Spirit of a Fighter518 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 518

7 min read November 5, 2026

"सच," उन्होंने कहा। "सच बड़ी महँगी चीज़ है, बेटा। इसे खरीदने के लिए बहुत कुछ बेचना पड़ता है। देख लेना, तू क्या-क्या बेचेगा।"

पुलिस उन्हें ले गई। भैरव भी उनके पीछे-पीछे चला, सिर झुकाए, हाथ बँधे।

और फिर भीड़ के बीच से कोई चीखा।

"ठहरो!"

मैं पलटा। सुक्खी बुआ थीं। उनकी साड़ी का पल्लू गिर गया था, वो उसे उठाना भूल गईं थीं।

"मैंने बीस साल पहले एक बात सुनी थी," सुक्खी बुआ ने कहा। "उस रात जब शेर सिंह मरे थे। मैं नहर किनारे से जा रही थी। मैंने देखा था कि रघुवीर सिंह नहर किनारे खड़े थे, और उनके हाथ में एक शीशी थी। उसी तरह की शीशी जैसी आज मीरा ने दिखाई।"

सबने रणवीर सिंह की तरफ़ देखा। वो अपनी कुर्सी पर बैठ चुके थे, साँस फूल रही थी।

"वो शीशी मेरी थी," रणवीर सिंह ने कहा। "मैं उस रात शेर सिंह को बचाने आया था। पर वो पहले ही खुराक पी चुका था। मैंने उसके मुँह में दवा डालने की कोशिश की, पर वो… वो मेरे हाथ में ही मर गया।"

उनकी आवाज़ टूट गई। मीरा ने उनका हाथ पकड़ लिया।

"बीस साल मैंने ये सोचकर अपने आप को कोसा," रणवीर सिंह ने कहा, "कि अगर मैं देर से नहीं आया होता, तो शेर सिंह बच जाता। पर आज पता चला कि ज़हर उसे किसने दिया।"

उन्होंने माधव सिंह की पीठ की तरफ़ देखा, जो अब पुलिस की गाड़ी की तरफ़ जा रहा था।

"उसने मेरे दोस्त को मारा," रणवीर सिंह ने कहा। "और मुझे बीस साल तक ये यक़ीन दिलाया कि मैं ही कातिल हूँ।"

मैंने अपना सिर नीचा कर लिया। मेरे हाथ में अभी भी वो जला हुआ पन्ना था। मैंने उसे फिर से पढ़ा।

नाम के नीचे एक और लाइन थी, जो अब तक छुपी थी।

"और रघुवीर, अगर तू ये पढ़ रहा है, तो जान ले कि दयाराम का बेटा लुट्टन भी इस खेल में फँसा है। उसे बचा लेना। वो इस जाल का हिस्सा नहीं, वो इस जाल का शिकार है।"

मैंने लुट्टन की तरफ़ देखा। वो अपनी पट्टी को छू रहा था, बार-बार, जैसे उसे यक़ीन दिलाना चाह रहा हो कि वो अभी भी ज़िंदा है।

"लुट्टन," मैंने कहा।

उसने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में डर था। सच्चा डर।

"तू मेरे साथ था," मैंने कहा। "सुरंग में। जब भैरव के आदमी आए। तूने मेरी जान बचाई थी।"

लुट्टन ने होंठ काटे। "मुझे नहीं पता था," उसने कहा। "मुझे नहीं पता था कि मेरा बाप…"

"अब पता है," मैंने कहा। "अब क्या करेगा?"

लुट्टन ने दयाराम की तरफ़ देखा। दयाराम पुलिस के बीच खड़े थे, अपनी टोपी हाथ में लिए। पिता-बेटे की आँखें मिलीं।

दयाराम ने धीरे से सिर हिलाया। जैसे कह रहे हों — मत कर।

लुट्टन ने अपनी पट्टी खोली। उसके घाव से खून अब भी रिस रहा था। वो इंस्पेक्टर की तरफ़ बढ़ा।

"सर," उसने कहा। "मैं गवाही दूँगा। मैंने बीस साल से ज़हर पीया है। मैं जानता हूँ कि कौन-कौन पीता था। मैं नाम बताऊँगा। सबके।"

इंस्पेक्टर ने उसकी तरफ़ देखा। "तू खुद भी आरोपी है।"

"जानता हूँ," लुट्टन ने कहा। "पर मैं बीस साल से अपने बाप की ग़लती ढो रहा हूँ। अब नहीं ढोऊँगा।"

दयाराम ने अपनी आँखें बंद कर लीं। मैंने देखा उनके होंठ हिल रहे थे — कुछ ऐसा, जो कोई बाप अपने बेटे के लिए कहता है, चुपचाप।

माधव सिंह को गाड़ी में बिठाया जा रहा था। उन्होंने गाड़ी की खिड़की से बाहर झाँका। उनकी आँखें एक बार फिर मेरी तरफ़ आईं।

"वीर सिंह," उन्होंने कहा, "तेरे पापा ने भी तो खून बहाया था। तूने कभी सोचा, उनकी माँ कैसे मरी?"

मैं रुक गया। गाड़ी का दरवाज़ा बंद हुआ, और गाड़ी धूल उड़ाती चली गई।

मैं चबूतरे पर खड़ा रह गया। मेरे हाथ में जला हुआ पन्ना था, और मेरे सामने माँ थीं, जो अब मेरी तरफ़ नहीं देख रही थीं। वो ज़मीन की तरफ़ देख रही थीं, जैसे ज़मीन में कोई जवाब छुपा हो।

"माँ," मैंने कहा। "माधव किसकी बात कर रहा था?"

