Spirit of a Fighter – Chapter 494
"तुम्हारा नाम क्या है?" उसने पूछा। उसकी आवाज़ में वो सख़्ती थी जो सिर्फ़ सच निकलवाने के लिए आती है।
"कमला," उसने कहा। "रघुवीर की बड़ी बहन। जिसे गाँव ने नाम लेने लायक नहीं समझा।"
मैंने आँखें झपकीं। "माँ ने कभी तुम्हारा ज़िक्र नहीं किया।"
"नहीं करेगी।" कमला ने अपने घुटनों पर हाथ रखा। "क्योंकि मैं वो ज़ख़्म हूँ जिसे भूलने की कोशिश की गई। मैंने अपने भाई की बात नहीं मानी। शेर सिंह से शादी कर ली। और जिस दिन शेर सिंह मरा, उस दिन गाँव ने मुझे बाहर निकाल दिया। कहा — तू उसकी औरत है, तू भी उसी ज़हर की है।"
उसकी आवाज़ टूटी नहीं। पर उसके हाथ काँप रहे थे। उसने उन्हें अपनी साड़ी में छुपा लिया।
"तो तुम भैरव की माँ हो," मैंने कहा। शब्द मुँह से निकलते ही मुझे लगा जैसे कोई भारी पत्थर गिरा।
कमला ने कोई जवाब नहीं दिया। पर उसकी आँखों में वो पानी आ गया जो जवाब से ज़्यादा बोलता है।
"भैरव… मोहन," उसने धीरे से कहा। "मेरा बेटा। जिसे मैंने पंद्रह साल की उम्र में मिट्टी में ज़हर बनाते देखा था। और उस दिन मैं चुप रही। आज तक उस चुप्पी का दाम चुका रही हूँ।"
तहखाने में सन्नाटा छा गया। इतना गहरा कि मुझे अपनी साँसें सुनाई दे रही थीं।
"तुम यहाँ क्यों आई हो?" मैंने पूछा। "अब। इतने सालों बाद।"
कमला ने डिब्बी मेरी तरफ़ बढ़ाई।
"क्योंकि जिस आदमी को मैंने जन्म दिया," उसने कहा, "वो आज सबके सामने टूट गया। और मैंने सुना कि उसकी औरत… तुम्हारी माँ… ने उसे माफ़ी देने की बात कही।" उसका गला भर आया। "मैं सोचती थी माफ़ी नाम की चीज़ इस गाँव में मर गई। पर तुम्हारी माँ ने उसे ज़िंदा रखा। और मैं ये दवा लेकर आई हूँ — क्योंकि रघुवीर ने कहा था, जिस दिन मोहन अपना जुर्म कबूल करेगा, उस दिन ये दवा उसके काम आएगी। ज़हर का इलाज नहीं, पर ज़हर के बाद जो ज़िंदगी बचे, वो दवा से चलेगी।"
मैंने वो डिब्बी ली। उसका वज़न मेरी हथेली पर भारी था।
"तुम भैरव से मिलना चाहती हो?" मीरा ने पूछा।
कमला ने सिर हिलाया। फिर उसने कुछ ऐसा कहा जो मैंने सोचा भी नहीं था।
"नहीं।" उसकी आवाज़ साफ़ थी। "मैं उससे नहीं मिलूँगी। मैं तुमसे मिली हूँ। वो अब भी मेरा बेटा है, पर मैं उसकी माँ नहीं रही। जिस दिन मैंने उसे ज़हर बनाते देखकर चुप्पी साधी, उस दिन मैं मर गई थी। अब जो ज़िंदा है, वो सिर्फ़ एक औरत है जो अपने भाई का आख़िरी काम पूरा करना चाहती है।"
वो उठी। उसके घुटने चटकने की आवाज़ आई। वो सीढ़ियों की तरफ़ बढ़ी, और मेरे पास से गुज़रते वक़्त उसने मेरा कंधा छुआ।
"तुम रघुवीर के बेटे हो," उसने कहा। "तुम्हारी नाक में वो दम है जो रघुवीर की उँगलियों में था। पर तुम्हारी माँ में जो हिम्मत है, वो रघुवीर में भी नहीं थी।" उसने एक गहरी साँस ली। "उसे अकेला मत छोड़ना।"
वो ऊपर चली गई। उसके जाने के बाद तहखाने में वो गंध धीरे-धीरे घुल गई।
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। उसका चेहरा अभी भी सफ़ेद था।
"वीर," उसने कहा, "ये औरत… ये सब कुछ बदल देती है।"
"क्या?"
"सोच।" उसने अपनी उँगलियाँ छत की तरफ़ उठाईं। "भैरव पंद्रह साल का था जब उसने ज़हर बनाना सीखा। किसने सिखाया? रामदीन ने। किसके कहने पर? शेर सिंह के। क्यों? क्योंकि शेर सिंह रघुवीर से जलता था। और कौन उस सबका गवाह था? शेर सिंह की अपनी औरत — कमला।" उसने अपना सिर हिलाया। "अगर कमला पंचायत में गवाही दे, तो माधव का पूरा झूठा किस्सा एक झटके में ढह जाएगा।"
"पर वो गवाही देगी?" मैंने पूछा। "वो अपने ही बेटे के खिलाफ़…"
"उसने कहा ना," मीरा ने मेरी तरफ़ देखा, "वो उसकी माँ नहीं रही।"
हम ऊपर आए। टिंकू सीढ़ियों के मुँह पर बैठा था, उसके घुटने छाती से लगे थे। मुझे देखकर वो उठ खड़ा हुआ।
"कौन था?" उसने पूछा।
"बाद में," मैंने कहा। "पहले एक काम है।"
हम रणवीर सिंह के आँगन में आए। माँ और गुड़िया वहाँ थीं। माँ चूल्हे पर बैठी थीं और उनके हाथ में आधी जली रोटी थी। मेरी छाती में कुछ हुआ।
"माँ," मैंने कहा, "टिंकू की माँ कहाँ है?"
