Spirit of a Fighter497 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 497

7 min read November 5, 2026

"उस रात मैं अखाड़े में था। मिट्टी सींचने के लिए। रात का दूसरा पहर। मैंने देखा कि भैरव के कमरे की लाइट जल रही है। मैंने सोचा कि देख लूँ कि कुछ चाहिए तो नहीं।" उसने रुककर मेरी तरफ़ देखा। "पर जब मैं वहाँ पहुँचा, तो कमरे में भैरव नहीं था। कोई और था। एक दुबला आदमी। उसके हाथ में पीली शीशी थी। वो शीशी से कुछ पानी में डाल रहा था।"

मेरे रोंगटे खड़े हो गए। "कौन था वो?"

"मैंने उसका चेहरा नहीं देखा," बसंता ने कहा। "वो पीठ मेरी तरफ़ थी। पर मैंने उसकी पीठ पर एक निशान देखा — गोल, जला हुआ। जैसे किसी ने उस पर गरम लोहे की मोहर रख दी हो।"

मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखें फैल गईं। "वो निशान," उसने धीरे से कहा। "माँ ने भी बताया था। जो आदमी उस रात कुएँ की तरफ़ गया था, उसकी पीठ पर भी गोल जला निशान था।"

बसंता ने सिर हिलाया। "वही। मैंने उसे देखा और फिर मैं वहीं जम गया। मेरे पैर काँपने लगे। तभी वो पलटा।" बसंता ने अपनी आँखें बंद कर लीं। "मैंने उसे देखा। और वो मुझे देखकर मुस्कुराया। बस मुस्कुराया। और बोला — 'बसंता, तूने कुछ देखा?'"

झोपड़ी में सन्नाटा छा गया।

"मैंने कहा — नहीं, कुछ नहीं। पर वो जानता था कि मैंने देखा है। वो मेरे पास आया और मेरे कंधे पर हाथ रखकर बोला — 'तेरा बेटा बंटी है ना? अच्छा लड़का है। बहुत तेज़ दौड़ता है।'" बसंता की आवाज़ टूट गई। "उसने मेरे बेटे का नाम लिया। मेरे बच्चे का नाम। और मैं कुछ नहीं बोल सका। बस खड़ा रहा।"

"और बंटी?" मैंने पूछा। मेरी आवाज़ भारी थी।

"अगले दिन बंटी को बुखार आया। तीन दिन। फिर…" बसंता रो पड़ा। "मैंने सब जानते हुए भी कुछ नहीं किया। मैं डर गया था। अपने बेटे की जान बचाने के लिए भी मैं कुछ नहीं कर सका।"

दयाराम ने अपना हाथ उसके कंधे पर रखा। "तू दोषी नहीं है, बसंता।"

"मैं दोषी हूँ," बसंता ने रोते हुए कहा। "मैंने अपने बेटे को बचाया नहीं। और बारह साल से मैं उस आदमी का नाम भी नहीं बोल सका।"

"वो कौन था, बसंता?" मैंने धीरे से पूछा। "उसका चेहरा तूने देखा था।"

बसंता ने सिर उठाया। उसकी आँखों में आँसू थे, पर अब उनमें डर नहीं था। कुछ और था। कुछ ठंडा। "मैंने उसे उस रात नहीं पहचाना," उसने कहा। "पर कुछ दिन बाद, जब मैं बाज़ार गया था, मैंने उसे फिर देखा। वो एक दुकान पर खड़ा था। मैंने उसे देखा और मेरी नस-नस काँप गई।"

"कौन था?"

बसंता ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आवाज़ इतनी धीमी थी कि मुझे सुनने के लिए आगे झुकना पड़ा।

"जो आज पंचायत में बैठकर सबका फ़ैसला सुनाता है," उसने कहा। "जिसके हाथ में गाँव की लाठी है। जो कहता है कि वो सच का पहरेदार है।"

मेरे पीछे मीरा ने एक तेज़ साँस ली।

"माधव सिंह?" मैंने कहा।

बसंता ने सिर हिलाया। "हाँ। सरपंच माधव सिंह।"

झोपड़ी में इतना सन्नाटा छा गया कि मुझे अपनी साँसें सुनाई दे रही थीं।

"पर वो तो भैरव का बाप है," टिंकू ने दरवाज़े से कहा। उसकी आवाज़ फटी हुई थी। "वो तो पहले से ही सब जानता है।"

"नहीं," मैंने धीरे से कहा, और मेरे दिमाग़ में एक-एक करके चीज़ें जुड़ने लगीं। "ये बात अलग है। माधव सिंह ने भैरव को खरीदा था, उसे अपना बेटा बनाया, उसे ज़हर बनाना सिखाया। पर ये रात…" मैंने बसंता की तरफ़ देखा। "बसंता काका, उस रात माधव सिंह खुद पानी में कुछ डाल रहा था। भैरव के कमरे में। भैरव की बोतलों में।"

बसंता ने सिर हिलाया। "मैंने पीली शीशी से कुछ डालते देखा। वो भैरव के लिए ज़हर बना रहा था। अपने ही बेटे के लिए।"

मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई।

"उस रात," बसंता ने कहा, "मैंने एक नहीं, दो आदमियों को देखा। पहले माधव सिंह को, पानी में ज़हर डालते हुए। फिर, जब वो जाने लगा, तो मैंने देखा कि उसने कुछ और किया। उसने भैरव की बोतलों में से एक उठाई और उसे पीने वाले पहलवान के गिलास में उलट दिया।" बसंता की आवाज़ काँपी। "और अगले दिन वो पहलवान नहीं उठा। बुखार। और फिर ख़त्म।"

मैंने अपनी आँखें बंद कर लीं। बीस साल। बीस साल से माधव सिंह गाँव का सरपंच बना हुआ था, सबका न्याय करता था, सबका भला चाहता था। और बीस साल से वो खुद उन पहलवानों को ज़हर दे रहा था — अपने ही बेटे के हाथों से।

"पर क्यों?" मीरा ने पूछा। उसकी आवाज़ में गुस्सा था। "अपने बेटे के हाथों से क्यों?"

