Spirit of a Fighter – Chapter 46
"ठीक है," उसने कहा। "फिर तू भी उन्हीं में गिना जाएगा जो इस मिट्टी में दबे हैं।"
उसने अपनी धोती से एक चाकू निकाला। मीरा ने मेरी बाँह कसकर पकड़ ली।
मैंने अपनी साँस रोकी। मेरी नाक में जलती मिट्टी की गंध, कालू काका की चेतावनी, और मीरा के हाथ की गरमी — सब एक साथ आ गए।
और तभी मैंने फैसला किया।
मैंने लालटेन उठाया, काँच का कवर खोला, और उसकी लौ को सीधा तहखाने की लाल मिट्टी पर गिरा दिया।
मिट्टी ने आग पकड़ ली।
नहीं — मिट्टी नहीं जल रही थी। मिट्टी से धुआँ उठा। घना, सफ़ेद, और उसमें एक गंध थी — जैसे सदियों की नींद टूट रही हो।
भैरव चौंका। उसने पलटकर देखा। और उस पल का फ़ायदा उठाकर हरनाम ने उसके हाथ से चाकू छीन लिया। चाकू दूर जा गिरा।
"कौन है वहाँ?" भैरव गरजा।
मैं आगे आया। मेरे हाथ में लालटेन थी, और मेरे पीछे मीरा।
"मैं हूँ," मैंने कहा। "वीर सिंह।"
भैरव का चेहरा बदला। पहले तो उसने मुझे देखा — फिर मेरे पीछे मीरा को। और उसकी आँखों में कुछ और आया। सिर्फ़ गुस्सा नहीं। कुछ ऐसा जो बहुत पुराना था।
"तू," उसने मीरा से कहा। "तू यहाँ? अपने पापा की बेटी होकर?"
"मेरे पापा की बेटी हूँ," मीरा ने कहा। उसकी आवाज़ साफ़ थी। "इसलिए यहाँ हूँ।"
भैरव ने हरनाम की तरफ़ देखा। "तूने इन्हें बुलाया?"
"मैंने नहीं—"
"चुप," भैरव ने कहा। फिर मेरी तरफ़ देखा। "तू जानता है ये मिट्टी क्या है, बेटा?"
"जानता हूँ," मैंने कहा।
"तो फिर तू यहाँ क्यों आया? ये मिट्टी उनके लिए है जो इसकी कदर करते हैं। तू अभी एक मज़दूर है। तेरे हाथ में सिर्फ़ चक्की की गरमी है।"
"मेरे हाथ में जो है," मैंने कहा, "वो तेरी अलमारी के काग़ज़ों से ज़्यादा कीमती है।"
भैरव ने अपनी छड़ उठाई। मैंने कालू काका की बात याद की — "सामने से आने वाला बहादुर होता है, पर पीछे से आने वाला जीतता है।" मैंने लालटेन नीचे रखी और अपनी धोती का पल्ला कमर में खोंसा।
"भैरव सिंह," मैंने कहा, "तूने बीस साल में जो किया है, वो आज खत्म होता है। या तो तू मेरे सामने सच बोल, या फिर इस मिट्टी में खड़ा होकर लड़।"
भैरव हँसा। पर उस हँसी में अब पहले वाली बात नहीं थी।
"तू अभी भी बच्चा है," उसने कहा। "इस मिट्टी ने बीस साल में जिन्हें निगल लिया, वो तेरे सामने खड़े हैं। रघुवीर, जगदीश, ग्यारह पहलवान — सब इसी मिट्टी में दबे हैं। और तू सोचता है तू बच जाएगा?"
तभी मीरा आगे आई। उसने अपनी बोतल भैरव की तरफ़ बढ़ाई।
"ये तेरी बोतल है," उसने कहा। "इसका पानी मैंने लैब भेजा था। रिपोर्ट आई है। इसमें एक ऐसा तत्व है जो ताकत तो देता है, पर शरीर के अंदर की उम्र खा जाता है। जो इसे पीता है वो ठीक नहीं हो सकता। बस रुक सकता है।" उसने बोतल को ऊपर उठाया। "ये पानी है, भैरव सिंह। ज़हर नहीं। ज़हर तो तू है।"
भैरव की छड़ हवा में रुक गई।
उसने मीरा को देखा। बहुत देर। और मुझे लगा कि उसकी आँखों में कुछ टूटा। पर फिर वो कठोर हो गईं।
"तेरे पापा को भी यही पानी पिलाया था," भैरव ने धीरे से कहा। "वो भी अब तक व्हीलचेयर पर बैठे हैं। और तू यहाँ खड़ी है, मेरे सामने, मेरी बेटी की तरह।"
"मैं तेरी बेटी नहीं हूँ," मीरा ने कहा। "मैं रणवीर सिंह की बेटी हूँ।"
भैरव का हाथ काँपा। उसने छड़ उठाई, पर तभी उसके पीछे से एक आवाज़ आई।
"बस, भैरव।"
हम सब पलटे।
तहखाने की सीढ़ियों के मुँह पर, एक पुरानी लालटेन की रोशनी में, व्हीलचेयर पर बैठे रणवीर सिंह थे। उनके पीछे टिंकू खड़ा था, हाथ में एक मोटी लाठी। और उनके पीछे — माँ। सरस्वती। सफ़ेद साड़ी में, माथे पर हल्दी का टीका, आँखों में वो चमक जो मैंने पहले कभी इतनी तेज़ नहीं देखी थी।
"पापा!" मीरा की आवाज़ निकल गई।