"अंदर," माँ ने कहा। "सो रही है। पूरी रात जागी थी।"
मैं अंदर गया। टिंकू की माँ खाट पर लेटी थीं। उनकी आँखें खुली थीं, और वो छत को देख रही थीं। मुझे देखकर वो उठने लगीं।
"मत उठो," मैंने कहा। "आंटी, मुझे आपसे एक बात कहनी है।"
वो बैठ गईं। उनके हाथ काँप रहे थे।
"टिंकू को कोई नुकसान नहीं होगा," मैंने कहा। "मैं वादा करता हूँ।"
उनकी आँखें भर आईं। "मुझे अपनी नहीं, उसकी चिंता है," उन्होंने कहा। "वो बच्चा है, वीर। उसकी उम्र मिठाई बनाने की है, लड़ने की नहीं।"
"आंटी," मैंने उनके सामने बैठकर कहा, "टिंकू ने आज तक किसी से कुछ नहीं माँगा। एक दिन उसने मुझे अपनी खीर खिलाई और कहा कि माँ से झूठ बोला है कि बिक गई। मैं उस दिन से जानता हूँ कि टिंकू क्या है। और मैं उसे किसी ऐसी जगह नहीं जाने दूँगा जहाँ से मैं उसे वापस न ला सकूँ।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। फिर उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा। उनकी पकड़ कमज़ोर थी, पर उसमें वो ज़िद थी जो सिर्फ़ माँओं में होती है।
"मेरा बेटा तुम्हारे साथ है," उन्होंने कहा। "तो मैं उसे रोकूँगी नहीं।" उनका गला भर आया। "बस एक बात कहती हूँ — जब वो जीतकर आए, तो सबसे पहले मेरे हाथ की मिठाई उसके मुँह में डालना।"
मैंने सिर हिलाया। मेरा गला भर आया।
बाहर आकर मैंने टिंकू के कंधे पर हाथ रखा। वो मेरी तरफ़ देखने से बच रहा था।
"तेरी माँ ने कहा," मैंने कहा, "कि तू जो करना चाहता है, कर। पर जीतकर आना।"
टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में पानी था, पर उसने उसे पोंछा नहीं। उसने अपना सिर ऊपर किया और अपने होंठ भींचे।
"भाई," उसने कहा, "मैं आज से तेरे पीछे नहीं, तेरे साथ चलूँगा।"
मीरा आँगन में आई। उसके हाथ में एक और कॉपी थी, जिस पर उसने अपनी साफ़ लिखाई में सब कुछ लिख रखा था — कालू काका की गवाही, रघुवीर का काग़ज़, हरनाम की चाबी की बात, कमला का नाम, सब।
"एक कॉपी मुखिया दयाराम को देनी होगी," उसने कहा। "अगर हमें कुछ हो जाए, तो सच कम से कम एक जगह बचा रहे।"
"पर मुखिया…" मैंने कहा। "वो माधव सिंह के डर से काँपता है।"
"मुखिया डरता है," मीरा ने काग़ज़ मेरी तरफ़ बढ़ाया, "पर वो ईमानदार है। और आज उसने अपना बोझ कबूल किया था। डरा हुआ ईमानदार आदमी, बहादुर बेईमान से बेहतर है।"
मैंने काग़ज़ लिया।
मुखिया का घर गाँव के उस किनारे पर था जहाँ से नहर दिखती थी। हम दोनों चले — मैं और मीरा। टिंकू पीछे रुका, क्योंकि उसकी माँ को अभी उसकी ज़रूरत थी।
रास्ते में मीरा ने कुछ नहीं कहा। बस चलती रही, और मैं उसके साथ। एक मोड़ पर उसने मेरी तरफ़ देखा।
"वो औरत," उसने कहा। "कमला। तुझे उस पर यकीन है?"
"मुझे उसकी गंध पर यकीन है," मैंने कहा। "और उसकी आवाज़ पर। जिस आदमी की आवाज़ में अपने बेटे का नाम लेते वक़्त काँपन हो, वो झूठ नहीं बोल सकता।"
मीरा ने कुछ नहीं कहा। पर उसने अपना हाथ मेरी तरफ़ बढ़ाया और मेरी उँगलियाँ छू लीं। बस एक पल। फिर हटा लिया।
मुखिया दयाराम अपने आँगन में चारपाई पर बैठे थे। सामने चाय की केतली रखी थी, जो ठंडी हो चुकी थी। हमें देखकर वो उठ खड़े हुए।
"वीर," उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ में वो थकान थी जो बीस साल की हो।
"मुखिया जी," मैंने कहा, "मैं आपसे कुछ माँगने नहीं आया। मैं कुछ देने आया हूँ।"
मैंने काग़ज़ उनकी तरफ़ बढ़ाया।
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। फिर काग़ज़ लिया। फिर चश्मा निकाला, उसे पोंछा, और पहना।
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