Spirit of a Fighter – Chapter 452
हम दौड़े। मेरी टाँगों में ज़ोर नहीं था, पर मैं रुका नहीं। लुट्टन मेरे कंधे पर कराह रहा था, पर एक बार भी नहीं कहा कि मुझे उतार दे।
सुरंग का आख़िरी मोड़ आया।
और वहाँ वो दरवाज़ा था।
वही जला हुआ दरवाज़ा जो पिछली बार हमने खुला देखा था, जिसकी लकड़ी आधी जल चुकी थी और जिसके नीचे से नहर की हवा आ रही थी।
पर इस बार वो बंद था।
पीछे से आवाज़ आई — भैरव की।
"मैं जानता था," वो हँसा। "माधव कह रहे थे कि तुम सुरंग से भागोगे। मैंने कहा — रुको, मैं पहले उस दरवाज़े पर पत्थर लगा आऊँगा। बीस साल से मैं इस सुरंग की हर ईंट जानता हूँ, वीर। तू क्या जानता है?"
मैंने दरवाज़े पर हाथ मारा। कोई आवाज़ नहीं।
मीरा ने धक्का दिया। कुछ नहीं हुआ।
"वो पीछे से ज़ंजीर लगा गया है," लुट्टन ने कराहकर कहा। "मैंने उसे सुरंग के बाहर से आते देखा था, पर सोचा—"
"सोचा मत कर," मैंने कहा। मेरी आवाज़ में वो गुस्सा आ गया जो मैं छिपा रहा था। "अब क्या होगा?"
लुट्टन ने कुछ नहीं कहा।
और तभी माँ आगे बढ़ीं।
उनका हाथ — वही हाथ जिस पर कालू काका का खून लगा था — दरवाज़े की जली लकड़ी पर पड़ा। उन्होंने आँखें बंद कर लीं, जैसे कोई पुरानी बात याद कर रही हों।
"ये दरवाज़ा मेरे ससुर ने बनाया था," उन्होंने धीरे से कहा। "अखाड़े के बुज़ुर्गों के लिए। ताकि ज़रूरत पड़े तो कोई चुपचाप बाहर जा सके।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
"रघुवीर ने मुझे इसका तरीका बताया था," वो बोलीं। "एक रात, जब वो बीमार थे और मैं उनके पास बैठी थी। उन्होंने कहा था — सरस्वती, अगर मेरे बाद तुम कभी फँसो, तो उस दरवाज़े के नीचे एक पत्थर है। उसे दबाओ।"
उन्होंने झुककर नीचे देखा। उनकी उँगलियाँ ज़मीन पर फिरीं, मिट्टी हटाई, और फिर वो रुकीं।
"यहाँ है," वो बोलीं।
उन्होंने एक छोटा-सा पत्थर दबाया। कुछ देर के लिए कोई आवाज़ नहीं आई। मेरा दिल धड़कना बंद हो गया था। पीछे से भैरव की आवाज़ और पास आ रही थी।
और फिर — एक भारी आवाज़। ज़ंजीर चरचराई, और दरवाज़ा धीरे से खुलने लगा।
हवा मेरे चेहरे पर लगी। नहर की गीली मिट्टी की गंध आई। बाहर की रोशनी — पतली, पर असली।
मैंने माँ को देखा। उनके चेहरे पर पानी था, और मुझे पता नहीं था कि वो पसीना था या आँसू।
"पापा ने बचाया," मैंने धीरे से कहा। मेरी आवाज़ टूट रही थी। "आज भी।"
माँ ने मेरी तरफ़ देखा, और उन्होंने कुछ नहीं कहा। बस मेरा हाथ पकड़ा, और ज़ोर से पकड़ा।
हम बाहर निकले। लुट्टन मेरी गर्दन में बाहें डाले लटका था, उसकी टूटी टाँग मेरी कमर से रगड़ रही थी। मीरा माँ के दूसरी तरफ़ थी। हमने पीछे से दरवाज़ा धक्का दिया — वो बंद हो गया।
नहर किनारे का रास्ता सामने था। घास, गीली मिट्टी, दूर से पानी की आवाज़।
और फिर मैंने देखा।
पच्चीस आदमी। शायद तीस। हाथों में लाठियाँ, मुँह पर कपड़े। वो एक घेरे में खड़े थे — नहर के किनारे, घास पर, हमारे रास्ते के ठीक सामने।
और उनके बीच, आगे — भैरव सिंह।
वो मुस्कुरा रहा था।
धूप अभी पूरी नहीं चढ़ी थी। नहर के पानी पर सुनहरी रोशनी पड़ रही थी। और उस रोशनी में भैरव की तेल लगी मूँछें चमक रही थीं।
"मैं जानता था," उसने कहा। "मैं जानता था तुम इसी रास्ते से निकलोगे।"
उसने हाथ उठाया। पीछे के आदमियों ने लाठियाँ उठाईं।
मैंने माँ को अपने पीछे किया।
"चलो," मैंने धीरे से कहा। "आज मैदान यहीं है।"
भैरव हँसा।
"मैदान?" उसने कहा। "वीर, ये मैदान नहीं है। ये तेरी कब्र है।"
और तभी, पीछे से — दरवाज़े के उस पार से — एक आवाज़ आई। धीमी, पर साफ़।
"मोहन!"
