Spirit of a Fighter – Chapter 453
तभी पीछे से फिर आवाज़ आई।
"मोहन," कालू काका बोले। "तू अब भी वही है। बीस साल पहले तूने मेरे सामने झूठ बोला था, और आज भी झूठ बोल रहा है। पर आज तेरे पीछे खड़े लोग अंधे नहीं हैं। वो तेरे झूठ के पैसे खाते हैं, पर उनके बच्चे भी इसी मिट्टी में खेलते हैं। तू उन्हें बता — इस मिट्टी का असली हक़दार कौन है?"
सन्नाटा छा गया।
फिर एक आदमी ने अपना कपड़ा नीचे खींचा। गोरा चेहरा, मुँछें, एक आँख पर निशान। वो भीड़ से बाहर आया।
"काका," उसने धीरे से कहा, "मैं भीमू हूँ। रामलाल का बेटा। आपने मुझे बचपन में कंधे पर बैठाया था।"
दरवाज़े के पार से हल्की हँसी आई। "भीमू। तू अब भी उतना ही मोटा है?"
भीमू की आँखें भर आईं। उसने अपनी लाठी नीचे रख दी। उसके पीछे दो और लोगों ने लाठियाँ रखीं। फिर चार और।
भैरव ने चारों तरफ़ देखा। उसकी भीड़ पिघल रही थी, और वो पिघलाव उसके पैरों के नीचे से ज़मीन खींच रहा था।
"बेवकूफ," उसने फुसफुसाया। "सब बेवकूफ।"
और फिर उसने वो किया जो मुझे डर था। उसने अपनी लाठी उठाई — माँ की तरफ़ नहीं। मेरी तरफ़।
पर वो पहुँचने से पहले मीरा बीच में आ गई।
मैंने उसे नहीं देखा था। मैं इतना माँ को देख रहा था कि मीरा कब आगे आई, पता ही नहीं चला। उसने अपना हाथ उठाया — वो हाथ जिसमें अभी तक मेरी दी हुई रस्सी लिपटी थी — और भैरव की लाठी उसकी कलाई पर पड़ी।
आवाज़ ऐसी आई जैसे लकड़ी हड्डी पर पड़ी हो।
मीरा कराही, पर पीछे नहीं हटी।
"तुम्हें शर्म नहीं आती?" वो बोली, और उसकी आवाज़ काँप रही थी पर शब्द साफ़ थे। "तुम एक औरत पर लाठी उठा रहे हो। तुम्हें अखाड़े का बेटा कहते हैं?"
भैरव ने उसे देखा। उसकी आँखों में कुछ ऐसा आया जो शायद शर्म थी, या शायद उससे भी बुरा कुछ।
"तू कौन है?" उसने कहा।
"मैं मीरा हूँ," वो बोली। "रघुवीर की बेटी। और ये जो तेरे सामने खड़ी है, ये मेरी माँ है।"
मेरे अंदर कुछ हिला।
माँ ने मीरा की तरफ़ देखा। एक पल के लिए उनका चेहरा ऐसा हो गया जैसे किसी ने उनके हाथ से कोई भारी बोझ ले लिया हो। फिर उन्होंने मीरा का हाथ पकड़ा — वही हाथ जिस पर लाठी पड़ी थी — और उसे अपनी छाती से लगा लिया।
"अच्छा किया बेटा," वो फुसफुसाईं।
भैरव ने अपनी लाठी धीरे से नीचे की। उसके हाथ से वो छूट गई और घास में गिरी।
उसने एक बार आसमान की तरफ़ देखा। फिर अपने पीछे देखा — जहाँ उसके आदमी खड़े थे, पर अब कोई उसकी तरफ़ नहीं देख रहा था। सब दरवाज़े की तरफ़ देख रहे थे, जहाँ से वो आवाज़ आ रही थी जिसने उनके बीस साल का डर एक पल में तोड़ दिया।
"कालू," भैरव ने कहा। बस इतना। उसकी आवाज़ में अब गुस्सा नहीं था। थकान थी।
दरवाज़े के पार से जवाब आया, धीमा और साफ़। "मोहन। अब भी देर नहीं हुई। दरवाज़ा खोल। मैं तेरे सामने आना चाहता हूँ।"
भैरव ने कुछ देर कुछ नहीं कहा। उसकी उँगलियाँ हिल रही थीं। फिर उसने अपनी जेब से एक चाबी निकाली — छोटी, जंग लगी चाबी — और उसे भीमू की तरफ़ बढ़ा दिया।
"खोल," उसने कहा।
भीमू ने चाबी ली। वो दरवाज़े तक गया, ज़ंजीर में चाबी डाली, और घुमाई। ज़ंजीर चरचराई और खुल गई। दरवाज़ा धक्का देने पर खुला।
