Spirit of a Fighter – Chapter 493
मीरा ने आगे बढ़कर पर्ची मेरे हाथ से ली। उसने उसे ध्यान से देखा, फिर बर्फी की तरफ़।
"वीर," उसने कहा, "ये बर्फी… इसमें केसर है। और तुमने कल कहा था कि टिंकू की दुकान पर केसर कभी नहीं आती।"
"हाँ।"
"तो ये बर्फी कोई और बना रहा है। और वो हमें बता रहा है कि उसे टिंकू की दुकान की हर चीज़ का पता है।"
टिंकू ने अपना मुँह हाथ से ढँक लिया। "मेरी माँ," वो धीरे से बोला। "भाई, अगर उसने मेरी माँ को…"
"नहीं," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ इतनी सख़्त निकली कि मैं खुद चौंक गया। "उसने अभी कुछ नहीं किया। वो सिर्फ़ डरा रहा है। वो चाहता है कि हम डर जाएँ, पंचायत न बुलाएँ, और सब कुछ भूल जाएँ।"
मैंने डिब्बे को उठाया और उसे अपने सामने रखा।
"पर उसे एक बात का अंदाज़ा नहीं है," मैंने कहा। "वो ये बर्फी छोड़ गया। और बर्फी उसकी गंध लिए है।"
मैंने आँखें बंद करके बर्फी को सूँघा।
घी। शक्कर। केसर। कपूर। नारियल का तेल। महँगा साबुन। और… और एक और चीज़। बहुत हल्की। धुएँ की गंध। जैसे किसी ने अभी-अभी चूल्हा जलाया हो। और उस धुएँ में — भुनी हुई मिर्च।
मैंने आँखें खोलीं।
"ये बर्फी किसी ऐसे आदमी ने बनाई है जिसके हाथ में आग की गंध है," मैंने कहा। "कोई लोहार? नहीं। कोई ऐसा जो रोज़ आग जलाता है।"
मीरा ने अपना बैग खोला और उसमें से एक शीशी निकाली। छोटी, काँच की। उसने बर्फी का एक टुकड़ा तोड़कर उसमें रखा, फिर शीशी में कुछ बूँदें डालीं और उसे हिलाया।
"मैं इसे घर ले जाकर जाँचूँगी," उसने कहा। "अगर इसमें ज़हर है, तो पता चल जाएगा।"
"और अगर नहीं है?"
"तो इसका मतलब और भी बुरा है," उसने कहा, और उसकी आवाज़ धीमी हो गई। "इसका मतलब है कि वो हमें ज़हर से नहीं, डर से मार रहा है।"
टिंकू अब भी वहीं खड़ा था। उसकी आँखें डिब्बे पर टिकी थीं।
"भाई," उसने कहा, "मैं अपनी माँ को इस घर में अकेला नहीं छोड़ सकता।"
"नहीं छोड़ेगा।" मैंने उसका कंधा पकड़ा। "आज से तुम्हारी माँ हमारे घर पर रहेगी। मेरी माँ के साथ। कोई उन्हें छू भी नहीं सकता।"
टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखें भरी हुई थीं, पर वो रोया नहीं। बस उसने अपना सिर हिलाया और अपने होंठ कसकर बंद कर लिए।
"अब सुनो सब," मैंने कहा। "यहाँ और देर नहीं रुकना। हमें सारे सबूत तहखाने में ले जाने हैं। आज। अभी।"
हम सब वापस रणवीर सिंह के आँगन में आए। माँ और गुड़िया वहाँ पहुँच चुकी थीं — सुक्खी बुआ ने उन्हें खबर भेज दी थी। माँ को देखकर मेरी छाती में कुछ भर गया।
"माँ," मैंने कहा, "टिंकू की माँ को हमारे घर ले आओ। और अपने साथ रखो।"
माँ ने एक पल मेरी तरफ़ देखा। फिर उन्होंने बिना सवाल किए सिर हिलाया।
"गुड़िया," वो बोलीं, "चल।"
गुड़िया ने मेरी तरफ़ देखा, और उसकी आँखों में सवाल था। पर उसने भी कुछ नहीं पूछा। वो माँ के पीछे चली गई।
अब आँगन में मैं, मीरा, टिंकू, कालू काका और रणवीर सिंह बचे थे।
"काग़ज़," मैंने कहा। "हरनाम की कॉपी, रघुवीर का काग़ज़, माँ की पीली शीशी, हरनाम की चाबी, ये दोनों पर्चियाँ। सब।"
हमने सब इकट्ठा किया। मीरा ने अपना बैग खोला और सारी चीज़ें उसमें रखीं, एक-एक करके, ध्यान से, जैसे कोई कीमती चीज़ें हों।
"कालू काका," मीरा ने कहा, "तुम्हारी गवाही ज़ुबानी है। उसे लिखना पड़ेगा।"
"मैं लिखूँगा," रणवीर सिंह ने कहा। "मैं कालू की गवाही लिखूँगा। और उसके नीचे अपना नाम भी लगाऊँगा।"
कालू काका ने उनकी तरफ़ देखा। उनकी आँखें फिर भर आईं, पर इस बार वो मुस्कुराए भी। धीरे से, जैसे बहुत सालों बाद।
हम सब तहखाने की तरफ़ चले। रास्ते में मैंने एक बार पीछे मुड़कर देखा। अखाड़े की दीवार धूप में लाल दिख रही थी। और उसके ऊपर, चिड़िया उड़ रही थीं।
