Spirit of a Fighter – Chapter 492
मैंने सिर हिलाया। "मैं कालू काका को बुलाता हूँ।"
कालू काका अखाड़े के पिछले हिस्से में, पुराने कमरे में रहते थे। जब मैं पहुँचा, वो अपनी चारपाई पर बैठे थे, हाथ में तांबे का लोटा था और वो उसे देख रहे थे, जैसे उसमें कुछ लिखा हो।
"काका," मैंने कहा। "आज सब सबूत तहखाने में रखने हैं।"
उन्होंने लोटा नीचे रखा और मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें सुबह की धूप में और भी धँसी दिख रही थीं।
"सब रख लेंगे, बेटा," वो बोले, धीमी आवाज़ में। "पर एक काम पहले करना है।"
"क्या?"
वो उठे। उनकी कमर झुकी थी, और उठते वक़्त उन्होंने मेरा कंधा पकड़ा। फिर वो सीधे खड़े होकर बोले, "मुझे रणवीर सिंह से माफ़ी माँगनी है।"
मैं चुप हो गया।
"बीस साल," कालू काका ने कहा। उनकी आवाज़ में कुछ ऐसा था जो मैंने पहले कभी नहीं सुना — काँपन, पर डर का नहीं। "बीस साल मैंने उस आदमी को देखा जो मेरे सामने मिट्टी में गिरा था। उसकी टूटी टाँगें देखीं। और मैं चुप रहा। मैंने एक बात भी नहीं बोली। मैं उनके पास जाता था, उनके कमरे में झाड़ू लगाता था, और मेरी ज़ुबान पर ताला लगा रहता था।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में पानी था।
"मैं गवाही देने को तैयार हूँ, बेटा। पर गवाही देने से पहले मुझे उस आदमी के पैरों पर बैठकर कहना है — माफ़ कर दे।"
मैंने उनका हाथ पकड़ा। "चलिए, काका।"
रणवीर सिंह उस वक़्त आँगन में थे। व्हीलचेयर पर, धूप में, आँखें बंद किए। उनके हाथ में एक तांबे का गिलास था जिसमें पानी था, और वो उसे पकड़े हुए ऐसे बैठे थे जैसे किसी चीज़ का इंतज़ार कर रहे हों।
हम जब पहुँचे, उन्होंने आँखें खोलीं। कालू काका उनके सामने खड़े रहे, फिर धीरे-धीरे उनके घुटनों के पास झुक गए।
"रणवीर जी," कालू काका ने कहा। उनकी आवाज़ टूट रही थी। "मैंने आपको धोखा दिया।"
रणवीर सिंह ने कुछ नहीं कहा।
"उस रात मैंने भैरव को कुएँ के पास देखा था। उसके हाथ में फावड़ा था। मैंने सुना था वो कुछ गड़गड़ा रहा है। और मैं…" कालू काका ने अपना हाथ उठाकर अपनी छाती पर रखा। "मैं डर गया। मैं भाग गया। और मैंने आपको नहीं बताया।"
अब कालू काका की आवाज़ में रोना था। वो अपने हाथ जोड़कर बैठे रहे, सिर झुका हुआ।
"मैं हर रोज़ आपके सामने से गुज़रता था। हर रोज़ आपको इस कुर्सी पर बैठा देखता था। और मेरा दिल हर रोज़ मरता था। माफ़ कर दीजिए, रणवीर जी। मैं गवाही दूँगा। पर पहले आप माफ़ कर दीजिए।"
आँगन में सन्नाटा छा गया। दूर कहीं कोयल बोल रही थी, और मैंने अपनी साँस रोक ली थी।
रणवीर सिंह ने अपना तांबे का गिलास धीरे से पास की चौकी पर रखा। फिर उन्होंने अपना हाथ बढ़ाया और कालू काका का झुका हुआ सिर उठाया।
"कालू," उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ भारी थी, पर उसमें गुस्सा नहीं था। "तूने मुझे धोखा नहीं दिया।"
कालू काका ने उनकी तरफ़ देखा।
"तू डर गया था," रणवीर सिंह ने कहा। "और डरना इंसान होने की निशानी है। जो डरता नहीं, वो या तो पत्थर है या फिर भैरव जैसा बेईमान।"
कालू काका की आँखों से पानी बह निकला। वो रणवीर सिंह के हाथ को अपने दोनों हाथों में पकड़कर बैठे रहे, और उनके कंधे काँप रहे थे।
"बीस साल," रणवीर सिंह ने धीरे से कहा। "बीस साल मैंने भी तुझे देखा, कालू। और मैं जानता था तू कुछ जानता है। पर मैंने कभी नहीं पूछा। क्योंकि मुझे भी डर था। मुझे डर था कि अगर तू बोलेगा, तो मेरी बेटी को कोई मार देगा।"
अब मेरी आँखों में भी कुछ चुभने लगा था। मैंने अपना मुँह दूसरी तरफ़ कर लिया।
"तो अब हिसाब बराबर," रणवीर सिंह ने कहा। "तूने डर के मारे चुप्पी साधी, मैंने भी। अब हम दोनों नहीं साधेंगे।"
उन्होंने कालू काका का हाथ पकड़कर उन्हें उठाया। फिर उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
"वीर," वो बोले, "ये बीस साल का बोझ उतर गया। अब ये आदमी जो बोलेगा, वो पंचायत में पत्थर की लकीर होगी।"
मैंने सिर हिलाया। मेरी छाती भर आई थी, और मैं कुछ बोल नहीं पा रहा था।
तभी पीछे से चप्पलों की आवाज़ आई। टिंकू दौड़ता हुआ आया। उसका चेहरा लाल था, माथे पर पसीना, और उसकी साँस ऐसी चल रही थी जैसे वो कहीं से भागकर आया हो।
"भाई!" वो चिल्लाया। "भाई, दुकान पर आ!"
