Spirit of a Fighter – Chapter 480
"अब वक़्त आ गया," उन्होंने धीरे से कहा। उनकी आवाज़ बहुत धीमी थी, जैसे कोई पुरानी दुआ पढ़ रहा हो। "जो बचा है, वो भी बोल दूँ।"
"माँ—" मैंने कहा।
"नहीं, वीर," उन्होंने मेरी तरफ़ देखे बिना कहा। "तू अभी चुप रह। जब बोलूँ, तब सुनना। और जो सुनना, उसे पचा लेना। क्योंकि ये बात मैंने बीस साल से किसी को नहीं बोली।"
मैं चुप हो गया।
शंकर ने तब अपनी स्कूटर स्टार्ट की। उसकी आवाज़ रात में गूँजी। उसने हेलमेट पहना और पलटकर एक आख़िरी बार हम सबको देखा।
"कल सुबह चक्की के नीचे देखना," उसने कहा। उसकी आवाज़ अब साफ़ थी, स्कूटर की आवाज़ के ऊपर भी। "और हाँ — उस चीज़ को मत छूना जो वहाँ मिलेगी। वरना तुम्हारी माँ वो सच नहीं बता पाएगी जो उसने बीस साल पाला है।"
"क्यों?" मीरा ने आगे बढ़कर कहा। "ऐसा क्या है उसमें?"
"क्योंकि," शंकर ने कहा, और उसकी आवाज़ में पहली बार कुछ भारी सा आया, "वो चीज़ छूने से अपनी गंध बदल देती है। और मेरे बाप ने मरने से पहले कहा था — जिस दिन वो गंध बदलेगी, उस दिन बीस साल का हिसाब उलटा हो जाएगा।"
उसने स्कूटर आगे बढ़ाई। पर फिर रुका। बिना पलटे, ऊपर आसमान की तरफ़ देखते हुए उसने एक आख़िरी बात कही।
"और हाँ, वीर सिंह। तेरे पापा रघुवीर ने बीस साल पहले मेरे बाप को अखाड़े से निकाला था। पर निकाला इसलिए था ताकि वो इस ज़हर के जाल से बाहर रहे। तेरे पापा ने उसे बचाया था, फेंका नहीं था। मैं ये बात इसलिए बता रहा हूँ क्योंकि मेरे बाप ने मरते वक़्त कहा था — एक दिन रघुवीर के बेटे को ये बताना।"
और स्कूटर अंधेरे में घुल गया।
हम सब कुछ देर वहीं खड़े रहे। कोई कुछ नहीं बोला।
माधव सिंह ने उस दौरान एक कदम पीछे हटने की कोशिश की। पर कालू काका ने अपनी लालटेन उनके चेहरे के सामने कर दी।
"तुम यहाँ से नहीं जाओगे," कालू काका ने कहा। उनकी आवाज़ में वो धीमापन नहीं था जो हमेशा होता था। अब उसमें कुछ सख़्त था। "तुमने इस औरत को ज़हर पिलाने की कोशिश की। तुम्हारी चेन आज नहीं, तो कल उतरेगी। पर तुम अभी यहीं रहोगे।"
माधव सिंह ने उनकी तरफ़ देखा। उनके चेहरे पर वो पुरानी शांति अब नहीं थी। अब वहाँ थकान थी। और उस थकान में कुछ ऐसा था जो मुझे अच्छा नहीं लगा। जैसे कोई खिलाड़ी हारकर भी मुस्कुरा रहा हो, क्योंकि उसने अपना आख़िरी दाँव अभी फेंका नहीं है।
"मैं जा रहा हूँ," माधव ने कहा। उसकी आवाज़ में गरज नहीं थी, बस एक ठंडा यकीन। "तुम मुझे नहीं रोक सकते। तुम्हारे पास कुछ नहीं है। एक गिलास दूध, जो ज़मीन पर गिरा है। और एक आदमी जो शहर से आकर कहानियाँ सुना गया।"
वो सही कह रहे थे। एक गिलास गिरा हुआ दूध, जो अब ज़मीन में सोख रहा था। और शंकर की बातें, जिनके पीछे कोई काग़ज़ नहीं था।
"ये रहा," मीरा ने कहा।
सब उसकी तरफ़ देखने लगे। उसने अपना बैग खोला और उसमें से एक छोटी थैली निकाली।
"मैं नहर किनारे आने से पहले घर गई थी," उसने कहा। "टिंकू की माँ के पास। क्योंकि मुझे शक था कि गाँव में कोई और भी ज़हर घोल रहा है। और मुझे उनके आँगन में ये मिला।"
उसने थैली खोली। उसमें एक छोटा सा कटोरा था, और कटोरे में सूखा हुआ पीला पाउडर।
"ये वही है," मीरा ने कहा। "जो भैरव की बोतलों में था। पर ये भैरव का नहीं है। ये किसी और के हाथ का बना है। मैंने इसे जाँचा है। इसमें एक चीज़ ऐसी है जो भैरव के पास नहीं थी।"
"क्या?" मैंने कहा।
मीरा ने कटोरा माधव की तरफ़ बढ़ाया।
"सोने का बुरादा," उसने कहा। "बहुत महीन। इतना महीन कि छानने पर भी नहीं दिखता। पर अगर आँख को रोशनी में रखो, तो चमकता है। और ये बुरादा सिर्फ़ उसी आदमी के पास होता है जिसके पास सोना रखने की जगह हो।"
माधव सिंह ने कटोरे की तरफ़ देखा।
और पहली बार, उनका चेहरा बदला।
उनका हाथ अपने गले की तरफ़ गया। चेन की तरफ़। और फिर रुक गया। जैसे उन्हें एहसास हो गया कि अगर वो चेन छुएँगे, तो सब समझ जाएँगे।
"तुम्हारी चेन," मीरा ने कहा। "वो असली सोने की है न? जो तुमने शेर सिंह की मौत वाली रात भैरव को दी थी? क्या तुमने उसी चेन का बुरादा इस पाउडर में मिलाया?"
