Spirit of a Fighter – Chapter 479
"अच्छा है," मैंने कहा। "क्योंकि आज रात हमें उनकी ज़रूरत पड़ेगी।"
मैंने ऊपर देखा। सुरंग के मुँह से आसमान दिख रहा था। काला। बादलों से भरा। और उसी अंधेरे में एक लालटेन की रोशनी हिल रही थी।
लाल कपड़ा। टिंकू की माँ की लालटेन।
और वो लालटेन हमारी तरफ़ बढ़ रही थी। धीरे-धीरे। जैसे कोई जानता हो कि हम यहीं से निकलेंगे।
"भाई," टिंकू ने फुसफुसाया। "वो हमारी तरफ़ आ रही है।"
"हाँ," मैंने कहा। और मैंने अपनी मुट्ठी और कस ली। "तो हम भी उसकी तरफ़ चलते हैं।"
कालू काका ने लालटेन ऊँची की। उनकी आवाज़ में वो पुरानी मिट्टी वाली गंभीरता लौट आई थी।
"बेटा," उन्होंने कहा, "याद रखना। जो भी सामने आए, पहले उसकी गंध पहचानना। आँखें धोखा देती हैं। गंध नहीं।"
मैंने अपनी नाक से लंबी साँस खींची। पसीना। लालटेन। मिट्टी।
और उसके नीचे एक और गंध।
खीर।
टिंकू की खीर।
मेरा दिल एक पल के लिए रुका। फिर ज़ोर से धड़का।
क्योंकि खीर का मतलब था — टिंकू की माँ। और टिंकू की माँ का मतलब था — कोई उनके घर के अंदर गया था।
मैंने पलटकर टिंकू की तरफ़ देखा। उसका चेहरा देखकर लगा कि उसने भी वही सोचा।
"भाई," उसने कहा। उसकी आवाज़ बच्चे जैसी हो गई थी। "मेरी माँ…"
"चल," मैंने कहा। और मैंने सीढ़ियाँ दो-दो करके चढ़नी शुरू कर दीं। "अब बातें नहीं। अब सिर्फ़ दौड़।"
हवा तेज़ हो गई। लालटेन की रोशनी पास आ गई। और उस रोशनी में मुझे एक साया दिखा। छोटा। दुबला। हाथ में लालटेन लिए खड़ा।
माँ।
नहीं। ये मेरी माँ नहीं थी।
ये टिंकू की माँ थी।
और वो अपने होंठों पर उँगली रखे खड़ी थीं। चुप रहने का इशारा कर रही थीं।
मेरे पैर अपने आप रुक गए।
उनकी आँखों में डर था। बहुत डर। और उनका हाथ काँप रहा था। पर उन्होंने अपनी उँगली होंठों से नहीं हटाई।
और तभी, उनके पीछे, अंधेरे में, मुझे एक और साया दिखा।
लंबा। चौड़ा। हाथ में कुछ पकड़े हुए।
और उस साये की गंध — वो पसीना — अब मेरी नाक में साफ़ थी।
मैंने अपनी आँखें सिकोड़ीं। लालटेन की रोशनी में वो साया धीरे-धीरे सामने आया।
और मैं वहीं जम गया।
क्योंकि वो आदमी वो नहीं था जिसे मैंने सोचा था।
वो भैरव नहीं था।
वो माधव सिंह था।
और उसके हाथ में बंदूक नहीं थी। उसके हाथ में एक गिलास था। दूध का गिलास। और वो गिलास टिंकू की माँ की तरफ़ बढ़ा हुआ था।
"पी लो," माधव सिंह ने कहा। उनकी आवाज़ में वही पुरानी नरमी थी जो पंचायत में होती थी। "रात ठंडी है। दूध पी लो।"
टिंकू की माँ ने गिलास नहीं लिया। उनकी आँखें मेरी तरफ़ थीं।
और मैंने देखा कि गिलास के किनारे पर एक हल्की पीली परत थी।
मेरी नाक ने उसे पहचान लिया। वही जलन। वही पुरानी गंध। वही ज़हर।
और मेरे मुँह से अपने आप निकला —
"गिलास नीचे रखो, माधव जी। वरना आज तुम्हारी चेन भी तुम्हारे गले से उतर जाएगी।"
॥
गिलास माधव के हाथ में था, और उसका किनारा टिंकू की माँ के होंठों से एक बालिश्त दूर।
मैंने दो कदम में पहुँचकर गिलास उनके हाथ से छीन लिया। दूध ज़मीन पर छलक गया। उसकी गंध उठी — मीठी, गाढ़ी, और उसके नीचे वही पुरानी जलन। उस जलन को मैंने एक बार पहचान लिया था, फिर कभी नहीं भूला।
"तुम्हें क्या लगा, माधव जी?" मैंने गिलास उलटा पकड़कर उनके सामने रखा। "कि इस गाँव में सिर्फ़ भैरव ही ज़हर घोलना जानता है?"
