Spirit of a Fighter – Chapter 495
वो पढ़ने लगे। उनकी आँखें एक लाइन से दूसरी लाइन पर जा रही थीं। उनका हाथ धीरे-धीरे काँपने लगा।
"ये…" उन्होंने रुककर कहा, "ये हरनाम के हस्ताक्षर तो असली हैं।" उन्होंने पन्ना पलटा। "पर नीचे एक और हस्ताक्षर है।"
वो रुक गए। उनका मुँह खुला रह गया।
"मुखिया जी?" मीरा ने कहा।
दयाराम ने अपना सिर उठाया। उनका चेहरा सफ़ेद पड़ गया था, जैसे किसी ने उनके सामने से ज़मीन खींच ली हो।
"ये हस्ताक्षर," उन्होंने धीरे से कहा, और उनकी आवाज़ टूट गई, "ये तो मेरे ही भाई का है।"
मेरे हाथ ठंडे पड़ गए। मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसके होंठ खुले रह गए, पर आवाज़ नहीं निकली।
"आपका भाई?" मैंने कहा। मेरी आवाज़ सुनकर भी अजीब लगी, जैसे किसी और का गला है। "मुखिया जी, आपका भाई तो…"
"गाँव छोड़कर चला गया था," दयाराम ने कहा। उन्होंने काग़ज़ को अपनी छाती से लगा लिया, जैसे कोई चीज़ छीनने आएगा। "बारह साल पहले। कहा था, यहाँ रहकर कोई इज़्ज़त नहीं मिलती। शहर जाकर अपना नाम बनाऊँगा। मैंने उसे रोका। बहुत रोका। पर वो नहीं माना। उसने मुझसे कहा था, भाई, तू गाँव में ही मुखिया बनकर रह, मैं अपनी किस्मत खुद लिखूँगा।"
उन्होंने काग़ज़ पर उँगली रखी। हस्ताक्षर के नीचे। मैंने देखा — मेरी आँखें उस लकीर पर टिक गईं। एक झुका हुआ, टेढ़ा-मेढ़ा नाम था। जल्दी में लिखा हुआ, जैसे लिखने वाले को यह भी नहीं पता था कि वो क्या लिख रहा है।
"ये उसका ही है," दयाराम ने कहा। "ये उसका हस्ताक्षर है। मैं इसे सौ बार पहचानूँगा।" उन्होंने काग़ज़ मेरी तरफ़ बढ़ाया, पर हाथ काँप रहा था। "बताओ, वीर। ये क्या है? मेरा भाई इन काग़ज़ों पर हस्ताक्षर क्यों कर रहा है?"
"आपके भाई का नाम?" मीरा ने कहा। उसकी आवाज़ फिसल रही थी।
"रघुवीर," दयाराम ने कहा। "रघुवीर सिंह।"
मेरा पूरा बदन ठंडा हो गया। रघुवीर। वो नाम जो काग़ज़ पर लिखा था। वो आदमी जिसका नाम लेकर हरनाम ने मुझे शीशी सौंपी थी। जिसने मुझे नहर पर धक्का दिया था, जिसकी आवाज़ कान में अभी भी थी — "तू सब देखता है, वीर। पर कुछ नहीं कर सकता।"
मैं मुखिया के सामने बैठ गया। घुटनों के बल, जैसे कोई बोझ उठाने से पहले बैठता है।
"मुखिया जी," मैंने कहा, "आपके भाई ने वो शीशी बनाई है। जिस पानी से पहलवान मर रहे हैं। और वो आज भी बनाता है। और जिसे वो बेचता है…"
"वो माधव सिंह के लिए काम करता है?" दयाराम ने कहा। उनकी आवाज़ में अब कुछ और था। गुस्सा नहीं, एक गहरा डर।
"हो सकता है," मैंने कहा। "या माधव सिंह उसके लिए काम करता है। ये हमें नहीं पता। पर एक बात पता है — वो रघुवीर नहीं रहा, मुखिया जी। जो आदमी मेरी उम्र के लड़के को नहर में धक्का देता है, वो किसी का भाई नहीं रहता।"
दयाराम की आँखों में पानी आ गया। उन्होंने उसे पोंछा नहीं। वो चारपाई पर बैठे रहे, काग़ज़ गोद में, और बाहर नहर की तरफ़ देखते रहे, जैसे वहाँ से उनका भाई आ जाएगा और कहेगा, भाई, मैं मज़ाक कर रहा था।
"बारह साल," उन्होंने कहा। "बारह साल मैंने उससे एक बार भी बात नहीं की। वो हर साल हरनाम के मेले में आता था। मुझे पता था। मैं दूर से देखता था। बस देखता रहता था। कभी जाकर गले नहीं लगाया। मुझे लगा वो अपने फ़ैसले पर शर्मिंदा है।" उन्होंने सिर हिलाया। "शर्मिंदा वो नहीं था। शर्मिंदा मैं हूँ। मैंने अपना भाई खो दिया और मुझे पता भी नहीं चला।"
मीरा उनके पास बैठ गई। उसने उनका हाथ पकड़ा। उनके हाथ की उँगलियाँ उसकी उँगलियों में ऐसे फँसीं जैसे डूबता आदमी रस्सी पकड़ता है।
"मुखिया जी," मीरा ने कहा, "हम आपको दोष नहीं दे रहे। हम आपसे मदद माँगने आए हैं। आपका भाई ख़तरनाक है — पर वो आपका भाई है। अगर कोई उसे रोक सकता है, तो वही आप हैं।"
