Spirit of a Fighter – Chapter 514
"आपने उन्हें भी पिलाया," मैंने कहा। "और फिर उनके नाम के आगे लिख दिया — 'खुराक'। जैसे वो कोई बकरी हों। जैसे उनकी जान कोई हिसाब हो।"
माधव सिंह ने मुँह खोला, पर कुछ नहीं निकला।
मैंने रजिस्टर दयाराम से वापस लिया और उसे ऊपर उठाया।
"ये किताब," मैंने कहा, "आज से मेरे पास रहेगी। और जो-जो इसके पन्नों में हैं, सबको मैं न्याय दिलाऊँगा।"
भीड़ में से एक आवाज़ आई। फिर और। फिर सब एक साथ।
"वीर! वीर! वीर!"
मैंने रजिस्टर अपने सीने से लगाया। मेरी आँखें भर आई थीं, पर मैंने उन्हें पोंछा नहीं। मैंने माँ की तरफ़ देखा। उनके होंठ हिल रहे थे, पर आवाज़ नहीं आ रही थी। बस उनका सिर धीरे-धीरे हिल रहा था — जैसे वो कह रही हों, "हाँ। यही तो सच है।"
दयाराम ने पीछे मुड़कर अपने दोनों आदमियों को इशारा किया।
"माधव सिंह," उन्होंने कहा। "और भैरव सिंह। दोनों को हिरासत में लो।"
पर जैसे ही वो दोनों आगे बढ़े, भैरव ने एक कदम बढ़ाया और गिर पड़ा। उसके घुटने ज़मीन से टकराए। वो अपने दोनों हाथों से अपना पेट पकड़े हुए था, और उसके मुँह से झाग निकल रहा था।
"भैरव!" मैं दौड़कर उसके पास पहुँचा।
मीरा पहले से वहाँ थी। उसने उसका मुँह खोला, गंध ली, और उसका चेहरा बदल गया।
"यही ज़हर है," उसने कहा। "जो हरनाम के मुँह में था। पर ये…" उसने भैरव की नाड़ी छुई। "ये ज़्यादा तेज़ है।"
"कोई उसे पिलाया," मैंने कहा।
मैंने भैरव का सिर उठाया। उसकी आँखें खुली थीं, पर उनमें कुछ भी नहीं था — जैसे कोई दीया बुझ रहा हो।
"किसने?" मैंने पूछा। "किसने दिया?"
उसके होंठ हिले। आवाज़ नहीं निकली। सिर्फ़ हवा।
मैंने अपना कान उसके मुँह के पास लाकर रखा।
"बता," मैंने कहा। "बता भैरव। कौन?"
उसकी साँस रुकी। फिर एक शब्द निकला — इतना हल्का कि मैंने उसे अपनी नसों में महसूस किया।
"चाबी के पीछे," उसने कहा, और उसकी आँखों से पानी बहने लगा। "रजिस्टर… में… आख़िरी पन्ना…"
मैंने सिर उठाया। मीरा ने रजिस्टर खोला और आख़िरी पन्ना पलटा।
वो पन्ना खाली था।
पर उसके नीचे, कवर के अंदर की तरफ़, एक चीज़ चिपकी थी — एक पीतल का चौकोर टुकड़ा, जिस पर वही त्रिकोण और बिंदु का निशान था। और उसके नीचे, बहुत छोटे अक्षरों में, एक नाम था।
मीरा ने उसे पढ़ा। उसके होंठ हिले, पर आवाज़ नहीं आई। वो मेरी तरफ़ मुड़ी। उसकी आँखों में जो था, वो मुझे पसंद नहीं आया।
"क्या है?" मैंने पूछा।
उसने पीतल का टुकड़ा मेरी तरफ़ बढ़ाया।
"माधव सिंह," उसने कहा। "पर ये नाम नहीं है।" उसकी आवाज़ धीमी थी। "ये… किसी और का है।"
मैंने टुकड़ा लिया। मैंने उसे पलटा। पीछे की तरफ़, खुरचकर, किसी ने कुछ लिखा था — दो शब्द, अधूरे।
"बीस साल," मैंने पढ़ा। "बदला।"
और मेरे पीछे किसी ने कहा — "अब तूने वो चीज़ छू ली जिसे छूना नहीं था, वीर सिंह।"
मैं पलटा।
भीड़ के सबसे पीछे, सफ़ेद कुर्ता पहने, हाथ में लाठी लिए, जगदीश खड़े थे।
पर उनका चेहरा… वो जगदीश का चेहरा नहीं था। वो चेहरा किसी और का था — किसी ऐसे का जिसे मैंने कभी नहीं देखा, पर जिसे देखकर मेरी नसें ठंडी हो गईं।
"तुम?" मैंने कहा।
जगदीश मुस्कुराए। उनकी मुस्कान में वो मिठास नहीं थी जो बूढ़ों में होती है।
"मैंने तुमसे कहा था," उन्होंने कहा, "कि अगर तुम रघुवीर के बेटे हो, तो ये चीज़ तुम्हारे हाथ लगेगी। और मैं यही चाहता था।"
मेरे हाथ में पीतल का टुकड़ा भारी हो गया।
"तुम कौन हो?" मैंने पूछा।
उन्होंने लाठी ज़मीन पर टिकाई।
"मैं वो हूँ," उन्होंने कहा, "जिसे तुम्हारे पापा ने बीस साल पहले इस अखाड़े से निकाल दिया था।"
॥
मैं रुक गया।
मेरे हाथ में वो पीतल का टुकड़ा था, और सामने वो आदमी खड़ा था जिसे मैं जगदीश समझ रहा था। पर अब उसकी आँखों में वो चीज़ थी जो बूढ़ों की आँखों में नहीं होती। वहाँ बीस साल की आग जल रही थी, ठंडी और बेरहम।
