Spirit of a Fighter – Chapter 484
"तो चल," मैंने कहा, "पहले तेरा आँगन बनाएँ। फिर मेरे मामा का हिसाब।"
टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा। और उसकी आँखों में वो चमक अब पूरी जल रही थी।
"चल," उसने कहा।
मैंने पीछे मुड़कर सुक्खी बुआ की तरफ़ देखा।
वो पहले से भीड़ को हाँक रही थीं — "अरे तुम, उधर नहीं, इधर लाओ! और तुम, चूना कहाँ है? चूना! दीवार के लिए!" — और उनकी आवाज़ में वो पुरानी चुगलखोर बुआ नहीं थी। कुछ और थी। कुछ जो मैंने पहले कभी उनमें नहीं देखा था।
एक औरत के हाथ में मैदा की थैली देखकर उन्होंने कहा, "अरे तू तो बसंता की बहू है ना? तेरे ससुर ने कहा था कि टिंकू की मिठाई उसके बेटे को बहुत पसंद थी।" — और उस औरत की आँखें भर आईं, पर उसने थैली नीचे नहीं रखी। उसने उसे टिंकू की तरफ़ बढ़ा दिया।
और मैंने सुक्खी बुआ को नए सिरे से देखा।
मैंने अपनी माँ की तरफ़ देखा। वो भीड़ के बीच में चली गई थीं। वो एक औरत के हाथ से बर्तन ले रही थीं, दूसरी से लकड़ी, और उनके हाथ में वो पुरानी चक्की की तरह ही हरकत थी — धीरे, मज़बूत, बिना रुके।
तभी मेरे कानों में एक आवाज़ आई। धीमी। मेरे बहुत पास।
"वीर बेटा।"
मैं पलटा।
मेरे मामा खड़े थे। उन्होंने अपनी जूतियों पर से धूल झाड़ी थी। उनके हाथ में एक पुराना पीला लिफ़ाफ़ा था।
"तू मुझसे बात करने को तैयार नहीं," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में वो मिठास अब नहीं थी। कुछ और था। थकान। "पर ये तेरे पापा ने लिखा था। आख़िरी रात। मुझे दिया था। मैंने बीस साल से नहीं खोला।"
उन्होंने लिफ़ाफ़ा आगे बढ़ाया।
"आज तू इसे खोल," उन्होंने कहा। "मैं नहीं खोलूँगा। क्योंकि जो इसमें लिखा है, वो मैं सुन नहीं सकता। पर तू सुन सकता है।"
मैंने लिफ़ाफ़ा लिया।
उसे खोला।
उसमें एक काग़ज़ था। पीला। पुराना। मुड़ा हुआ। और उस पर रघुवीर की लिखाई —
"मेरे बेटे वीर के नाम।"
मैंने काग़ज़ खोला।
और मैंने पढ़ा।
उस सुबह की रोशनी में, टिंकू की जली दुकान के सामने, सुक्खी बुआ की आवाज़ और गाँव के लोगों की चहल-पहल के बीच, मैंने अपने पापा की आख़िरी लिखी बात पढ़ी।
और मैंने पढ़ते-पढ़ते अपना हाथ अपने मुँह पर रख लिया।
क्योंकि उसमें सिर्फ़ दो लाइनें थीं।
"वीर, अगर तू ये पढ़ रहा है तो मैं नहीं हूँ। और अगर तू मेरे भाई से ये ले रहा है, तो पहले उसकी आँखों में देख। अगर उसकी आँखों में पानी है, तो उसे माफ़ कर देना — उसने मुझे बचाने की कोशिश की थी। और अगर उसकी आँखों में पानी नहीं है, तो उससे दूर रहना — वो मेरा भाई नहीं है।"
मैंने सिर उठाया।
और मैंने अपने मामा की आँखों में देखा।
उनकी आँखों में पानी था।
धीरे-धीरे बहता हुआ। बिना आवाज़। जैसे बीस साल से बंद कुआँ अचानक फूट पड़ा हो।
"मैंने कोशिश की थी, वीर," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ टूट रही थी। "मैंने तेरे पापा का हाथ पकड़ा था, उस रात। मैंने कहा था — भैया, ये पानी मत पी। पर उसने मेरी बात नहीं मानी। उसने कहा — मेरे बेटे को अखाड़े में जगह चाहिए। मैंने कहा — भैया, ज़हर से जगह नहीं मिलती। वो नहीं माना।"
वो रुके। उन्होंने अपना चश्मा उतारा और उसे अपनी कमीज़ से पोंछा।
"और जब वो गिरा," उन्होंने कहा, "मैं वहाँ से भाग गया। भाग गया, वीर। अपने भाई को मरता छोड़कर। और बीस साल तक मैंने खुद से यही कहा कि मैंने कुछ नहीं किया, मैं वहाँ था ही नहीं। पर मैं था। मैं था।"
उन्होंने अपना चश्मा वापस पहना।
"आज तू जो कहेगा, मैं वो करूँगा," उन्होंने कहा। "तू कहे तो मैं पंचायत के सामने खड़ा हो जाऊँगा। तू कहे तो पुलिस के सामने। तू कहे तो खुद अपनी ज़ुबान से सब बोल दूँगा।"
मैंने काग़ज़ को अपनी जेब में रखा।
फिर मैंने अपनी माँ की तरफ़ देखा।
वो भीड़ के बीच खड़ी थीं। उनके हाथ में लकड़ी का एक टुकड़ा था। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। और उन्होंने सिर हिलाया। एक बार। धीरे से।
जैसे कह रही हों — तू जानता है क्या करना है।
मैंने अपने मामा की तरफ़ देखा।
"मामा," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ शांत थी। "आज तुम पंचायत में खड़े होगे। तुम्हारी ज़ुबान से सब बोलोगे। पर उससे पहले —"
मैंने अपनी जेब से वो काजू की बर्फी निकाली। मैंने उसे अपनी हथेली पर रखा।
"ये बर्फी तुमने बनाई थी?"