भैरव की हँसी रुक गई।
वो पलटा।
और उसकी आँखों में पहली बार कुछ ऐसा आया जो मैंने कभी नहीं देखा था — डर।
क्योंकि उस आवाज़ में वो सब था जो उसने बीस साल में खो दिया था।
कालू काका। ज़िंदा।
दरवाज़े के पार से उनकी आवाज़ आई, फटी हुई, थकी हुई, पर गूँजती हुई।
"तेरे बाप ने तुझे खरीदा था," कालू काका बोले। "पर तेरी माँ ने तुझे जना था। और आज तेरी माँ का बेटा तेरे सामने खड़ा है, और तेरा बाप का खरीदा हुआ बेटा तेरी मिट्टी में गिरा पड़ा है। अब तू चुन — किसका बेटा है?"
भैरव के हाथ की लाठी धीरे से नीचे झुकी।
मैंने अपने बेटे की तरह साँस ली। मेरी छाती में हवा भरी।
और मैंने अपनी मुट्ठी भींची।
भैरव की लाठी नीचे झुकी, पर उसका हाथ नहीं ढीला हुआ। उँगलियाँ उस डंडे को ऐसे पकड़े हुए थीं जैसे कोई डूबता आदमी घास की जड़ पकड़ता है।
उसके पीछे खड़े आदमियों में हलचल मच गई। किसी ने कदम पीछे किया। किसी ने लाठी की पकड़ बदली। एक बूढ़ा आदमी, जिसका चेहरा कपड़े से ढका था, अपना कपड़ा नीचे खींचकर अपनी आँखें साफ़ कर रहा था — जैसे सुनकर भरोसा नहीं हो रहा।
"ये झूठ है," भैरव ने कहा। उसकी आवाज़ में वो दम नहीं था जो अभी था। "कालू मर चुका है। मैंने खुद देखा था।"
"तूने क्या देखा था?" माँ ने कहा।
उनका स्वर ऐसा था जैसे ठंडे पानी में पत्थर गिरा हो। भैरव की तरफ़ नहीं, उसके पीछे खड़े आदमियों की तरफ़ वो बोलीं।
"तूने खून देखा था। खून देखकर तूने मान लिया कि आदमी मर गया। पर कालू ने मरने से पहले अपना हाथ ऊपर उठाया था — और उस हाथ में उसकी उँगली थी। उसने मेरी तरफ़ इशारा किया था। मैंने उसे उठाया। मैंने उसे उसी दरवाज़े से बाहर निकाला, उसी दरवाज़े से जिसे तू आज बंद करके आया था।"
"बकवास," भैरव ने कहा। पर उसका गला सूखा था। शब्द फट रहे थे।
"बकवास नहीं," दरवाज़े के पार से कालू काका की आवाज़ आई। "आज बीस साल बाद मैं तेरे सामने खड़ा हूँ, मोहन। तू मुझे देख।"
दरवाज़े को कोई छू नहीं रहा था। वो बंद था, ज़ंजीर से। पर उसके पार से आवाज़ आ रही थी — दबी हुई, जैसे किसी कुएँ से।
भैरव ने एक कदम पीछे किया।
मैंने लुट्टन को अपने कंधे पर ऊपर उठाया। उसका पैर मेरी कमर पर मुड़ा हुआ था और उसकी साँस मेरे कान के पास गरम-गरम लग रही थी।
"वीर," उसने फुसफुसाया। "ये क्या हो रहा है?"
"मुझे भी नहीं पता," मैंने कहा। "पर सीधे खड़े रह।"
"मैं तो लेटा हूँ।"
"तो ऐसे लेटे रह जैसे खड़े हो।"
उसने मेरे कंधे पर हल्की हँसी छोड़ी। उस हँसी में दर्द था, पर वो हँसी थी। मुझे लगा कि सब ठीक होने का यही एक छोटा-सा इशारा है।
भैरव ने अपने आदमियों की तरफ़ पलटकर देखा। कुछ लोगों के हाथ ढीले हो रहे थे। जो लाठी उठी थी, वो पूरी नहीं उठी थी। कोई पूछ रहा था — क्या ये सच है?
"तुम सब बेवकूफ हो," भैरव ने कहा। "एक बूढ़ी औरत और एक आवाज़। बस। तुम इतनी सी बात से—"
"औरत नहीं," माँ ने कहा।
उन्होंने एक कदम आगे बढ़ाया। मेरे हाथ से मेरा हाथ छूट गया था, और मैं उन्हें रोक नहीं पाया। वो भैरव के सामने जा खड़ी हुईं — उस आदमी के सामने जो उनकी सौ साल की ज़मीन का मालिक बन बैठा था।
"मैं रघुवीर की औरत हूँ," उन्होंने कहा। "और तू उस दरवाज़े पर खड़ा है जिसे मेरे ससुर ने अपने हाथों से बनाया था। तू मुझे बता — तेरा इस दरवाज़े पर क्या हक़ है?"
भैरव का मुँह खुला रह गया।
"तेरे बाप ने मुझे खरीदा था," उसने कहा। पर आवाज़ भैरव की नहीं लगी। आवाज़ किसी और की लग रही थी — किसी डरे हुए आदमी की। "तेरे बाप ने मुझे पैसे दिए थे। मैंने तेरी ज़मीन अपने नाम लिखवाई। सब कागज़—"
"कागज़?" माँ ने कहा। "जो कागज़ एक मुर्दे के अँगूठे के नीचे बना हो, उसकी क्या कीमत?"
भैरव ने होंठ कसे। उसके माथे पर पसीना आ गया था, और वो पसीना चमक रहा था उस सुबह की रोशनी में।
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