रणवीर सिंह ने अपना हाथ उठाया। उनकी आवाज़ धीमी थी, पर तहखाने की हर दीवार उसे गूँजा रही थी।
"बीस साल," उन्होंने कहा। "बीस साल मैं इस कुर्सी पर बैठा रहा। बीस साल मैंने तेरे किए को देखा और चुप रहा। क्योंकि मेरे पास सबूत नहीं था।" उन्होंने अपनी कुर्सी आगे बढ़ाई। "पर आज मेरे पास सबूत है। गवाह है। और मेरी बेटी है।"
भैरव ने छड़ नीचे की। उसका चेहरा अब पहले जैसा नहीं था। कुछ और था — शायद डर।
"रणवीर," उसने कहा, "तू यहाँ कैसे—"
"तेरी अलमारी की चाबी," रणवीर सिंह ने कहा। "जो तूने मुझे दिखाई थी, वो मेरी जेब में है। मैंने बीस साल पहले तेरी अलमारी खोलने की कसम खाई थी। आज खोली।"
भैरव पीछे हटा। उसकी एड़ी आग के पास की लाल मिट्टी से टकराई। मिट्टी से धुआँ उठा।
"तू," भैरव ने मेरी तरफ़ देखा, "तूने ये सब किया।"
"मैंने नहीं," मैंने कहा। "मिट्टी ने किया। तूने बीस साल इस मिट्टी में ज़हर घोला। आज मिट्टी ने अपना हिसाब लिया।"
भैरव ने एक कदम और पीछे बढ़ाया। उसकी छड़ हाथ से छूटकर मिट्टी में गिरी। और तभी—
"अब बस," एक आवाज़ आई।
सब पलटे।
सुरंग के मुँह पर कालू काका खड़े थे। उनके हाथ में लोहे की एक पुरानी तिजोरी थी — छोटी, जंग लगी। उन्होंने उसे नीचे रखा।
"ये तिजोरी," उन्होंने कहा, "मैंने बीस साल पहले इसी तहखाने से उठाई थी। उस रात, जब भैरव यहाँ से गया, मैंने इसे छुपा दिया था। इसमें रघुवीर की लिखी पर्चियाँ हैं, हरनाम के काग़ज़ हैं, और"— उन्होंने मेरी तरफ़ देखा — "वो चीज़ भी है जो बीस साल से सबको डरा रही थी।"
कालू काका ने तिजोरी की तरफ़ देखा, फिर भैरव की तरफ़। उनके होंठ काँप रहे थे, पर आवाज़ साफ़ थी।
"भैरव, तू जानता है इसमें क्या है। तू बीस साल से इसी को ढूँढ रहा था।" उन्होंने तिजोरी पर हाथ रखा। "पर आज ये मेरे पास है, तेरे पास नहीं।"
भैरव ने एक कदम आगे बढ़ाया। उसकी आँखें तिजोरी पर टिकी थीं, जैसे भूखा रोटी पर।
"कालू," उसने धीरे से कहा, "तू मेरा आदमी था।"
"नहीं था," कालू काका ने कहा। इतनी आवाज़ में जो मैंने उनमें पहले कभी नहीं सुनी। "मैं रघुवीर का आदमी था। तेरा तो सिर्फ़ डर था।"
रणवीर सिंह ने अपनी कुर्सी आगे की। "कालू, तिजोरी खोलो।"
कालू काका ने कमर से एक छोटी चाबी निकाली। उनके हाथ काँप रहे थे। चाबी सुराख में घुसी, पर घूमी नहीं। उन्होंने ज़ोर लगाया। माथे पर पसीना आ गया।
"कालू!" भैरव की आवाज़ तेज़ हुई। "देख, अभी भी वक़्त है। तिजोरी मुझे दे, और मैं सब भूल जाऊँगा। तेरा घर, तेरा काम, सब वैसा ही रहेगा।"
कालू काका ने उसकी तरफ़ नहीं देखा। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
"बेटा, आ जा। तू खोल।"
मैं उनके पास गया। मेरे हाथ भी काँप रहे थे। कालू काका ने मेरा हाथ पकड़ा और चाबी पर रखा।
"याद रख," वो फुसफुसाए, "मेरी बात मान — तहखाने की मिट्टी में ताकत है, पर उस ताकत को छूने से पहले अपना मन साफ़ करना। अंदर डर लेकर मत जाना।"
मैंने चाबी घुमाई। एक कड़ी आवाज़ आई, और तिजोरी खुल गई।
अंदर सबसे ऊपर एक पुरानी पीली पर्ची थी। उस पर रघुवीर की लिखाई — मैंने उनकी तस्वीर अखाड़े में देखी थी, और नीचे उनके हस्ताक्षर। पर्ची में लिखा था — "बीस साल बाद, जो इसे खोलेगा, वो जान जाएगा कि भैरव सिंह का सच क्या है। पानी उसका हथियार है, मिट्टी उसकी गुलाम। पर उसका सबसे बड़ा डर — मैं हूँ। क्योंकि मैंने उसे मरते वक़्त देखा था, और मैंने उसे बताया था कि मैं वापस आऊँगा।"
मैंने पर्ची पढ़कर सबको सुनाई। भैरव का चेहरा सफ़ेद पड़ गया।
"ये झूठ है," वो बोला। "रघुवीर मर गया था। मैंने उसे मरते देखा।"
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