तहखाने में उतरते वक़्त मेरी नाक में फिर वही गंध आई — कपूर, नारियल का तेल, महँगा साबुन। पर इस बार वो गंध तेज़ थी। बहुत तेज़।
मैं रुक गया। मेरी साँस रुक गई।
"मीरा," मैंने धीरे से कहा, "ये गंध… यहाँ है। तहखाने में।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। उसका चेहरा सफ़ेद पड़ गया।
"मतलब वो यहाँ आया है," उसने कहा। "हमारे तहखाने में।"
मैंने अपना हाथ दीवार पर रखा और नीचे की तरफ़ देखा। सीढ़ियाँ अंधेरे में गायब हो रही थीं। और उस अंधेरे से एक आवाज़ आई — धीमी, हल्की, जैसे कोई गा रहा हो।
कालू काका ने मेरा कंधा पकड़ा।
"बेटा," उन्होंने धीरे से कहा, "कोई नीचे है।"
मैंने सिर हिलाया। मेरे हाथ मुट्ठी में बंध गए।
"तो चलो," मैंने कहा। "देखते हैं कौन है।"
मैंने पहली सीढ़ी पर पैर रखा, और अंधेरे ने मुझे निगल लिया।
॥
मेरी चप्पल उस पहली सीढ़ी पर टिकी थी, और नीचे से आती वो गुनगुनाहट मेरे कानों में घुल रही थी। कोई गा रहा था — धीमी आवाज़ में, बिना शब्दों के, जैसे कोई बच्चा सोते वक़्त अपने आप को नींद दिला रहा हो।
पर उस आवाज़ के साथ वो गंध थी। कपूर, नारियल का तेल, महँगा साबुन। इतनी तेज़ कि मेरी नाक जलने लगी।
मीरा ने मेरी कलाई पकड़ी।
"वीर," उसने फुसफुसाया, "अंधेरे में सीधे मत जाओ।"
"पर वो नीचे है," मैंने कहा। "और मुझे लगता है वो हमारा ही इंतज़ार कर रहा है।"
टिंकू ने मेरे पीछे से झाँका। उसकी साँस मेरी गर्दन पर गर्म पड़ रही थी।
"भाई," उसने कहा, "मैं तेरे साथ चलूँगा।"
"नहीं।" मैंने उसका कंधा दबाया। "तू ऊपर रुक। अगर मैं ऊपर आकर न कहूँ, तो कालू काका को लेकर पुलिस के पास भाग।"
"पर—"
"टिंकू।" मैंने उसकी तरफ़ मुड़कर देखा। "तेरी माँ सुबह से तेरा रास्ता देख रही है। तू उसे यहाँ नहीं पा सकता।"
उसका मुँह खुला रह गया। फिर उसने होंठ भींचे और सिर हिलाया।
मैं नीचे उतरा। मेरे पीछे मीरा थी — उसने मेरी कमीज़ का पिछला हिस्सा पकड़ रखा था, और उसकी मुट्ठी में मेरी कमीज़ की गाँठ बन गई थी। मैंने कुछ नहीं कहा। अच्छा ही लगा।
सीढ़ियाँ कम होने लगीं। गुनगुनाहट बढ़ने लगी। और फिर, आख़िरी मोड़ पर, उस सीढ़ी के नीचे जहाँ से तहखाने का खुला हिस्सा शुरू होता था, एक दीये की लौ काँप रही थी।
वहाँ कोई बैठा था।
मैंने एक कदम और बढ़ाया, और लौ के उजाले में वो चेहरा सामने आया।
एक औरत। उम्र पैंतालीस के आस-पास। गर्दन के पीछे एक पुराना गोल जला निशान। हाथ में लोहे की छोटी डिब्बी।
वही औरत। जो माँ से हल्दी माँगकर ले गई थी।
मैं रुक गया। मेरा शरीर पत्थर हो गया।
उसने गुनगुनाना बंद कर दिया। उसने अपना सिर उठाया और मुझे देखा — सीधे, बिना डर के, बिना हड़बड़ी के। जैसे वो वर्षों से मेरा इंतज़ार कर रही हो।
"आ गए," उसने कहा। उसकी आवाज़ खुरदरी थी, जैसे सालों से किसी ने उससे बात न की हो।
"तुम कौन हो?" मैंने पूछा। मेरी आवाज़ मुझे अपनी नहीं लगी।
उसने लोहे की डिब्बी अपनी गोद में रखी और धीरे से उसका ढक्कन खोला। अंदर से एक गंध निकली — तीखी, मीठी, जली हुई चीनी जैसी।
"ये वो नहीं है जो तुम सोच रहे हो," उसने कहा। "ये मिठाई नहीं है। ये दवा है। रघुवीर की बनाई आख़िरी दवा।"
मेरा दिल एक पल को रुका।
"तुम रघुवीर को कैसे जानती हो?"
उसने डिब्बी का ढक्कन बंद किया और मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में कुछ था जो मैं पहचान नहीं पा रहा था — कोई पुराना ज़ख़्म, या कोई पुराना प्यार।
"मैं रघुवीर की बहन हूँ," उसने कहा। "या कहो… जो उसकी बहन बनने की हक़दार नहीं रही।"
मेरे पैरों तले सीढ़ी खिसक गई। मैंने दीवार को हाथ से पकड़ा।
मीरा ने मेरी कमीज़ छोड़ दी और आगे आई।
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