माँ ने कोई जवाब नहीं दिया।

"माँ," मैंने फिर कहा। मेरी आवाज़ काँप रही थी। "किसकी माँ?"

माँ ने सिर उठाया। उनकी आँखों में वो सच था जो बीस साल से दबा हुआ था, और जो अब फूटने को बेकाबू था।

"तेरे पापा की माँ," उन्होंने कहा, "मेरी सास। वो अचानक बीमार पड़ीं और चल बसीं। उस वक़्त तेरे पापा अखाड़े में थे। और मैं… मैंने उन्हें बताया नहीं। मैंने सोचा, वो लौटकर आएँगे, तब बताऊँगी।"

माँ की आवाज़ रुक गई। उन्होंने अपनी आँखें पोंछीं।

"जब वो लौटे," माँ ने कहा, "तो मैंने उन्हें बताया। वो बैठ गए। एक शब्द नहीं बोले। तीन दिन तक कुछ नहीं खाया। और फिर… फिर वो उसी बीमारी से गए।"

मैंने देखा कि माँ के हाथ काँप रहे थे। मैंने उनका हाथ पकड़ा। उनकी हथेली ठंडी थी, पर उनके हाथों में वो छाले थे जो चक्की चलाने से आए थे।

"माधव ये क्यों बोला?" मैंने पूछा। "वो क्या कहना चाहता था?"

माँ ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में आँसू थे, पर उनकी आवाज़ साफ़ थी।

"क्योंकि वो जानता है," माँ ने कहा, "कि तेरे पापा की माँ को भी ज़हर दिया गया था। और वो ज़हर किसने दिया, ये सिर्फ़ दो लोग जानते थे। एक माधव। और दूसरा… दूसरा वो जो आज हिरासत में है।"

मेरे हाथ से पन्ना छूट गया। वो धूल में गिरा, और हवा ने उसे उड़ा दिया।

"भैरव?" मैंने कहा।

माँ ने सिर हिलाया। "भैरव नहीं। उस वक़्त भैरव सिर्फ़ बारह साल का था। ज़हर बनाना सीख रहा था, पर बोतलें अभी उसके हाथ में नहीं थीं। उस वक़्त बोतलें किसी और के हाथ में थीं।"

मैंने चबूतरे के चारों तरफ़ देखा। गाँव के लोग धीरे-धीरे बिखर रहे थे। औरतें अपने बेटों के नाम बुदबुदा रही थीं। बूढ़े अपनी लाठियों के सहारे उठ रहे थे।

और चबूतरे के सबसे कोने में, एक आदमी खड़ा था — जो अभी तक कुछ नहीं बोला था।

मैंने उसकी तरफ़ देखा। मेरी नाक में एक गंध आई। पुरानी किताब की गंध। स्याही और सूखी स्याही की। और उसके नीचे, बहुत गहरे में, कुछ और — हल्दी और तेल की गंध।

वो मुंशीजी थे।

और वो मेरी तरफ़ देखकर मुस्कुरा रहे थे। वो मुस्कान वैसी नहीं थी जैसी बीस साल से मैं देखता आया था। वो मुस्कान किसी और की थी।

मैं उनकी तरफ़ बढ़ा। मेरे कदम भारी थे। मेरे कानों में माधव की आवाज़ गूँज रही थी — "तूने कभी सोचा, उनकी माँ कैसे मरी?"

"मुंशीजी," मैंने कहा।

मुंशीजी ने अपनी फ़ाइल बगल में दबाई और मेरी तरफ़ देखा। "हाँ, बेटा?"

"वो पन्ना," मैंने कहा। "जो भैरव ने फाड़कर छुपाया था। जिस पर एक और खिलाड़ी का नाम लिखा था। क्या वो नाम आपका है?"

मुंशीजी की मुस्कान नहीं मिटी। उन्होंने अपनी फ़ाइल खोली, उसमें से एक पुराना काग़ज़ निकाला, और मेरी तरफ़ बढ़ा दिया।

"मेरा नहीं," उन्होंने कहा। "पर उस काग़ज़ पर जो नाम है, वो मेरे जैसा दिखता है। और वो नाम है — मुनीम।"

मैंने काग़ज़ पढ़ा। उस पर लिखा था — "मुनीम जगदीश।" पर वो जगदीश नहीं थे जिसे मैंने आज देखा था। ये कोई और था।

मैंने मुंशीजी की तरफ़ देखा।

"आप कौन हैं?" मैंने पूछा।

मुंशीजी ने अपना चश्मा उतारा, उसे अपनी कमीज़ से पोंछा, और फिर से पहन लिया।

"मैं वो आदमी हूँ," उन्होंने कहा, "जिसने बीस साल पहले तेरे पापा की माँ को ज़हर दिया था। पर मैंने उसे दिया नहीं था। मैंने सिर्फ़ बोतल तैयार की थी। ज़हर बोतल में डाला किसी और ने था। और वो किसी और का नाम… वो नाम तेरे पापा ने इसी काग़ज़ पर लिखा है।"

उन्होंने उँगली से काग़ज़ के सबसे नीचे की तरफ़ इशारा किया।

मैंने देखा।

काग़ज़ के सबसे नीचे, पुरानी स्याही में, एक नाम लिखा था। अक्षर टेढ़े-मेढ़े थे, जैसे लिखने वाले का हाथ काँप रहा हो। नाम था — रणवीर सिंह।

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