"तुमने अपना चेहरा बदला है," मैंने कहा। मेरी आवाज़ सुनकर मुझे खुद अजीब लगी। सूखी।
"नहीं बदला," उसने कहा। "तुमने वो चेहरा देखा जो मैंने तुम्हें दिखाना चाहा। अब वो देखो जो असली है।"
उसने लाठी उठाई और अपनी सफ़ेद दाढ़ी के नीचे से एक पतली रस्सी खींची। दाढ़ी उसके चेहरे से अलग हो गई। नकली थी। और उसके नीचे का चेहरा… चिकना, बिना झुर्रियों वाला, पचास के आस-पास का। आँखों के नीचे एक पुराना निशान — किसी कील की तरह गहरा।
भीड़ में सन्नाटा छा गया। फिर किसी ने कहा — "ये तो… ये तो वो है…"
मैंने पलटकर देखा। सुक्खी बुआ थीं। उनके हाथ से पान का बीड़ा गिर गया और वो आगे आ गईं।
"अरे ये तो… ये तो धन्नू है!" उन्होंने चीख दी। "धन्नू मल्लाह! जो रघुवीर के साथ अखाड़े में काम करता था! बीस साल पहले गाँव से भाग गया था। सबने कहा था मर गया।"
धन्नू। नाम सुनते ही मेरे पीछे कुछ हुआ। मैंने मुड़कर देखा।
माँ चबूतरे के सहारे बैठ रही थीं। उनके हाथ काँप रहे थे, और उनके होंठ बस इतना कह रहे थे — "धन्नू। तू ज़िंदा है।"
उसने माँ की तरफ़ देखा। उसकी आँखों में कुछ पिघला।
"सरस्वती," उसने कहा। "तेरे हाथ की दाल का स्वाद मैं बीस साल से भूला नहीं हूँ।"
"तो तू मरे नहीं," माँ ने कहा। उनकी आवाज़ में वो कड़वाहट थी जो सिर्फ़ बीस साल के धोखे से आती है। "तू ज़िंदा है और तूने अपना चेहरा छुपाकर मेरे बेटे को भेजा। तूने जगदीश बनकर उसे काग़ज़ दिए। तूने…"
"मैंने उसे सच दिया," धन्नू ने कहा। "वो काग़ज़ जो तेरे रघुवीर ने अपने हाथ से लिखे थे। तूने उन्हें बीस साल ढक्कन में छुपाकर रखा। मैंने उन्हें उस लड़के तक पहुँचाया जिसका हक़ था।"
"क्यों?" मैंने कहा। मेरी आवाज़ अब ठीक हो रही थी। "बीस साल छुपकर रहा। क्यों? तू मेरे पापा का दोस्त था। फिर ये सब क्यों?"
धन्नू ने लाठी को दोनों हाथों से पकड़ा और उसे ज़मीन पर टिकाया। उसके चेहरे पर वो मुस्कान आई जो मुझे अब भी अच्छी नहीं लग रही थी।
"मैं तेरे पापा का दोस्त था," उसने कहा। "और मैं माधव सिंह का भी दोस्त था। तीनों एक ही मिट्टी में खेले थे। पर जब अखाड़े का मालिक बनने की बात आई, तो रघुवीर ने किसी और को चुना — अपने आप को नहीं, किसी तीसरे को। और मुझे बाहर का रास्ता दिखा दिया। बस इसलिए कि मैं मज़दूर का बेटा था और वो…" उसने माधव सिंह की तरफ़ देखा। "वो ज़मींदार का बेटा था।"
भीड़ में एक औरत रोने लगी। फिर दूसरी। मैंने देखा — वो वो औरतें थीं जिनके बेटे अखाड़े से नहीं लौटे थे। उनका रोना अब किसी एक नाम का नहीं, पूरे बीस साल का था।
"तो तूने माधव के साथ मिलकर मेरे पापा को मारा?" मैंने पूछा।
धन्नू का चेहरा बदला। पहली बार उसमें कुछ असली दिखा।
"नहीं," उसने कहा। और उसकी आवाज़ धीमी हो गई। "मैंने नहीं मारा। मैं उस रात वहाँ था। मैंने बोतल में ज़हर डालते देखा। पर मैंने कुछ नहीं कहा। मैं डर गया। मैं भाग गया। और बीस साल तक मैं खुद को कायर कहता रहा।"
"तो अब क्यों आया?" माँ ने कहा। वो उठ खड़ी हुई थीं, चबूतरे का सहारा लेकर। "अब क्यों? जब सब मर चुका? जब मेरा रघुवीर…"
"क्योंकि अब मेरे पास उस चीज़ का सबूत है जो मैंने बीस साल पहले छुपाया था," धन्नू ने कहा। और उसने अपनी जेब से एक लिपटा हुआ कपड़ा निकाला।
वो कपड़ा खोलते-खोलते उसके हाथ काँप रहे थे। अंदर एक छोटी सी शीशी थी — पीली, मैल से ढकी, और उसके मुँह पर मोम की सील।
"ये वो बोतल है," उसने कहा, "जो माधव सिंह ने उस रात अपने हाथ से भरी थी। मैंने इसे छुपा लिया था। मैंने सोचा था कभी काम आएगी। बीस साल से ये मेरे पास है।"
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno