Spirit of a Fighter – Chapter 49
"नहीं," रणवीर सिंह ने कहा। उन्होंने अपनी कुर्सी की तरफ़ देखा। "मैं नहीं जा सकता। मेरी कुर्सी उस चूल्हे तक नहीं पहुँचेगी। और अगर मैं वहाँ गया, तो भैरव को पता चल जाएगा कि हमें सब पता है।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "वीर, तू जाएगा। तेरे पास वो नाक है। तू वहाँ से गुज़रेगा, तो तुझे पता चल जाएगा कि कौन कहाँ है, कितने आदमी हैं, कौन छुपा है।"
"और मैं?" मीरा ने कहा।
"तू साथ जाएगी," रणवीर सिंह ने कहा। "क्योंकि जब फ़ाइल मिलेगी, तो उसे पढ़ने वाला कोई चाहिए जो काग़ज़ों को समझ सके। और जब वो जलाने की कोशिश करेगा, तो उसे रोकने वाला भी कोई चाहिए।"
उन्होंने कालू काका की तरफ़ देखा। "कालू, तू उन्हें रास्ता दिखाएगा। पर तू अंदर नहीं घुसेगा। तू बाहर खड़ा रहेगा — और अगर सुबह तक वो दोनों बाहर न आएं, तो तू पंचायत को बुलाएगा। सीधे घर जाकर। सबको।"
कालू काका ने अपना सिर हिलाया। "मैं बीस साल से चुप रहा। अब मैं नहीं रहूँगा।"
मीरा ने अपने पिता की तरफ़ देखा। "पापा, आप घर जाइए।"
"नहीं," रणवीर सिंह ने कहा। "मैं यहीं रहूँगा। इसी तहखाने में। अगर भैरव वापस आया, तो उसे सीधा मेरी कुर्सी से टकराना पड़ेगा।"
कालू काका ने शुरुआत में विरोध किया, पर रणवीर सिंह ने एक नज़र से उन्हें चुप करा दिया। वो बूढ़े पहलवान की आँखें थीं — कमज़ोर नहीं, थकी नहीं, सिर्फ़ इंतज़ार करती हुई।
बाहर निकले तो हवा ठंडी थी। नीम के पेड़ की पत्तियाँ सरसरा रही थीं, और दूर कहीं गाँव का एक कुत्ता भौंक रहा था।
कालू काका ने हमें अखाड़े की पीछे वाली दीवार की तरफ़ ले जाने की बजाय उसके उलटी तरफ़ घुमाया — एक सूखी नाली के किनारे से, जहाँ कभी पानी बहता था और अब सिर्फ़ सूखी पत्तियाँ थीं। वहाँ एक टूटी मुंडेर थी, और उसके पीछे — वो चूल्हा।
मैंने पहले गंध पकड़ी। जली हुई लकड़ी की नहीं। जली हुई मिट्टी की। और उसके नीचे, बहुत हल्की, किसी काग़ज़ के जलने की गंध। जैसे किसी ने अभी-अभी आग जलाई हो और बुझा दी हो।
"वो यहाँ आ चुका है," मैंने फुसफुसाया।
कालू काका ने मेरी बाँह पकड़ी। "कैसे पता?"
"गंध से। यहाँ हवा में काग़ज़ जलने की गंध है। पर बहुत हल्की। मतलब आग जलाई गई, फिर बुझा दी गई। शायद अभी-अभी।"
मीरा ने अपनी टॉर्च जलाई और इधर-उधर घुमाया। चूल्हे के पास ज़मीन पर राख थी, और राख में कुछ और — जली हुई फ़ाइल का कोना, जो अधूरा बच गया था। मीरा ने उसे उठाया।
"ये तो…" उसने उसे अपनी टॉर्च के नीचे रखा। "ये तो अखाड़े का पुराना रिकॉर्ड है। पर ये पूरा नहीं जला।"
उसने राख में हाथ डाला और कुछ और निकाला — एक जली हुई कॉपी का आधा पन्ना, जिस पर नाम पढ़े जा सकते थे। "रामदीन," उसने पढ़ा। "बुद्धू। शेरा।" उसकी आवाज़ भारी हुई। "ये सब नाम… ये वो पहलवान हैं जो मरे।"
"तो उसने अभी सब नहीं जलाया," मैंने कहा। "कुछ बचा है।"
हमने चूल्हे के पीछे देखा — वहाँ एक टूटी सीढ़ी थी, जो अखाड़े की पिछली दीवार पर लगी थी। और उस सीढ़ी के ऊपर, दीवार के पार, एक खिड़की थी जिसमें रोशनी जल रही थी।
"वो कमरा?" मीरा ने पूछा।
"भैरव का कमरा," कालू काका ने कहा। "पर वो खिड़की बंद रहती है। उसमें सलाखें हैं।"
"आज नहीं," मैंने कहा। मैंने देखा — खिड़की का एक पल्ला खुला था, और उसमें से धुआँ निकल रहा था।
हम सीढ़ी की तरफ़ बढ़े। मेरा दिल ज़ोर से धड़क रहा था, पर मेरे हाथ ठंडे थे। मीरा मेरे पीछे थी, और उसकी टॉर्च की रोशनी मेरे कंधे पर पड़ रही थी।
तभी खिड़की से आवाज़ आई — भैरव की आवाज़, किसी और से बात करते हुए।
"जल्दी कर, हरनाम। सुबह तक कुछ नहीं बचना चाहिए। और हाँ — कालू को भी सुबह तक देख लेना। वो बूढ़ा आज बहुत बोल गया।"