माधव सिंह ने मीरा की तरफ़ देखा। उनकी आँखों में कुछ ऐसा था जो मैंने पहले किसी में नहीं देखा था। गुस्सा नहीं। घबराहट नहीं। बस एक पल का ठहराव। जैसे कोई बहुत पुरानी तस्वीर अचानक सामने आ गई हो।
"तुम्हारी नानी को भी यही आदत थी," उन्होंने धीरे से कहा। "सब कुछ पहले पकड़ लेना।"
मीरा एक पल के लिए रुकी।
"मेरी नानी?" उसने कहा।
"हाँ," माधव ने कहा। "वो भी रघुवीर की तरह थी। सच की भूखी।"
और फिर उन्होंने अपना हाथ जेब में डाला।
"रुको," मैंने कहा।
"डरो मत," माधव ने कहा। "मैं कोई बंदूक नहीं निकाल रहा।"
उन्होंने एक चिट्ठी निकाली। पुरानी। मुड़ी हुई। किनारों से टूटी हुई।
"ये तुम्हारे पापा की लिखाई है," उन्होंने कहा। "रघुवीर की। बीस साल पुरानी। मैं इसे आज तक रखे था। सोचा था कभी काम आएगी।"
उन्होंने चिट्ठी मेरी तरफ़ बढ़ाई।
"ले," उन्होंने कहा। "ये तेरी चक्की वाले राज़ की चाबी है। और हाँ — तेरी माँ को मत बताना कि मैंने दी है। वो खुद बताएगी, जब वक़्त आएगा।"
मैंने चिट्ठी नहीं ली।
"तुम अब भी चालें चल रहे हो," मैंने कहा। "पहले दूध में ज़हर, अब चिट्ठी में।"
"नहीं," माधव ने कहा। और उसकी आवाज़ में पहली बार कुछ थका हुआ सच था। "चालें मेरी खत्म हो गईं। जिस दिन भैरव ने भीड़ के सामने मुझे बाप कहकर पुकारा, उस दिन मेरी सारी चालें खत्म हो गईं। अब मैं सिर्फ़ एक बात चाहता हूँ — कि ये गाँव जान ले कि असली ज़हर मैंने नहीं बनाया। मैंने बस उसे बढ़ने दिया।"
उन्होंने चिट्ठी मेरे हाथ में रख दी। फिर पलटे और चलने लगे।
"तुम्हें रोकूँगा नहीं," कालू काका ने कहा, "पर कल सुबह पंचायत में तुम्हें आना होगा। वरना जो चिट्ठी में लिखा है, वो सबके सामने पढ़ा जाएगा।"
माधव सिंह रुके। उन्होंने बिना पलटे कहा, "आऊँगा। बीस साल से एक ही दिन का इंतज़ार था।"
और वो अंधेरे में चले गए।
टिंकू की माँ अभी भी वहीं खड़ी थीं। काँप रही थीं। टिंकू ने उनका हाथ पकड़ा और उन्हें अपने साथ बैठा लिया। उन्होंने अपना सिर उसके कंधे पर रख दिया।
माँ अभी भी अपनी चक्की की तरफ़ देख रही थीं।
मैं उनके पास गया।
"माँ," मैंने कहा।
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में पानी अभी भी था, पर वो बहा नहीं था।
"वीर," उन्होंने कहा। "मैं जानती हूँ तू क्या पूछेगा। और मैं जानती हूँ कि मैं अभी जवाब नहीं दे सकती।"
"क्यों नहीं?"
"क्योंकि जवाब चक्की के नीचे है," उन्होंने कहा। "और मैं चाहती हूँ कि तू उसे अपनी आँखों से देखे, मेरी ज़ुबान से न सुने। अगर मैं बोलूँगी, तो तू मुझ पर शक करेगा। पर जब तू खुद देखेगा, तो सच तेरे अंदर उतरेगा — और तब तू किसी पर शक नहीं करेगा।"
"माँ, ये बीस साल से तुम्हारे अंदर था," मैंने कहा। "तुम अकेली इसे क्यों ढोती रहीं?"
उन्होंने मेरे सिर पर हाथ रखा। उनका हाथ ठंडा था। और उसमें आटे की गंध थी — वो गंध जो मेरे पूरे बचपन में उनके हाथों से आती थी।
"क्योंकि बेटा," उन्होंने कहा, "जिस हाथ से चक्की चलती है, उसी हाथ से गुनाह भी छुपाया जाता है। और मैंने ये गुनाह अकेले नहीं किया।"
रात वहीं खत्म हुई। हम सब वापस गाँव की तरफ़ चले। टिंकू अपनी माँ को सहारा देकर ले गया। कालू काका ने लालटेन साथ रखी। मीरा मेरे पास चली।
"वो चिट्ठी खोलोगे?" उसने पूछा।
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