"क्या हुआ?" मैंने पूछा, और मेरा दिल एकबारगी धक्क से रह गया।
"कुछ नहीं… मतलब… कोई नहीं है वहाँ।" वो हाँफते हुए बोला। "पर बाहर, दरवाज़े के पास… एक डिब्बा रखा है।"
"डिब्बा?"
"मिठाई का डिब्बा, भाई। बंद। ऊपर से बँधा हुआ। और उस पर…" उसकी आवाज़ रुक गई। वो अपनी जेब से कुछ निकालने लगा।
मीरा आगे आई। "टिंकू, धीरे। साँस ले।"
टिंकू ने साँस ली। फिर उसने अपनी जेब से एक पर्ची निकाली। छोटी, मुड़ी हुई। उसने वो मेरी तरफ़ बढ़ा दी।
मैंने पर्ची खोली। सफ़ेद काग़ज़, नीली स्याही। लिखाई साफ़-साफ़, सीधी, जैसे किसी ने बहुत आराम से लिखा हो।
"अगली बार दुकान नहीं, तेरी माँ जलेगी।"
मेरे हाथ ठंडे हो गए।
टिंकू मेरी तरफ़ देख रहा था। उसकी आँखों में वो डर था जो मैंने पहले कभी नहीं देखा था। वो डर जो किसी की जान को खतरा देखकर आता है।
"भाई," उसने धीरे से कहा, "मेरी माँ…"
"तुम्हारी माँ ठीक है," मैंने फौरन कहा। "कहाँ है वो?"
"घर पर। रोटी बना रही है। मैंने उसे कुछ नहीं बताया।"
"अच्छा किया।" मैंने पर्ची को मोड़कर अपनी जेब में रखा। "अब सुन — डिब्बा कहाँ है?"
"दुकान के दरवाज़े के बाहर। चौकी पर। ऐसे रखा है जैसे कोई जान-बूझकर रख गया हो।"
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। वो मेरी तरफ़ देख रही थी, और उसके चेहरे पर वही बात थी जो मेरे दिमाग़ में चल रही थी — ये धमकी सिर्फ़ डराने के लिए नहीं है। ये एक चेतावनी है। कोई हमें बता रहा है कि वो अब खेल खुलकर खेलेगा।
"चलो," मैंने कहा। "सब चलो।"
हम टिंकू की दुकान की तरफ़ चले। रास्ते में मैंने अपनी नाक से लंबी साँस खींची। सुबह की हवा में घी की गंध थी, चाय की गंध थी, और उसके नीचे — धीरे से — वही महँगा साबुन।
पर इस बार साबुन की गंध के साथ कुछ और था। नारियल का तेल। और… कपूर।
मैं रुक गया।
"क्या हुआ?" मीरा ने पूछा।
"कपूर," मैंने कहा। "इसकी गंध में कपूर है। और नारियल का तेल।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। "कपूर और नारियल का तेल… ये तो…"
"ये वो चीज़ें हैं जो मुर्दे के साथ जलाते हैं," मैंने धीरे से कहा।
टिंकू के चेहरे का रंग उड़ गया।
हम दुकान पहुँचे। टिंकू की दुकान अब नई बनी थी — कल रात गाँव ने मिलकर बनाई थी। टीन का नया शेड, ताज़ी लकड़ी की गंध, और दरवाज़े पर चमकीला पीला पर्दा। चौकी पर एक डिब्बा रखा था। लकड़ी का, चमकदार, ऊपर से लाल फ़ीते से बँधा।
मैंने आगे बढ़कर उसे देखा। मेरी नाक ने काम करना शुरू किया।
लकड़ी। लाल फ़ीता। और… अंदर से — मिठाई की गंध। घी। शक्कर। केसर। और उसके नीचे — वही कपूर, वही नारियल का तेल, वही महँगा साबुन।
"खोलूँ?" टिंकू ने पूछा। उसकी आवाज़ काँप रही थी।
"मत छू," मैंने कहा। "मैं खोलता हूँ।"
मैंने फ़ीता खोला। डिब्बे का ढक्कन उठाया।
अंदर बर्फी थी। सोने जैसी चमकती, चाँदी की पन्नी में लिपटी। और उसके ऊपर एक और पर्ची रखी थी। छोटी, मुड़ी हुई।
मैंने पर्ची उठाई और खोली। इसमें सिर्फ़ एक लाइन थी।
"जो आग लगाएगा, वो मिठाई खाएगा।"
मेरे पीछे टिंकू ने एक आवाज़ निकाली, जैसे किसी ने उसका गला दबा दिया हो।
"भाई," वो बोला। "ये तो… ये तो वही बात है जो कल…"
"हाँ," मैंने कहा। "कल टिंकू की माँ की तस्वीर के पीछे से यही लिखा हुआ काग़ज़ मिला था।"
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