Spirit of a Fighter – Chapter 498
"तो तेरा बेटा सुकून से सोएगा," सरस्वती ने कहा। वो अब तक चुप खड़ी थीं, दरवाज़े के पास। उन्होंने आगे बढ़कर बसंता के सामने घुटने टेक दिए। "बसंता, मैं भी माँ हूँ। मेरे पति को भी इसी मिट्टी ने खाया। मैं बीस साल से चुप हूँ। पर आज मेरा बेटा खड़ा है, और वो पूछ रहा है। तू बोल। मेरे बेटे के लिए बोल। अपने बेटे के लिए बोल।"
बसंता ने सरस्वती की तरफ़ देखा। उसकी आँखों में आँसू थे, पर अब उनमें कुछ और भी था। हिम्मत।
उसने हाथ बढ़ाकर मीरा से काग़ज़ लिया। फिर धीरे-धीरे, एक-एक शब्द करके, उसने सब लिखवाया — मीरा लिखती गई और बसंता बोलता गया। उस रात की हर बात। पीली शीशी। माधव सिंह की पीठ पर जला निशान। पहलवान का गिलास। और अगले दिन की मौत।
जब काग़ज़ पूरा हो गया, तो बसंता ने उस पर अपना अँगूठा लगाया। उसका हाथ काँप रहा था, पर अँगूठा साफ़ लगा।
मैंने वो काग़ज़ मोड़कर अपनी जेब में रखा। फिर मैंने बसंता की तरफ़ देखा और झुककर उसके पैर छू लिए।
"बसंता काका," मैंने कहा, "आज रात अगर मैं अखाड़े से लौटा, तो तेरे बेटे का नाम उस मिट्टी में लिखूँगा। और अगर नहीं लौटा, तो मेरी माँ को बता देना कि उसका बेटा डरकर नहीं भागा।"
बसंता ने मेरा सिर पकड़ लिया और अपने सीने से लगा लिया। उसका शरीर काँप रहा था। "तू लौटेगा," उसने धीरे से कहा। "तू रघुवीर का बेटा है। वो भी हारकर नहीं लौटा था।"
हम बाहर निकले। शाम अब गहरी हो रही थी। आसमान पर पहला तारा दिखने लगा था।
रास्ते में मीरा ने मेरा हाथ पकड़ लिया। उसकी उँगलियाँ ठंडी थीं।
"वीर," उसने कहा, "आज रात अगर माधव सिंह ने हमें अखाड़े में बुलाया है, तो वो जानता है कि हम क्या जानते हैं।"
"हाँ," मैंने कहा।
"तो वो तैयार होगा।"
"हाँ।"
"और हम?" उसने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो चमक थी जो मुझे सबसे ज़्यादा पसंद थी। "हम तैयार हैं?"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। मुझे उस दिन याद आया जब पहली बार अखाड़े की मिट्टी में पैर रखा था। जब मैं बाहर खड़ा लड़का था। जब मेरे पास कुछ नहीं था — सिर्फ़ एक नाक, एक ज़िद, और एक माँ की दुआ।
"मीरा," मैंने कहा, "आज रात अखाड़े में जो होगा, वो सिर्फ़ माधव सिंह का फ़ैसला नहीं होगा। वो मिट्टी का फ़ैसला होगा। और मिट्टी झूठ नहीं बोलती।"
टिंकू ने पीछे से कहा, "भाई, आज रात मैं अपनी मिठाई की डिब्बी लेकर चलूँगा।"
मैंने पलटकर उसकी तरफ़ देखा। "क्यों?"
"क्योंकि जब माधव सिंह पकड़ा जाएगा," टिंकू ने कहा और उसकी आँखों में वो चमक थी जो सिर्फ़ उसमें होती थी, "तो मैं उसे एक मिठाई खिलाऊँगा। और कहूँगा — ये उस बेटे की तरफ़ से है जिसे तुमने ज़हर दिया था।"
सरस्वती ने टिंकू के सिर पर हाथ रखा। "तू मेरा दूसरा बेटा है," उन्होंने कहा। "और आज रात तू भी लड़ेगा।"
हम गाँव की तरफ़ चले। रास्ते में मैंने एक बार पलटकर बसंता की झोपड़ी की तरफ़ देखा। वो दरवाज़े पर खड़ा था, हाथ जोड़े। दूर से लग रहा था जैसे कोई बूढ़ा पेड़ अपनी जड़ों से उखड़कर खड़ा हो।
फिर मैंने आगे देखा। गाँव के बाहर वो पुराना पीपल का पेड़ था, जहाँ से अखाड़े का रास्ता मुड़ता था। और उस पेड़ के नीचे, एक परछाई खड़ी थी।
मैंने अपनी आँखें सिकोड़ीं। मेरी नाक से एक गंध आई — महँगा अत्तर, सिगार, और उसके नीचे वो पुरानी जली हुई मिट्टी की गंध।
मैं ठिठक गया। मेरे पैर जम गए।
"वीर?" मीरा ने कहा। "क्या हुआ?"
वो परछाई पेड़ के नीचे से बाहर आई। एक आदमी था — दुबला, चश्मा, हाथ में फ़ाइल।
हरनाम।
पर हरनाम तो मर चुका था। उसकी लाश मैंने अपनी आँखों से देखी थी। उसकी मुट्ठी में पीतल की चाबी थी। उसके मुँह से झाग निकल रहा था।
"वो हरनाम नहीं है," मैंने धीरे से कहा। "वो हरनाम जैसा दिखता है। पर उसकी गंध अलग है।"
"तो कौन है?"