दयाराम ने उसकी तरफ़ देखा। फिर उन्होंने काग़ज़ उठाया और धीरे-धीरे उसे मोड़कर अपनी जेब में रख लिया।
"ये काग़ज़ मेरे पास रहेगा," उन्होंने कहा। "अगर मैं मरूँ, तो मेरा बेटा इसे खोलेगा। पर जब तक मैं ज़िंदा हूँ, मैं इसे किसी कीमत पर नहीं छोड़ूँगा।" वो उठे। उनकी कमर अब पहले जैसी नहीं थी — अब वो सीधे खड़े थे। "वीर, मुझे हरनाम से मिलना है। अकेले।"
"मुखिया जी, वो ख़तरनाक है—"
"वो मेरा भाई है," दयाराम ने कहा, और उनकी आवाज़ में वो ज़िद थी जो सिर्फ़ बड़े भाइयों में होती है। "मैं उससे वो सवाल पूछूँगा जो बारह साल से मेरे सीने में अटका है। अगर वो जवाब देगा, तो हमें रास्ता मिलेगा। और अगर नहीं देगा…" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "तो तुम अपना रास्ता खुद बना लेना। पर एक बात याद रखना — मेरा भाई जो कर रहा है, वो उसका फ़ैसला है। मेरा नहीं। तुम उस पर तरस मत खाना।"
बाहर आकर मीरा ने मेरी कलाई पकड़ ली। उसकी पकड़ तेज़ थी।
"वीर," उसने कहा, "अगर मुखिया हरनाम के पास जाएँगे और हरनाम ने उन्हें भी…"
"मुखिया जानते हैं," मैंने कहा। "उन्होंने अभी-अभी अपना भाई खोया है। उन्हें पता है कि अब क्या दाँव पर है।" मैंने एक गहरी साँस ली। "हमें कुछ और चाहिए, मीरा। एक ऐसा गवाह जो हरनाम की हरकत देख चुका हो। कोई जो अंदर से बोले।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो चमक आई जो मुझे सबसे ज़्यादा पसंद थी — वो चमक जो कहती थी कि उसके दिमाग़ में कुछ चल रहा है।
"अखाड़े का चौकीदार," उसने कहा। "बाबू। वो रात-रात भर अखाड़े के बाहर बैठता है। वो सब देखता है। पर किसी से कहता नहीं।"
"तो हम उससे पूछेंगे।"
"वो डरेगा।"
"तो हम उसका डर निकालेंगे," मैंने कहा। "मीरा, तेरे पिता ने कहा था — जो मेरी मिट्टी का है, उसका परिवार भी मेरा है। बाबू भी उसी मिट्टी का है। उसे बताना होगा कि वो अकेला नहीं है।"
हम लौटकर अखाड़े पहुँचे। टिंकू आँगन में बैठा था, उसकी माँ के पास। माँ के हाथ में रोटी थी, पर वो खा नहीं रही थीं। बस टिंकू का सिर सहला रही थीं।
टिंकू ने मुझे देखा और उठ खड़ा हुआ।
"भाई," उसने कहा, "मैंने सोच लिया। मैं उस पानी को हराऊँगा। पर एक शर्त है।"
"क्या?"
"जब मैं जीतूँ, तो हरनाम के सामने मैं वही कहूँगा जो मेरी माँ ने कहा था — कि मैं मिठाई बनाने वाले की बेटा हूँ, और मिठाई बनाने वाला किसी को ज़हर नहीं खिलाता।"
उसकी माँ का हाथ उसके सिर पर रुक गया। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में आँसू थे, पर होंठों पर मुस्कान।
"ये मेरा बेटा है," उन्होंने धीरे से कहा। "इसकी ज़िद मेरे ही जैसी है।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखें चमक रही थीं।
"चल," उसने कहा, "बाबू से मिलने।"
हम पलटे, पर तभी आँगन के दरवाज़े पर एक परछाई दिखी। दयाराम खड़े थे। उनका चेहरा अब सफ़ेद नहीं था — अब उस पर वो सन्नाटा था जो तूफ़ान से पहले आता है।
"वीर," उन्होंने कहा, "मैं हरनाम से नहीं मिलूँगा।"
"क्यों?"
"क्योंकि मैंने अभी-अभी अपने भतीजे को बाज़ार में देखा। वो मेरी तरफ़ देखकर मुस्कुराया। और उसने कहा — चाचा, पापा ने कहा है कि आज रात आपको अखाड़े में बुलाएँ। कोई ज़रूरी बात है।" दयाराम ने मेरी तरफ़ देखा। "वीर, मुझे नहीं लगता वो बात करने बुला रहे हैं।"
॥
दयाराम की बात सुनकर मेरे हाथों की उँगलियाँ ठंडी हो गईं। आँगन में खड़े सब लोग चुप थे। टिंकू की माँ के हाथ से रोटी का टुकड़ा गिर गया और उन्होंने उसे उठाने की ज़हमत नहीं की।
"कौन है तुम्हारा भतीजा?" मैंने पूछा।
दयाराम ने मेरी तरफ़ देखा। उनके होठ काँप रहे थे, पर आवाज़ साफ़ थी। "बसंता का बेटा। बंटी।"
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