माधव सिंह ने एक भी कदम पीछे नहीं हटाया। उनका चेहरा वैसा ही शांत रहा। पर उनकी गर्दन की नस ऊपर उभर आई थी। मैंने वो नस पहले भी देखी थी — पंचायत में, जब वो माइक पकड़ते थे।
"बेटा," उन्होंने कहा, "तू अभी भी वही समझ रहा है जो तुझे दिखाया गया।"
"मुझे कुछ नहीं दिखाया गया," मैंने कहा। "मैं सूंघता हूँ। और ये दूध पीला ज़हर है। वही जो भैरव की बोतलों में था।"
टिंकू की माँ ने तब तक अपनी उँगली होंठों से नहीं हटाई थी। पर अब उन्होंने हाथ नीचे किया और मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में वो डर अभी भी था, पर उसके ऊपर अब कुछ और था — जैसे किसी ने उन्हें बहुत देर से साँस लेने दी हो।
"वीर," उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ सूखी थी। "वो मुझे यहाँ से ले जाने आए थे। कह रहे थे टिंकू को बचाने का रास्ता बताएँगे।"
"कौन-सा रास्ता?" टिंकू ने कहा। वो अब मेरे पीछे से निकलकर सामने आ गया था। उसका चेहरा लाल था, और उसकी आवाज़ काँप रही थी। "माँ, तुमने मुझे कुछ नहीं बताया?"
"मैंने सोचा…" उनकी आवाज़ रुक गई।
"क्या सोचा?" मीरा ने कहा। वो भी सामने आ गई थी, और उसके हाथ में वो छोटी पीली शीशी थी जो उसने हमेशा जेब में रखी थी। "मैडम, आपने सोचा कि अकेले सामना कर लेंगी?"
टिंकू की माँ ने मीरा की तरफ़ देखा। फिर माधव की तरफ़।
और तभी, माधव सिंह के पीछे, अंधेरे में, एक और आवाज़ आई।
"माँ जी, बैठिए।"
हम सब पलटे। अंधेरे से एक आदमी निकला। पतला, तेज़ कदम, हाथ में एक छोटी टॉर्च। उसने टॉर्च माधव के चेहरे पर नहीं, अपने चेहरे पर की। जैसे हमें दिखाना चाहता हो कि वो कौन है।
मैंने उसे नहीं पहचाना। पर मेरी नाक ने उसे पहचान लिया।
"ये तो…" कालू काका ने धीरे से कहा। उनका हाथ लालटेन पर कस गया। "ये तो…"
"हाँ, काका," वो आदमी बोला। "मैं ही हूँ। रामदीन का बेटा। शंकर।"
मेरे पैर जम गए।
"रामदीन?" टिंकू ने कहा। "वही रामदीन जो कुएँ में बंद था?"
"वही," शंकर ने कहा। उसकी आवाज़ में न कोई गुस्सा था, न कोई शिकायत। बस एक थकान। "बीस साल से बाप कुएँ में, बेटा शहर में। मुझे कोई पूछने वाला नहीं था।"
"तो अब क्यों आया?" मैंने कहा।
शंकर ने टॉर्च बंद कर दी। अंधेरा फिर से फैल गया। पर कालू काका की लालटेन अभी जल रही थी, और उसी रोशनी में शंकर का चेहरा दिख रहा था।
"मैं भैरव का आदमी नहीं हूँ," उसने कहा। उसने माधव की तरफ़ इशारा किया। "और इनका भी नहीं। मैं बस एक बात कहने आया हूँ। एक ही बात। फिर जो तुम करना, करो।"
"कहो," मैंने कहा।
शंकर ने मेरे पीछे खड़ी सरस्वती की तरफ़ देखा।
मेरी माँ कालू काका के पीछे खड़ी थीं। उनके हाथ में पीतल का ढक्कन नहीं था अब — वो उन्होंने सुरंग में छोड़ दिया था। पर उनकी आँखें वैसी ही थीं। सीधी। स्थिर।
शंकर ने उन्हें देखकर अपनी आवाज़ थोड़ी नीची कर ली।
"भैरव के पास एक और राज़ है," उसने कहा। "और वो राज़ तहखाने की मिट्टी में नहीं है। वो तुम्हारी माँ की चक्की में छिपा है।"
मेरे अंदर कुछ ठंडा सा गिरा।
मैंने पलटकर माँ की तरफ़ देखा।
उनका चेहरा उतर गया था। एक पल में। जैसे किसी ने उनके चेहरे से सारा खून खींच लिया हो। उनके हाथ जो अभी स्थिर थे, अब हल्के से काँपने लगे।
"माँ?" टिंकू ने कहा। उसकी आवाज़ सच में बच्चे जैसी हो गई थी, जैसे वो चौबीस का नहीं, चार साल का हो। "माँ, तुमने कुछ और छुपाया है?"
माँ ने जवाब नहीं दिया।
उन्होंने बस अपना सिर घुमाया। धीरे से। और अपनी चक्की की तरफ़ देखा।
चक्की उनके घर के आँगन में थी। यहाँ से दिख नहीं रही थी। पर मैं जानता था कि वो कहाँ है। मैंने उस चक्की को सुबह चार बजे चलते हुए सुना था, हज़ारों बार। उसकी आवाज़ मेरे बचपन की नींद में घुली हुई थी।
और मुझे अब एहसास हुआ कि मैंने उस चक्की को कभी गौर से नहीं देखा।
माँ की आँखों में पानी आ गया।
वो रोई नहीं। वो कभी नहीं रोती थीं। पर उनकी आँखों के कोने भर आए, और उन्होंने अपना हाथ मुँह पर नहीं रखा, छुपाया नहीं। वो बस वहीं खड़ी रहीं, और उनका पानी उनकी आँखों में ही रुका रहा — जैसे बीस साल से एक बाँध बना हुआ था और वो नहीं टूटा, बस किनारे तक आ गया।
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