था जो अभी था। अब उसमें आग थी।
"दयाराम," कमला ने कहा। "तूने मुझसे वादा किया था। उस रात तहखाने में। तूने कहा था कि तू मेरे बेटे को माधव के हाथ से बचाएगा। और तूने क्या किया? तूने उसे माधव के हाथ में दे दिया, और मुझे कुएँ में बंद करवा दिया।"
दयाराम ने अपनी आँखें बंद कर लीं।
"मैं तुम्हें बचाने की कोशिश कर रहा था," उन्होंने धीरे से कहा। "माधव पागल हो गया था। उसे लगता था कि उसका बेटा उससे छिन जाएगा। अगर मैं तुम्हें और मोहन को उससे दूर भेज देता, तो वो तुम दोनों को मरवा देता। मेरे पास कोई रास्ता नहीं था।"
"झूठ," माँ ने कहा। उनकी आवाज़ में वो दम था जो पूरे चबूतरे पर गूँजा। "तू माधव के डर से नहीं डर रहा था। तू अपने बेटे से डर रहा था। तुझे लगता था कि अगर सच खुला, तो तेरा लुट्टन भी इस जाल में फँस जाएगा। इसलिए तू चुप रहा। बीस साल।"
दयाराम ने माँ की तरफ़ देखा। और फिर उन्होंने वो किया जो किसी को उम्मीद नहीं थी। उन्होंने अपनी वर्दी की टोपी उतारी, अपने घुटनों के बल ज़मीन पर बैठ गए, और अपना सिर झुका लिया।
"मैंने गुनाह किया," दयाराम ने कहा। "मैंने सच छुपाया। मैंने माधव को बढ़ावा दिया। मैंने अपने बेटे को उस जाल में धकेला। पर मैंने किसी को ज़हर नहीं पिलाया।"
"तूने मेरे पति को ज़हर पिलाने से नहीं रोका," माँ ने कहा। "ये भी गुनाह है।"
दयाराम ने सिर उठाया। उनकी आँखों से पानी बह रहा था। "हाँ," उन्होंने कहा। "ये भी गुनाह है।"
चबूतरे पर सन्नाटा था। इतना गहरा कि दूर नहर की आवाज़ भी सुनाई दे रही थी।
तभी भैरव ने अपने हाथ आगे बढ़ाए, कलाई जोड़ी, और उसी एक हरकत में उसने अपनी लाल धोती फाड़कर हाथ बाँध लिए।
"मैं हारा," उसने कहा। आवाज़ में कोई ज़ोर नहीं था। "मैंने बीस साल बोतलें घोलीं। मैंने पहलवानों को बीमार किया। मैंने पैसा माधव के पास भेजा। मैंने अपने हाथों से अपने पापा की धोती सी, और उसी धोती में अपने पापा का क़त्ल किया।"
उसने घुटने के बल ज़मीन पर हाथ टेके। माथा मिट्टी पर रखा।
"मैं हारा," उसने फिर कहा। "मैंने खुद को हराया।"
पूरा गाँव देख रहा था। सुक्खी बुआ ने अपना पान का बीड़ा थूक दिया और अपने मुँह पर हाथ रख लिया। बसंता के बूढ़े बाप ने अपनी लाठी ज़मीन पर पटक दी। औरतें अपने बेटों के नाम जप रही थीं, धीरे-धीरे।
और तभी रणवीर सिंह ने अपने हाथ व्हीलचेयर की पहियों पर रखे।
"मीरा," उन्होंने कहा। "मुझे खड़ा कर।"
मीरा ने उनकी तरफ़ देखा। उसके चेहरे पर डर था। "पापा, आप…"
"खड़ा कर," रणवीर सिंह ने कहा। "आज मैं बैठकर नहीं देखूँगा।"
मीरा ने उनका हाथ पकड़ा। टिंकू दूसरी तरफ़ से आया। दोनों ने उन्हें सहारा दिया। रणवीर सिंह की टाँगें काँप रही थीं, उनके चेहरे पर पसीना था, पर वो खड़े हो गए।
पूरे चबूतरे ने साँस रोक ली।