मेरे मामा ने बर्फी को देखा।
और उनका चेहरा बदल गया।
"नहीं," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में पहली बार डर आया। "ये मैंने नहीं बनाई। ये मैंने कभी नहीं देखी।"
मैंने उसे अपनी नाक के पास लाया।
"इसमें तुम्हारा अत्तर है, मामा," मैंने कहा। "तुम्हारा सिगार। तुम्हारी गंध।"
"वीर," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ फिसल रही थी, "मैं कसम खाता हूँ —"
"मैं कसम नहीं चाहता," मैंने कहा। "मैं सच चाहता हूँ।"
मैंने उनकी आँखों में देखा।
"और मुझे लगता है," मैंने धीरे से कहा, "कि तुम्हारे अंदर भी एक कुआँ है, मामा। जिसमें बीस साल का सच बंद है। आज उसे खोलना पड़ेगा।"
मेरे मामा ने अपनी आँखें बंद कर लीं।
और मेरे पीछे, टिंकू ने अपनी मुट्ठी में वो बर्फी कस ली — और उसकी आँखों में वो आग अब पूरी जल रही थी।
मैंने पीछे मुड़कर देखा।
टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा।
"भाई," उसने कहा, "मैं तैयार हूँ।"
मैंने सिर हिलाया।
"तो चल," मैंने कहा। "आज टिंकू की दुकान बनेगी। और आज ही किसी का सच बनेगा।"
॥
मैंने बर्फी को अपनी हथेली पर रखा और आँखें बंद कर लीं।
हवा में एक गंध थी। महँगा अत्तर। सिगार। पर उसके नीचे, बहुत गहरे, कुछ और था। मीठा। भारी। जैसे घी बहुत ज़्यादा पड़ गया हो और जल गया हो।
मेरी आँखें खुल गईं।
"ये गंध," मैंने धीरे से कहा, "मैंने पहले भी सूँघी है।"
टिंकू मेरे पास आया। उसके हाथ में अभी भी वो बर्फी का टुकड़ा था जो राख में मिला था। उसकी आँखें लाल थीं।
"कहाँ, भाई?" उसने पूछा।
"भैरव की अलमारी के पास।" मैंने बर्फी को करीब लाकर सूँघा। "तहखाने की सीढ़ियों के ऊपर, वो कमरा जहाँ उसकी अलमारी है। वहाँ से जब मैं गुज़रा था, तब यही गंध आई थी। मुझे लगा था कि कोई मिठाई रखी है। पर अब समझ आ रहा है — ये मिठाई नहीं थी। ये कोई और था।"
टिंकू की मुट्ठी कस गई।
"मतलब जिसने दुकान जलाई," उसने कहा, और उसकी आवाज़ काँप रही थी, "वो भैरव के कमरे से आया था।"
"या वो भैरव की अलमारी से कुछ लेने आया था," मैंने कहा। "और जाते वक़्त उसने ये बर्फी गिराई।"
तभी पीछे से पैरों की आहट आई।
मीरा आ रही थी। उसके हाथ में उसका बैग था, बाल उलझे हुए, चेहरे पर धूल की परत। वो सीधी मेरे पास आई और मेरी हथेली से बर्फी ले ली।
"इसे मुझे दो," उसने कहा। उसकी आवाज़ में वो बात थी जो मैं अब पहचानने लगा था — जब वो किसी चीज़ को जाँचने लगती थी, तो उसकी पूरी दुनिया सिर्फ़ उस चीज़ में सिमट जाती थी।
उसने बर्फी को अपनी नाक के पास लाया। फिर उसने अपने बैग से एक छोटा-सा काँच का डिब्बा निकाला, बर्फी का एक टुकड़ा तोड़ा, और उसमें रख दिया।
"इसमें केसर है," उसने कहा। "बहुत महँगा केसर। और काजू। और —" उसने फिर सूँघा। "और कुछ और है।"
"क्या?" टिंकू ने पूछा, और उसकी आवाज़ में वो उम्मीद थी जो टूटी दुकान के सामने खड़े आदमी की आवाज़ में नहीं होनी चाहिए थी।
मीरा ने एक पल सोचा।
"मुझे यकीन नहीं है," उसने कहा। "पर ये केसर की गंध के नीचे कुछ है। ज़रा अलग। मैं इसे लैब ले जाऊँगी।"
"लैब नहीं," मैंने कहा।
वो मेरी तरफ़ पलटी।
"क्यों?"
"क्योंकि जिसने ये बनाई है," मैंने कहा, "वो हमारे बीच है। और अगर उसे पता चला कि हम जाँच कर रहे हैं, तो वो अपना निशान मिटा देगा। जैसे उसने काग़ज़ मिटाए। जैसे उसने हरनाम को मिटाया।"
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