"क्योंकि," बसंता ने कहा, "अगर सीधे वो ज़हर देता, तो सब उसे देख लेते। पर अगर भैरव देता, तो सब समझते कि भैरव का काम है, माधव का नहीं। और माधव का हाथ साफ़ रहता।"

"उसने अपने बेटे को बीस साल का ज़हर बनाया," मैंने धीरे से कहा, "सिर्फ़ इसलिए कि वो खुद साफ़ रहे।"

बसंता ने सिर हिलाया। "और जिस दिन भैरव को पता चलता, उस दिन…" उसने रुककर मेरी तरफ़ देखा। "मैंने सुना है कि भैरव ने पंचायत में सब कबूल किया। कि उसका असली नाम मोहन है, कि माधव उसका बाप है। पर क्या उसने ये कबूल किया कि माधव ने उसके हाथों से ज़हर दिलवाया?"

मैंने उसकी तरफ़ देखा। मेरे मुँह से शब्द नहीं निकले। क्योंकि भैरव ने ये नहीं कहा था। उसने सिर्फ़ इतना कहा था कि माधव ने उसे खरीदा, उसे ज़हर बनाना सिखाया। पर ये नहीं कहा था कि माधव ने उसके हाथों से पहलवानों को ज़हर दिलवाया।

"भैरव को खुद नहीं पता," मैंने धीरे से कहा। "वो नहीं जानता कि उसके बाप ने उसका इस्तेमाल किया। उसे लगता है कि ये सब उसने खुद किया।"

बसंता ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो चीज़ थी जो बारह साल से दबी हुई थी। "अब तू जानता है," उसने कहा। "अब तू जानता है कि उस रात किसने मेरे बेटे को ज़हर दिया था।"

मैं उठ खड़ा हुआ। मेरे हाथ मुट्ठियों में बंध गए थे। मेरे सीने में कुछ जल रहा था — जो भैरव के ज़हर से नहीं, बल्कि उस सच से जल रहा था जो बीस साल से मिट्टी में दबा था।

"बसंता काका," मैंने कहा, "तुम पंचायत में गवाही दोगे?"

बसंता ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में डर लौट आया था। "पर वो सरपंच है—"

"वो सरपंच नहीं रहेगा," मैंने कहा। "उसने अपने ही बेटे के हाथों से गाँव के बेटों को मारा। उसने तुम्हारे बेटे को मारा। अगर तुम आज नहीं बोलोगे, तो कल कोई और बसंता अपने बेटे का सिरहाना छोड़कर चुपचाप रोएगा।"

बसंता ने दयाराम की तरफ़ देखा। दयाराम ने उसका हाथ पकड़ लिया।

"बसंता," दयाराम ने कहा, "बारह साल से मैं तुझसे ये सवाल पूछना चाहता था। और बारह साल से मैं खुद डरता रहा। आज मैं नहीं डरूँगा। तू बता — मेरे भाई, तेरा बेटा, उसका नाम किसने मिटाया?"

बसंता की आँखों से आँसू बहने लगे। उसने दयाराम का हाथ कसकर पकड़ लिया। "माधव सिंह ने," उसने कहा। "उस रात, उसी अखाड़े में, उसी मिट्टी में।"

मैंने बाहर की तरफ़ देखा। आसमान अब लाल हो रहा था — शाम ढल रही थी। और आज रात, माधव सिंह ने दयाराम को अखाड़े में बुलाया था। आज रात, वो अपना आख़िरी दाँव खेलने वाला था।

"मुखिया जी," मैंने कहा और उनकी तरफ़ पलटा, "आज रात हम अखाड़े जाएँगे। पर पहले मुझे एक चीज़ चाहिए।"

"क्या?"

"बसंता काका की गवाही। लिखित में। और उसका अँगूठा। अगर हम आज रात अखाड़े में माधव सिंह से टकराएँ और वो हमें रोकने की कोशिश करे, तो हमारे पास ये सबूत होना चाहिए कि वो कितना बड़ा खिलाड़ी है।"

दयाराम ने सिर हिलाया। "मैं काग़ज़ लाता हूँ।"

"मेरे पास है," मीरा ने कहा और अपने बैग से एक कॉपी निकाली। "ये मेरी लैब की कॉपी है। इसके पीछे खाली पन्ने हैं।"

बसंता ने काग़ज़ की तरफ़ देखा। उसके हाथ काँप रहे थे। "मैं…" उसकी आवाज़ रुँध गई। "बारह साल से मैंने किसी को नहीं बताया। अब अगर मैं बोलूँगा, तो…"

वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।

यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।

Audio mein suno

Apni raay likho