Spirit of a Fighter – Chapter 48
वो मुड़ा और मीरा की तरफ़ देखा।
"पर रणवीर, तू एक बात भूल रहा है।" उसके होंठों पर वो मुस्कान लौटी, पर अब उसमें कुछ टूटा हुआ था। "तेरे पैर कैसे गए — ये सिर्फ़ मैं जानता हूँ। और तू। और तेरी बेटी को ये कभी नहीं पता चलेगा। क्योंकि अगर वो जान गई, तो वो भी वही करेगी जो तू करना चाहता था — और मैं उसे ज़िंदा नहीं छोड़ूँगा।"
मीरा आगे आई। उसने अपना बैग खोला और उसमें से एक पुरानी पीली पर्ची निकाली — वही जो उसने अपनी माँ की सहेली के घर से लाई थी, जिस पर भैरव का नाम लिखा था।
"मुझे पता है, पापा," उसने कहा। उसकी आवाज़ साफ़ थी, बिना काँपे। "मुझे सब पता है।"
रणवीर सिंह ने अपनी बेटी की तरफ़ देखा। उनकी आँखों में पहली बार कुछ ऐसा आया जो मैंने पहले नहीं देखा — डर। वो डर जो बाप को अपनी बेटी के लिए होता है।
"मीरा…"
"माँ की सहेली ने मुझे सब बता दिया, पापा।" मीरा की आवाज़ धीमी हुई। "बीस साल पहले जब तुम कुर्सी पर आए थे, तो भैरव ने माँ को बुलाया था। उसने कहा था — 'अगर तुमने किसी को कुछ बताया, तो तुम्हारा पति ज़िंदा नहीं रहेगा। और तुम्हारी बेटी भी नहीं।' माँ ने डर के मारे किसी को नहीं बताया। मरते वक़्त भी नहीं बताया। पर उसने एक पर्ची लिखकर अपनी सहेली को दे दी थी — 'अगर मेरी बेटी कभी पूछे, तो ये उसे देना।'"
उसने पर्ची को भैरव की तरफ़ बढ़ाया।
"यही है वो सबूत जो तुमने बीस साल से छुपाया। मेरी माँ की लिखाई में। तुम्हारे नाम के साथ।"
भैरव ने पर्ची को देखा, पर हाथ नहीं बढ़ाया। वो पीछे हटा, और उसकी एड़ी फिर मिट्टी में धँसी। उसका चेहरा अब सफ़ेद नहीं था — पीला पड़ गया था।
"तो अब क्या?" उसने कहा। उसकी आवाज़ में वो चीनी नहीं बची थी। "तू मुझे पकड़वाएगी? पुलिस को बुलाएगी? रणवीर, तू जानता है मेरे पास क्या है। मेरे पास तेरे हर पहलवान का रिकॉर्ड है — किसने कब पानी पिया, किसने कब हार मानी। अगर मैं गया, तो तेरा नाम भी जाएगा। तेरे अखाड़े का नाम भी।"
"मेरा नाम?" रणवीर सिंह ने कहा। और फिर वो हँसे — धीमी, भारी हँसी, जैसे किसी पुराने ज़ख़्म से हवा निकल रही हो। "भैरव, मेरा नाम तूने बीस साल पहले ही मार दिया था। अब जो बचा है, वो सिर्फ़ मेरी बेटी का पिता है। और वो नाम तू नहीं छीन सकता।"
भैरव ने एक गहरी साँस ली। फिर वो हरनाम की तरफ़ मुड़ा, जो अभी तक मिट्टी से फ़ाइलें उठाने में लगा था, और उसके कान के पास कुछ फुसफुसाया।
हरनाम का चेहरा बदला। उसने फ़ाइलें अपनी छाती से लगाईं, जैसे कोई अपनी जान बचा रहा हो।
भैरव फिर हमारी तरफ़ मुड़ा। उसने छड़ को मिट्टी में घसीटते हुए रखा — धीरे, जैसे कोई तलवार म्यान में डाल रहा हो।
"अच्छा, रणवीर," उसने कहा। "आज तेरा दिन है। आज तू जीत गया।" उसके होंठ हिले, पर वो मुस्कान नहीं थी। "पर याद रख — खेल अभी खत्म नहीं हुआ।"
वो पलटा और सीढ़ियों की तरफ़ बढ़ा। उसके कदम भारी थे, पर रुके नहीं। कालू काका ने मेरी बाँह पकड़ ली।
"जाने मत दे," उन्होंने फुसफुसाया।
"जाने दो," रणवीर सिंह ने कहा। उनकी आवाज़ थकी थी, पर साफ़। "आज नहीं। आज हमने उसका मुखौटा उतार दिया। बाक़ी सब कल।"
भैरव सीढ़ी की पहली सीढ़ी पर रुका। वो पलटा। उसकी आँखें मेरे ऊपर आईं।
"वीर सिंह," उसने कहा। "तेरे पापा ने भी मुझे ऐसे ही देखा था — आख़िरी बार। तू भी वही देख रहा है। पर तू उनसे अलग है, है ना? तेरे पास वो नाक है।" वो हँसा। "वो नाक तुझे बर्बाद करेगी। जिस दिन तू उस पर भरोसा करके गलत आदमी की गंध पकड़ेगा, उस दिन कोई तेरे पीछे खड़ा होगा — और तू सिर्फ़ सामने देख रहा होगा।"
उसने हरनाम की तरफ़ हाथ बढ़ाया और उससे एक फ़ाइल ली।
"ये फ़ाइल आज रात जलानी है," उसने कहा। "सारे काग़ज़। सारी बोतलें। कुछ नहीं बचेगा।" उसने फ़ाइल को हवा में हिलाया। "क्योंकि जो काग़ज़ जल जाता है, उसे कोई अदालत नहीं पढ़ सकती। और जो गवाह डर जाता है, उसे कोई पंचायत नहीं बुला सकती।"
वो सीढ़ियों पर चढ़ने लगा। दो सीढ़ियाँ, तीन। फिर रुका, और बिना पलटे बोला —
"तीन दिन बाद मैदान में। तब तक जो होगा, वो तेरे हिसाब से होगा, वीर सिंह। पर एक बात याद रख — मैं तुझे कुश्ती में नहीं हराऊँगा। मैं तुझे तेरे ही लोगों के सामने हराऊँगा।"
उसकी आवाज़ सीढ़ियों पर फैल गई, और फिर सिर्फ़ उसके कदमों की आवाज़ बची। दरवाज़ा बंद हुआ। चिटकनी चढ़ी।
हम चारों वहीं खड़े रहे। मिट्टी में गिरी फ़ाइलों की गंध, जलती लालटेन की गंध, और रणवीर सिंह की साँसें।
मैंने पहले कालू काका की तरफ़ देखा। उनकी आँखों में पानी था। उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा और धीरे से कहा, "बेटा, आज मैंने बीस साल बाद सीधी साँस ली है।"
फिर मीरा ने अपने पिता के आगे घुटने टेके। उसने अपना सिर उनकी गोद में रख दिया, और रणवीर सिंह ने अपना हाथ उसके बालों पर रखा। कोई कुछ नहीं बोला। मिट्टी में घुटने टेके बैठी मीरा की साँसें सुनाई दे रही थीं, और उनके ऊपर उस बूढ़े पहलवान का हाथ था जो पैरों से मजबूर था, पर आज पहली बार अपनी बेटी के सामने सीना तानकर बैठा था।
मैंने उनकी तरफ़ देखा और मेरे अंदर कुछ ऐसा हिला जो मैं समझ नहीं पाया। ये आदमी बीस साल कुर्सी पर रहा, और आज उसने मेरे लिए अपना सबसे बड़ा ज़ख़्म सबके सामने खोल दिया।
"बेटा," रणवीर सिंह ने मेरी तरफ़ देखकर कहा। उनकी आवाज़ अब धीमी थी। "आज तूने कालू को बचाया। उसके आगे खड़ा हो गया। तू जानता है ये क्या होता है?"
"नहीं," मैंने कहा।
"ये वो होता है जो अखाड़ा सिखाता है, पर किताबें नहीं सिखाती।" उन्होंने अपनी कुर्सी की तरफ़ इशारा किया। "ये कुर्सी मुझे इसलिए मिली कि बीस साल पहले किसी ने मेरे आगे खड़ा होकर मुझे नहीं बचाया। तूने आज वो किया जो मेरे लिए किसी ने नहीं किया।"
उन्होंने अपना हाथ बढ़ाया। मैंने उसे पकड़ा। उनकी पकड़ मज़बूत थी — एक पहलवान की पकड़, जिसके पैर नहीं हैं पर हाथ अभी भी पत्थर हैं।
"अब सुन," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ फिर गरजी। "भैरव ने कहा कि वो फ़ाइल जलाएगा। वो जला देगा। मैं उसे जानता हूँ। वो आज रात कुछ न कुछ ज़रूर करेगा।"
"तो हमें क्या करना चाहिए?" मीरा ने पूछा। उसने अपना सिर उठाया। उसकी आँखें लाल थीं, पर उसकी आवाज़ में वो ज़िद लौट आई थी जो मैंने पहली बार नहर के मोड़ पर सुनी थी।
"हमें वो फ़ाइल चाहिए," रणवीर सिंह ने कहा। "जलने से पहले।"
कालू काका ने अपनी दाढ़ी सहलाई। "वो फ़ाइल उसके कमरे में है। लोहे की अलमारी में। चाबी उसकी कमर पर।"
"तो चाबी चाहिए," मैंने कहा।
"चाबी नहीं," रणवीर सिंह ने कहा। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, और उनकी आँखों में कुछ ऐसा चमका जो बीस साल से बंद था। "अलमारी चाहिए। पूरी अलमारी। क्योंकि जो काग़ज़ जल जाता है, वो जाता है। पर जो अलमारी पंचायत के सामने खुलती है — वो बीस साल का सच एक साथ बाहर फेंकती है।"
तभी मुझे कुछ याद आया। "रुकिए," मैंने कहा। "उसने हरनाम से कहा कि फ़ाइल आज रात जलानी है। पर उसने ये नहीं कहा कि कहाँ जलानी है।"
कालू काका की आँखें बड़ी हुईं। "तहखाने के बाहर, अखाड़े के पीछे, एक पुराना चूल्हा है। उस पर रोज़ नहीं, पर जब कुछ जलाना होता है, तो वहीं जलाते हैं। मैंने बीस साल में कई बार उस चूल्हे से जलती हुई चीज़ों की गंध पकड़ी है।"
"तो आज रात," रणवीर सिंह ने कहा, "वो वहीं जलाएगा।"
मीरा उठ खड़ी हुई। उसने अपने कपड़ों से मिट्टी झाड़ी। "तो हमें वहाँ होना है। फ़ाइल जलने से पहले।"
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