हरनाम की आवाज़ आई, डर से काँपती हुई। "पर… पर सर, कालू काका तो…"
"कालू क्या, हरनाम? कालू मेरा नौकर था, बीस साल से। आज उसने मेरे सामने रणवीर के आगे घुटने टेके। अब वो मेरा नहीं है। और जो मेरा नहीं है, वो इस अखाड़े में नहीं रहेगा।"
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसका चेहरा सख़्त था, पर उसकी उँगलियाँ टॉर्च पर कस रही थीं।
"वीर," उसने फुसफुसाया। "वो कालू काका को मार डालेगा।"
"नहीं मारेगा," मैंने कहा। "क्योंकि हम अब अंदर जा रहे हैं।"
मैं सीढ़ी पर चढ़ा। पहली सीढ़ी चरमराई, पर टिकी रही। दूसरी भी। खिड़की अब मेरे सामने थी — उसमें से धुआँ और रोशनी दोनों आ रहे थे। मैंने अंदर झाँका।
कमरे में फ़ाइलें जल रही थीं। भैरव अपनी लाल धोती में खड़ा था, हाथ में एक-एक काग़ज़ उठाकर आग में फेंक रहा था। हरनाम पास में खड़ा था, हाथ में एक छोटा डिब्बा लिए, जिसमें कुछ शीशियाँ थीं।
और फिर मेरी नज़र एक और चीज़ पर पड़ी। कमरे के कोने में, दीवार से टिकाकर, एक बूढ़ा आदमी बैठा था — कालू काका। उनके हाथ बँधे थे, मुँह में कपड़ा ठुँसा था, और उनकी आँखों में पानी था।
मेरा सीना जम गया। कालू काका हमारे साथ बाहर नहीं थे। वो अंदर थे। कब? कैसे?
मुझे याद आया — चूल्हे के पास जब हम पहुँचे, तो कालू काका एक पल के लिए पीछे रह गए थे। उन्होंने कहा था कि वो बाहर पहरा देंगे। पर वो अंदर कैसे?
मेरी गर्दन पर ठंडी हवा लगी। मैंने पीछे मुड़कर देखा। सीढ़ी के नीचे, अंधेरे में, एक साया खड़ा था। मोटा, तगड़ा, छोटी मूँछें।
लुट्टन।
"सर," लुट्टन ने ऊपर की तरफ़ आवाज़ दी। "सर, वो आ गए। दोनों।"
भैरव ने आग में फेंकता हुआ काग़ज़ रोक लिया। उसने ऊपर देखा। उसकी आँखें मेरी आँखों से मिलीं, और उसके होंठ फैले।
"अच्छा," उसने कहा। "तो तुमने खुद आने का फ़ैसला किया। इससे अच्छा मुझे क्या चाहिए था?"
उसने आग में काग़ज़ फेंका और हरनाम से बोला, "डिब्बा लाओ। और इन दोनों को नीचे उतारो।"
लुट्टन सीढ़ी चढ़ने लगा। मैंने मीरा का हाथ पकड़ा। "पीछे हटो," मैंने फुसफुसाया। "मेरे पीछे रहो।"
"मैं तेरे पीछे नहीं रहूँगी," उसने कहा। "मैं तेरे साथ रहूँगी।"
लुट्टन की गंध मेरी नाक में आई — पसीना, मिट्टी, और उसके नीचे वो कड़वाहट जो अब भी उसके शरीर में बची थी। वो डरा हुआ था। भैरव की छड़ के नीचे भी, वो अब भी डरा हुआ था।
लुट्टन ऊपर आया, और उसके हाथ में एक मोटी रस्सी थी।
"तुम दोनों," उसने कहा। उसकी आवाज़ में वो धमक नहीं थी जो पहले थी। "सर कह रहे हैं कि अंदर आ जाओ।"
"लुट्टन," मैंने कहा। मैंने उसकी आँखों में देखा। "तू बीस साल से वो पानी पी रहा है। तेरे शरीर में ज़हर है। तू जानता है। तूने खुद कबूल किया था।"
लुट्टन का हाथ रुका। रस्सी ढीली हुई।
"चुप रह," उसने कहा। पर उसकी आवाज़ फटी हुई थी।
"तू मरेगा, लुट्टन," मैंने कहा। "अगर तूने पीना बंद नहीं किया। वो तुझे भी वैसे ही मारेगा जैसे रामदीन को मारा। तू बस उसका अगला नंबर है।"
लुट्टन ने पीछे देखा — खिड़की से, जहाँ भैरव खड़ा था। भैरव ने उसे देखा और कुछ नहीं कहा। बस आग में एक और काग़ज़ फेंका।
और उस चुप्पी में लुट्टन का चेहरा बदला। मैंने देखा — उसके हाथ की रस्सी ज़मीन पर गिरी। उसने कोई शब्द नहीं कहा, बस सीढ़ी से नीचे उतर गया, और अंधेरे में ग़ायब हो गया।
भैरव की आवाज़ आई, अब तेज़। "हरनाम! जल्दी कर!"
हरनाम ने डिब्बा उठाया और आग में उलटने लगा — वो शीशियाँ, जो उसने बीस साल में बनाई थीं। मीरा ने मेरा हाथ छोड़ा और खिड़की के पल्ले को ज़ोर से धकेला। पल्ला खुला, और वो अंदर कूद गई।
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