रणवीर सिंह ने धीरे-धीरे कदम बढ़ाए। एक कदम। रुके। फिर दूसरा। मीरा और टिंकू दोनों तरफ़ थे, पर उनका शरीर खुद ही चल रहा था — जैसे बीस साल की सून्नता को उसने आज तोड़ दिया हो।
वो भैरव के सामने पहुँचे। भैरव ने सिर उठाया। उसकी आँखें लाल थीं।
रणवीर सिंह ने अपना हाथ बढ़ाया। मैंने सोचा वो उसे मारेंगे। चबूतरे पर सब ने यही सोचा।
पर रणवीर सिंह ने अपना हाथ भैरव के सिर पर रख दिया। जैसे कोई बूढ़ा बाप अपने बेटे के सिर पर हाथ रखता है।
"मैंने तुझे बेटा माना था," रणवीर सिंह ने कहा। उनकी आवाज़ काँप रही थी, पर साफ़ थी। "जब तू दस साल का था, मेरी गोद में बैठता था। मैंने तुझे कुश्ती के दाँव सिखाए थे। मैंने सोचा था कि एक दिन तू मेरे अखाड़े का नाम रोशन करेगा।"
भैरव की आँखों से पानी बहने लगा। उसने कुछ कहना चाहा, पर आवाज़ नहीं निकली।
"तूने मेरा भरोसा ज़हर में बदल दिया," रणवीर सिंह ने कहा। "पर आज मैं तुझसे नफ़रत नहीं करूँगा। क्योंकि जो आदमी तुझे बनाया, वो मेरा दोस्त था। और मैं उससे नफ़रत करता हूँ।"
उन्होंने हाथ नीचे किया। फिर मुश्किल से पलटे, और मीरा और टिंकू के सहारे वापस अपनी कुर्सी की तरफ़ बढ़े। हर कदम पर उनकी साँस फूल रही थी, पर वो रुके नहीं।
मैंने माँ की तरफ़ देखा। उनकी आँखों में पानी था, पर होंठ सख़्त थे।
तभी माधव सिंह ने भागने की कोशिश की।
वो चबूतरे के पीछे से खिसककर भीड़ में घुसने लगे। उनकी सफ़ेद धोती धूल में घसीट रही थी, उनके बाल बिखर गए थे। कोई बीस साल का सरपंच नहीं, कोई बूढ़ा आदमी भाग रहा था।
पर दयाराम पहले से उठ चुके थे। उन्होंने अपना हाथ बढ़ाया और माधव सिंह का कंधा पकड़ लिया।
"रुक जा, माधव," दयाराम ने कहा। "अब कहाँ जाएगा? तेरे पास कोई जगह नहीं बची।"
माधव सिंह ने उनकी तरफ़ देखा। उनका चेहरा टूट गया था।
"तू भी तो मेरे साथ था," माधव ने कहा। "दयाराम, तू भी तो इस खेल में था। अगर मैं डूबा, तो तू भी डूबेगा।"
दयाराम ने उनका कंधा नहीं छोड़ा। "मैं डूबूँगा," उन्होंने कहा। "पर तुझे अपने साथ नहीं ले जाऊँगा। बीस साल मैंने तेरे साथ रहकर अपने बेटे को खोया। अब मैं उसे वापस नहीं पा सकता। पर कम से कम सच तो बचा लूँ।"
पुलिस आगे बढ़ी। इंस्पेक्टर ने माधव सिंह की कलाई पकड़ी और कड़ी चढ़ा दी। माधव सिंह ने एक बार मेरी तरफ़ देखा।
"तेरे पापा ने भी तो ज़हर पिया था," उन्होंने कहा। "तेरे पापा भी तो शेर सिंह के साथ उसी खेल में थे। तू किसका बदला ले रहा है, वीर सिंह?"
मैंने उनकी तरफ़ देखा। मेरा गला सूख रहा था, पर मेरी आवाज़ साफ़ निकली।
"मैं बदला नहीं ले रहा," मैंने कहा। "मैं सच बोल रहा हूँ। और सच किसी का बदला नहीं होता।"
माधव सिंह हँसे। वो हँसी खोखली थी, जैसे कोई खाली घड़ा बज रहा हो।
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno