Spirit of a Fighter – Chapter 51
"तू ये क्या कर रहा है?" मैंने पूछा।
"मिठाई वाले का चम्मच हर जगह काम आता है, भाई।" उसने कहा, और पहली बार उसकी आवाज़ में मज़ाक नहीं था। सिर्फ़ काम था।
प्लास्टर झड़ने लगा। सफ़ेद पाउडर नीचे गिरा। और फिर चम्मच ईंट से टकराया — खोखली आवाज़।
"लग गई," टिंकू ने कहा।
कालू काका उठे। रणवीर सिंह ने अपनी व्हीलचेयर आगे बढ़ाई। मीरा ने मेरा हाथ पकड़ा — बस एक पल के लिए, फिर छोड़ दिया, जैसे उसे याद आया कि हम कहाँ हैं।
"ईंट निकालनी होगी," कालू काका ने कहा। "पर आवाज़ नहीं होनी चाहिए।"
हमने तस्वीर की कील निकाली। वो लंबी थी, मुड़ी हुई। टिंकू ने उसे प्लास्टर के कोनों में डाला और धीरे-धीरे खुरचा। ईंट हिली। मैंने अपनी उँगलियाँ उसके किनारे में डालीं और खींचा।
ईंट बाहर आई। और उसके पीछे से हवा आई।
बारिश से भीगी हवा। घास की। खुली ज़मीन की।
मेरी आँखें भर आईं। इतनी आसान चीज़ थी — हवा — और मुझे लगा जैसे किसी ने मेरे गले से रस्सी खोल दी हो।
"छोटा है," मीरा ने झाँककर कहा। "पर निकल सकते हैं।"
"तू पहले," मैंने कहा।
"नहीं।" उसने सीधा मुझे देखा। "पहले कालू काका। फिर पापा। फिर तू। मैं आख़िर में।"
"मीरा—"
"बहस मत कर, वीर सिंह।" उसकी आवाज़ में वो तेज़ी लौट आई थी जो पहली बार अखाड़े में सुनी थी। "मैं आख़िरी हूँ। मेरी ज़िद है।"
मैं चुप हो गया।
कालू काका पहले निकले — उनका शरीर छोटा था, कुबड़ा था, पर वो आसानी से सरक गए, जैसे ये रास्ता उन्होंने पहले भी कई बार नापा हो। उनके बाद हमने रणवीर सिंह को उठाया। ये सबसे मुश्किल था। उनका शरीर भारी था, पैर सून्न, और मुझे उन्हें दोनों हाथों से पकड़कर उस छेद में से सरकाना पड़ा। उनका एक हाथ मेरे कंधे पर था, और उनकी साँस मेरे कान के पास चल रही थी।
"बेटा," वो धीरे से बोले, जब हम आधे रास्ते में थे, "तेरे पापा ने मुझे एक बार इसी तरह बचाया था।"
मैं रुक गया।
"उस रात," वो बोले, "जब भैरव ने मुझे ज़हर दिया, रघुवीर ने मुझे इसी दीवार से खींचकर बाहर निकाला था। और खुद अंदर रह गया।"
मेरी आँखों में पानी आ गया। मैंने उन्हें और ज़ोर से पकड़ा। "अब बाहर," मैंने कहा। "अब बाहर निकलो।"
वो बाहर निकले। फिर मैं। फिर टिंकू, अपनी मिठाई की डिब्बी कसकर सीने से लगाए। और आख़िर में मीरा — उसके बालों में प्लास्टर का सफ़ेद पाउडर था, और वो हँस रही थी, बिना आवाज़, जैसे स्कूल के बच्चे छुपन-छुपाई में जीत जाते हैं।
हम अखाड़े की पीछे वाली खुली ज़मीन पर थे। ऊपर आसमान था, बादलों से ढका, पर बिना बारिश। दूर नीम का पेड़ काला खड़ा था। और सामने — तहखाने की तरफ़ जाता वो रास्ता, जहाँ से हल्की लाल रोशनी आ रही थी।
लालटेन की रोशनी।
"वो वहाँ है," कालू काका ने फुसफुसाया। "तहखाने में। बोतलें छुपा रहा है।"
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसने मेरी तरफ़ देखा। और बिना कुछ बोले हम दोनों ने सिर हिलाया।
"रुको," रणवीर सिंह ने कहा। "उसके पास अभी भी वो फ़ाइल है। हरनाम उसे जला रहा होगा। अगर वो जल गई, तो सबूत का आधा हिस्सा राख हो जाएगा।"
"आधा?" मैंने पूछा।
"आधा," उन्होंने कहा। "क्योंकि आधा सच काग़ज़ में है, और आधा —" उन्होंने अपनी छाती पर हाथ रखा, "यहाँ। मेरे पास। बीस साल से।"
टिंकू ने अचानक अपनी टोपी ठीक की। ये उसकी आदत थी — जब वो कोई बड़ी बात करने वाला होता था, तो पहले टोपी ठीक करता था। जैसे स्कूल में बच्चे सवाल पूछने से पहले हाथ उठाते हैं।
"मैं जाऊँगा," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो हल्कापन नहीं था जो हमेशा रहता था।
हम सब उसे देखने लगे।
"तू?" मैंने कहा।
"मैं।" वो सीधा खड़ा था, दुबला-पतला, लंबा, टोपी कानों तक खिंची हुई। "मैं मुंशी के यहाँ चाय पहुँचाता हूँ, भाई। रोज़। भैरव मुझे देखकर कुछ नहीं कहेगा। मैं रसोइया हूँ। मैं वो आदमी हूँ जिसे कोई नहीं देखता।"
"टिंकू—"
"सुन।" उसने मेरा कंधा पकड़ा। उसकी उँगलियों में हल्दी की गंध थी, और उसके हाथ काँप रहे थे — पर उसने छोड़ा नहीं। "तू अखाड़े में लड़ा। तूने भैरव के पानी से मना किया, सबके सामने। तेरा नाम अब गाँव में है। मैं क्या हूँ? टिंकू। जो खीर बनाता है। जो हर बार कहता है कल से कसरत शुरू करूँगा।" उसने हल्की सी हँसी दी, पर वो हँसी नहीं थी — कुछ और थी। "मेरी बारी आई है, भाई। बस एक काम। छोटा सा।"
उसकी आँखें चमक रही थीं। और मैंने उन आँखों में वो देखा जो मैंने कभी नहीं देखा था — डर नहीं, कुछ और। अपने आप को साबित करने की भूख।
"तू अंदर जाएगा," मैंने कहा। "हरनाम के कमरे में। जहाँ फ़ाइल है।"
"हाँ।"
"और अगर वो देख ले?"
"तो मैं कहूँगा चाय ठंडी हो गई थी, नई बना रहा हूँ।" उसने टोपी ठीक की। "भाई, मैं झूठ बोलने में भी अच्छा हूँ। रोज़ अपनी माँ से बोलता हूँ कि खीर बिक गई।"
मीरा ने उसकी तरफ़ देखा। उसके चेहरे पर कुछ बदला। "तुझे पता है टिंकू, अगर वो तुझे पकड़ ले, तो?"
"तो मैं रोऊँगा।" उसने कहा, बिना हिचक। "रोना मुझे आता है। मैं प्याज़ काटते वक़्त भी रोता हूँ। भैरव मेरे आँसुओं पर हँसेगा, और हँसते वक़्त वो कुछ नहीं देखता। उसी बीच तुम लोग बाहर से सब सँभाल लेना।"
कालू काका ने धीरे से कहा, "ये लड़का…" और फिर वो चुप हो गए, जैसे उन्हें कोई पुरानी बात याद आ गई हो।
क्या बताऊँ — उस पल मेरे अंदर क्या चल रहा था। टिंकू मेरा दोस्त था। चौदह साल से। जब मैं भूखा होता था, वो चुपके से खीर लाता था और कहता था बिक गई। जब मैं अखाड़े की दीवार के छेद से झाँकता था, वो मेरे पीछे खड़ा होता था और कहता था "देख, वो मोटा कैसे गिरा।" अब वो मेरे लिए अंदर जा रहा था। और मैं उसे रोक नहीं सकता था — क्योंकि वो सही कह रहा था। उसकी बारी आई थी।
"ठीक है," मैंने कहा। "पर एक बात। अंदर जाकर अगर कुछ भी गड़बड़ लगे — कुछ भी — तो तू फ़ाइल छोड़कर भागेगा। फ़ाइल से ज़्यादा तू ज़रूरी है।"
उसने एक पल मेरी तरफ़ देखा। फिर उसने मुस्कुराकर कहा, "भाई, तू भी बड़ी-बड़ी बातें करने लगा। पहले तू खुद याद रख — अपनी जान बचाना। मैं तो बस चाय लेकर जा रहा हूँ।"
और वो मुड़ा, और अंधेरे में चला गया। उसकी टोपी की सफ़ेदी कुछ पल दिखी, फिर खो गई।
हम बाकी चारों नीम के पीछे दुबक गए। मेरे घुटने धरती पर टिके थे और मिट्टी की ठंडक धोती से होकर मेरी हड्डियों तक पहुँच रही थी। मीरा मेरे बगल में बैठी थी, उसका कंधा मेरे कंधे से सटा हुआ। रणवीर सिंह की व्हीलचेयर पेड़ के तने के पीछे छुपी थी, और कालू काका उनके पास बैठे थे, अपनी सफ़ेद दाढ़ी में उँगलियाँ फँसाए।
सामने, दूर, अखाड़े के रसोई वाले हिस्से की खिड़की में एक छोटी रोशनी जली। फिर बुझी। फिर जली।
"वो अंदर पहुँच गया," कालू काका ने फुसफुसाया।
मेरी साँस रुकी हुई थी।
वक़्त कैसे बीता, पता नहीं। मुझे लगा घंटों बीत गए, पर आसमान में तारे उतने ही थे। फिर टिंकू की सफ़ेद टोपी फिर दिखी — दौड़ती हुई। वो नीम की तरफ़ आ रहा था, और उसकी एक बाँह में कुछ दबा हुआ था।
वो हमारे पास गिरा, घुटनों के बल। उसकी साँस फटी हुई थी, माथे पर पसीना, टोपी तिरछी। उसने अपनी बाँह से वो चीज़ निकाली — भूरी जिल्द वाली फ़ाइल, कोने से जली हुई, थोड़ी सी राख उस पर लगी हुई।
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