मैंने एक और गंध खींची। और इस बार मेरे रोंगटे खड़े हो गए। क्योंकि ये गंध मैंने पहले भी सुनी थी। आज सुबह। मुखिया दयाराम के कमरे में।
"ये हरनाम का भाई है," मैंने कहा। "बसंता का दूसरा बेटा।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखें फैल गईं। "पर बसंता ने तो कहा था कि उसका एक ही बेटा था—"
"नहीं," मैंने कहा। "बसंता ने कहा था कि बंटी मर गया था। पर उसने ये नहीं कहा कि उसका दूसरा बेटा ज़िंदा है। और वो दूसरा बेटा…" मैंने उस परछाई की तरफ़ देखा जो अब हमारी तरफ़ बढ़ रही थी, "वो हरनाम के साथ काम करता था। वो हरनाम का दाहिना हाथ था। और उसने आज तक अपने पिता को नहीं बताया कि वो क्या करता है।"
परछाई पास आई। चेहरा साफ़ हुआ। दुबला, तेज़ नज़र, चश्मा। उम्र पच्चीस के आस-पास। हरनाम जैसा, पर नरम। कम उम्र।
उसने हमारे सामने आकर अपना चश्मा उतारा। उसकी आँखों में आँसू थे।
"मैं बंटी हूँ," उसने कहा। "बसंता का बेटा।" उसकी आवाज़ काँप रही थी। "मैं ज़िंदा हूँ। और मैंने अपने पापा से झूठ बोला था कि मैं शहर में नौकरी करता हूँ। सच ये है कि मैं हरनाम के साथ काम करता था। मैं उसका मुंशी था।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। मेरे सीने में कुछ जम रहा था। "तू जानता था?" मैंने पूछा। "तू जानता था कि हरनाम क्या करता था?"
बंटी ने सिर हिलाया। "सब जानता था। पर मैं डरता था। और आज…" उसने एक गहरी साँस ली। "आज मुझे पता चला कि मेरे पापा ने बारह साल से क्या दबाया था। मुझे पता चला कि मेरे भाई को किसने मारा।"
"तू जानता था कि तेरा भाई कैसे मरा?" मैंने पूछा।
"नहीं," बंटी ने कहा। "मुझे आज पता चला। जब मैंने मीरा को बसंता की झोपड़ी में जाते देखा।" उसने अपनी जेब से एक काग़ज़ निकाला। "ये वो चिट्ठी है जो हरनाम ने अपनी मौत से पहले लिखी थी। मुझे देने के लिए।
मैंने वो चिट्ठी ली। काग़ज़ पुराना था, मुड़ा हुआ, कोने से फटा। खोलते ही उसमें से एक गंध उठी — स्याही, धूल, और उसके नीचे वही कड़वाहट जो भैरव के पानी में थी।
"तूने ये पहले क्यों नहीं दिखाई?" मीरा ने पूछा। उसकी आवाज़ में गुस्सा था, पर आँखें गीली थीं।
"क्योंकि इसमें मेरा नाम था," बंटी ने कहा। "और मैं डर गया था।"
मैंने चिट्ठी पढ़ी। हरनाम की लिखाई टेढ़ी थी, जल्दी में लिखी हुई। उसने लिखा था — "बंटी, अगर मैं मरूँ तो ये चिट्ठी वीर सिंह को देना। उसके पिता रघुवीर को मैंने नहीं मारा था। मुझे मारने का हुक्म ऊपर से आया था। और ऊपर वाला यही गाँव में रहता है। उसके कंधे पर जला हुआ निशान है। वो खुद को मुखिया कहलवाता है।"
मेरे हाथ काँप गए। मैंने काग़ज़ को दोनों हाथों से पकड़ लिया, वरना वो गिर जाता।
"मुखिया?" टिंकू ने कहा। उसकी आवाज़ बच्चों जैसी हो गई थी। "मुखिया दयाराम?"
बंटी ने सिर नीचा कर लिया। "मैंने भी यही सोचा था। पर मुखिया दयाराम के कंधे पर निशान नहीं है। मैंने उन्हें कई बार देखा है। उनके कंधे पर कुछ नहीं है।"
"तो फिर कौन?" मैंने पूछा।
उसी वक़्त पीछे से लाठी की आवाज़ आई। ठक। ठक। ठक। मैं पलटा।
बूढ़ा आदमी आ रहा था। बसंता का बाप। उसकी कमर झुकी हुई थी, लाठी हाथ में, और उसके कंधे पर एक पुरानी चादर थी जो हवा में फड़फड़ा रही थी।
वो हमारे सामने रुका। उसने बंटी को देखा। देखते ही उसकी लाठी हाथ से छूट गई।
"तू… तू ज़िंदा है?" उसकी आवाज़ फटी हुई थी, जैसे सालों से इस्तेमाल न हुई हो। "मेरा बंटी ज़िंदा है?"
बंटी उसके पैरों पर गिर गया। "पापा—"
बूढ़े ने उसे उठाया। उसके हाथ काँप रहे थे। उसने बंटी का चेहरा दोनों हाथों में लिया और देर तक देखता रहा। फिर वो मेरी तरफ़ मुड़ा।
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