Spirit of a Fighter – Chapter 451
और तभी, दूर से, अखाड़े के पिछले हिस्से से — जहाँ तहखाने का रास्ता था — एक आवाज़ आई। धीमी। दबी हुई। पर साफ़।
किसी के हँसने की आवाज़।
और उस हँसी में वो ज़हर था जो मैंने बीस साल से सूँघा था।
मैंने कालू काका की तरफ़ देखा। उनका चेहरा पत्थर जैसा हो गया था।
"वो तहखाने में गया है," उन्होंने धीरे से कहा। "वीर, वो तहखाने में गया है। और उसके पास दूसरी चाबी है।"
मैंने अपनी जेब टटोली। पहली चाबी वहीं थी — तहखाने की। पर दूसरी चाबी — सुरंग वाली — वो माधव सिंह के पास थी।
"वो सुरंग से निकला है," मैंने कहा। "वो माधव के घर तक गया है।"
"और वहाँ से कुएँ तक," कालू काका ने कहा। "वो तहखाने की मिट्टी जलाने आया है, वीर। आख़िरी बार।"
मैंने माँ की तरफ़ देखा। उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा, और उनकी पकड़ में वो ताकत थी जो मुझे अब तक नहीं पता थी।
"जा," उन्होंने कहा। "पर लौटकर आ।"
"मैं आऊँगा," मैंने कहा।
और मैं दौड़ा। मेरे पीछे टिंकू दौड़ा, और मीरा, और लुट्टन।
तहखाने का रास्ता जितना नीचे जाता था, उतनी ही हवा भारी होती जाती थी। मेरे फेफड़ों में मिट्टी घुल रही थी। पीछे टिंकू की साँस फूल रही थी, पर वो रुका नहीं। मीरा के कंगन की खनक अंधेरे में सबसे आगे चल रही थी, जैसे कोई लौटने का रास्ता दिखा रहा हो।
दरवाज़े पर पहुँचकर मैंने चाबी घुमाई। अंदर से रोशनी आ रही थी।
और वहाँ, कुएँ के किनारे, भैरव सिंह खड़ा था — हाथ में मिट्टी से भरी थैली, और आँखों में वो हँसी जो अब तक मेरे सपनों में रहती थी।
"देर कर दी, वीर," उसने कहा। "मैं सोच रहा था, तुम आओगे ही नहीं।"
और तभी पीछे से आवाज़ आई। भारी कदम। माधव सिंह आए, और उनके पीछे कालू काका और माँ। माधव सिंह के हाथ में बंदूक थी।
"बस," माधव सिंह ने कहा। "आज तीनों यहीं ख़त्म। और इसे हादसा कहकर रिकॉर्ड में लिख दिया जाएगा।"
उन्होंने बंदूक सीधी की। मेरी तरफ़।
मैंने धीरे-धीरे एक कदम आगे बढ़ाया। फिर दूसरा।
"रुक जा," माधव सिंह ने कहा।
"आप चालीस साल से मुखिया हैं," मैंने कहा। मेरी आवाज़ अपनी कानों में भी अजीब लगी — शांत, जैसे मैं खुद को बाहर से सुन रहा हूँ। "पर आज पहली बार आपकी आवाज़ काँप रही है।"
माधव सिंह का हाथ काँपने लगा। बंदूक की नली हवा में डगमगाई।
"चुप कर!" वो चिल्लाए। "तू मेरे बेटे जैसा है, और मुझ पर बंदूक ताने खड़ा है?"
"नहीं," मैंने कहा। "मैं खड़ा हूँ, और आप बंदूक ताने हैं। फ़र्क़ यही है।"
उनकी उँगली ट्रिगर पर जम गई।
और तभी कालू काका आगे आए। उन्होंने माधव सिंह का हाथ अपने दोनों हाथों में पकड़ लिया, इतनी ज़ोर से कि बंदूक नीचे झुक गई।
"माधव," कालू काका ने कहा। उनकी आवाज़ में गुस्सा नहीं, दुख था। "मैंने बीस साल तुम्हारा डर झेला। हर सुबह उठकर सोचा कि आज तुम्हारी मर्ज़ी क्या होगी। हर रात सोते वक़्त सोचा कि कल तुम किसे मिटाओगे। इतना डर झेला कि मैं अपना नाम ही भूल गया।"
उनका गला भर आया।
"पर आज नहीं झेलूँगा। आज मैं वो कालू हूँ जो तेरे अखाड़े में लड़ा था, तेरे बाप के साथ। आज मैं तेरा हिसाब करूँगा।"
"कालू!" माधव सिंह चीखे। "हट!"
"भागो!" कालू काका चिल्लाए। "वीर, भागो!"
मैंने माँ का हाथ पकड़ा और सुरंग की तरफ़ खींचा। मीरा और लुट्टन पीछे-पीछे दौड़े। अंधेरे में गोली चली — कान में एक ऐसा धमाका हुआ कि मुझे लगा दुनिया फट गई। पर गोली दीवार से टकराई और चिंगारी उड़ी।
हम सुरंग में घुस गए। पीछे गिरने की आवाज़ आई, फिर कालू काका की चीख — "माधव, रुक!"
मैंने माँ को सुरंग की दीवार के सहारे बैठाया। मेरी साँस फूल रही थी। मेरे हाथ काँप रहे थे।
तभी मेरी नज़र उनके हाथ पर पड़ी।
खून। ताज़ा खून, उनकी उँगलियों पर लिपटा।
"माँ!" मेरी आवाज़ फट गई। "आपको लगी क्या?"
वो मुस्कुराईं। उस अंधेरे में उनकी मुस्कान अजीब तरह से शांत थी।
"ये मेरा नहीं है," उन्होंने धीरे से कहा। "ये उस बूढ़े मुखिया का है, जो मेरा हाथ पकड़ रहा था।"
॥
खून मेरी उँगलियों पर लगा था। माँ का हाथ पकड़े हुए मैं उन्हें सुरंग की दीवार के सहारे बैठा रहा था, और मेरे दिमाग़ में सिर्फ़ एक ही बात घूम रही थी — कालू काका।
पीछे से आवाज़ें आ रही थीं। माधव सिंह कुछ चिल्ला रहे थे, और उनकी आवाज़ में वो भरोसा नहीं था जो अभी तहखाने में था। अब वो डर रहे थे। कालू काका ने उनका हाथ ऐसे पकड़ा था जैसे कोई बूढ़ा शेर अपने आख़िरी दाँत गाड़ रहा हो।
"माँ, आप यहीं रुको," मैंने कहा और उठने लगा।
उन्होंने मेरी कलाई पकड़ ली। उनकी उँगलियों में ज़ोर था, जिसका कोई हिसाब नहीं था।
"नहीं," वो बोलीं। "वो बूढ़ा तेरे लिए अपनी जान दे रहा है। तू पलटकर मत जा। तू बाहर निकल।"
"माँ—"
"सुन।" उन्होंने मेरा चेहरा दोनों हाथों में लिया, और उस अंधेरे में उनकी आँखें चमक रही थीं। "कालू ने मुझे इस सुरंग के बारे में पहले ही बता दिया था। उसने कहा था — अगर कभी माधव तुम्हें घेर ले, तो इस सुरंग से निकलना। वो इसी दिन के लिए बीस साल से तैयार था।"
मेरा गला सूख गया।
"तो वो मर जाएगा?"
"वो मरेगा नहीं," माँ ने कहा। "वो तुझे बचाने के लिए खुद को खपा रहा है। ये उसका हिसाब है। और तुझे उसे पूरा करने देना है — भागकर।"
टिंकू आगे आया। उसके हाथ में एक पतली डंडी थी जो उसने सुरंग के कोने से उठाई थी। उसकी आवाज़ काँप रही थी, पर वो बोला।
"भाई, एक बात सुन।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "मैं पीछे रुककर कालू काका को खींच लाऊँगा। तू माँ को लेकर आगे बढ़।"
"तू पागल है," मैंने कहा। "तू वहाँ जाएगा तो—"
"मैं पागल नहीं हूँ," उसने कहा। उसकी आवाज़ में वो डर था जो मैंने कभी नहीं सुना था। "मैं सिर्फ़ अब तक डरपोक था। तेरे साथ खीर खिलाने भर का दोस्त नहीं बनना। आज मैं कुछ करूँगा।"
मैं उसे देखता रहा। मेरा दिल कह रहा था कि उसे मत जाने दो। पर उसकी आँखों में जो था, वो किसी और ने नहीं देखा था। वो था — अपने आप से लड़ने का पल।
"ठीक है," मैंने कहा। "पर एक बात याद रख। तू पकड़ा गया तो मैं पलटकर आऊँगा। और तब मैं तुझे साथ लेकर ही जाऊँगा।"
टिंकू मुस्कुराया। उस अंधेरे में उसकी मुस्कान ने मेरा कलेजा भर दिया।
और वो पलटकर भागा। उसकी चप्पलों की आवाज़ सुरंग में गूँजती रही।
मैंने माँ को सहारा दिया। मीरा ने मेरा दूसरा हाथ पकड़ लिया।
"लुट्टन?" मैंने पीछे देखा।
लुट्टन सुरंग की दीवार से टिका खड़ा था। उसका चेहरा पसीने से भीगा था, और उसकी एक टाँग अजीब तरीके से मुड़ी हुई थी। वो गिरा था — शायद तहखाने में भागते वक़्त, या पत्थर से टकराकर।
"मैं चल सकता हूँ," उसने दाँत भींचकर कहा। "बस तीन कदम रुक जाओ।"
जब वो उठा, उसका पैर टूटा हुआ था। मैंने उसे कंधे पर उठा लिया। उसका शरीर भारी था, पर मेरे अंदर की आग उससे भी भारी थी।
हम चले। सुरंग का रास्ता गहरा होता जा रहा था। दीवारों पर पुरानी लालटेन की कालिख थी, और मिट्टी में जले हुए काग़ज़ की गंध घुली थी।
पीछे से भैरव की आवाज़ आई, हालाँकि ये भैरव नहीं था।
"वो बूढ़ा मेरे हाथ से छूट गया," माधव सिंह चिल्ला रहे थे। "नीचे उतरो! वो सुरंग से निकल न जाएँ!"
और फिर कदमों की आवाज़ — भारी, कई पैर। भैरव सुरंग में उतर रहा था, अपने आदमियों के साथ।
"तेज़ चलो," मीरा ने कहा।
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