और सामने कालू काका खड़े थे।
वो टूटे हुए थे। एक हाथ लटक रहा था, चेहरे पर सफ़ेद दाढ़ी इतनी बढ़ी थी कि लग रहा था कोई पुराना पेड़ हो। पर उनकी आँखें वही थीं — सीधी, साफ़, और अब भी उस आदमी की तरफ़ देख रही थीं जिसने उन्हें बीस साल अंधेरे में रखा था।
वो धीरे-धीरे चलकर बाहर आए।
भैरव ने उन्हें देखा, और उसका चेहरा बदल गया। मैंने उस आदमी को पहली बार देखा — बिना हथियार, बिना आदमी, बिना मुस्कान। बस एक आदमी, जिसके सामने वो सच खड़ा था जिससे वो बीस साल भागता रहा।
कालू काका उसके सामने रुके।
"तूने मेरी ज़मीन ली," वो बोले। "तूने मेरा घर लिया। तूने मेरे बेटे को मार डाला—"
"वो मैंने नहीं—"
"चुप कर," कालू काका ने कहा। और भैरव चुप हो गया। "आज मैं तुझसे हिसाब नहीं माँगूँगा। आज मैं बस ये देखना चाहता हूँ कि तू अपनी आँखों में मुझे देख सकता है या नहीं।"
भैरव ने उनकी आँखों में देखा। और उस आदमी की आँखें छलक आईं। वो कुछ कहना चाहता था, पर शब्द नहीं बने। बस उसके होंठ काँपे, और उसने अपना सिर नीचे कर लिया।
तभी मैंने पीछे से आवाज़ सुनी — दूर से, गाँव की तरफ़ से। भागते पैरों की आवाज़। और फिर सफ़ेद कुर्ते में कुछ लोग नज़र आए — पुलिस? नहीं, अभी नहीं। गाँव के लोग थे, और उनके आगे एक बूढ़ा आदमी दौड़ रहा था, हाथ में लाठी लिए।
"भैरव सिंह!" वो चिल्लाया। "तूने मेरे बेटे को—"
भीमू ने उसे रोका। "रुक, चाचा। रुक।"
पर वो बूढ़ा नहीं रुका। वो सीधा भैरव की तरफ़ बढ़ा।
मैंने माँ को देखा। वो शांत खड़ी थीं, मीरा का हाथ पकड़े हुए। उनके चेहरे पर कुछ ऐसा था जो मैंने पहले नहीं देखा था — जीत नहीं, शांति। जैसे बीस साल बाद किसी ने उनके घर की खिड़की खोल दी हो।
मैंने लुट्टन को धीरे से घास पर बैठाया। वो कराहा, पर फिर हँसा।
"वीर," उसने कहा। "तेरी माँ कमाल की हैं।"
"पता है," मैंने कहा।
"और तेरी बहन—"
"वो मेरी बहन नहीं है," मैंने कहा। "पर है भी। समझ नहीं आता।"
लुट्टन ने मीरा को देखा, फिर मुझे देखा। "समझ जाएगा," उसने कहा। "दर्द में भी समझ आ जाता है।"
उस पल में, उस पागल सुबह में, उस नहर के किनारे, मुझे पहली बार लगा कि मैं जीत गया हूँ। शायद पूरी तरह नहीं। शायद कुछ बातें अभी बाकी थीं। पर आज, इस सुबह, मेरे पापा ने मुझे एक दरवाज़े से बचाया था — और मेरी माँ ने उस दरवाज़े का ताला खोला था।
मैंने अपनी मुट्ठी खोली।
हथेली पर पसीना था, और उसमें मिट्टी के कुछ कण चिपके थे। मुझे याद आया — बहुत साल पहले, मेरे पापा ने एक बार मेरी हथेली में मिट्टी रखी थी और कहा था, "ये तेरी है। इसे कभी मत बेचना।"
मैंने उन कणों को देखा।
और तभी भीड़ में से एक आवाज़ आई, ऊँची और साफ़।
"भैरव सिंह को पकड़ो! मत जाने दो!"
मैं पलटा। भैरव भाग रहा था — नहर किनारे, घास पर, उस भागते बूढ़े आदमी से बचने के लिए। वो फिसला, गिरा, फिर उठा। पर भीमू और दो और आदमी उसके पीछे दौड़ चुके थे। उन्होंने उसे घास पर दबोच लिया।
मैंने राहत की साँस ली।
पर राहत पूरी नहीं थी। क्योंकि जब मैंने चारों तरफ़ देखा, तो मुझे कुछ और दिखा। नहर के पार, दूर, पेड़ों के पीछे — एक सफ़ेद स्कूटर खड़ा था। और उस पर बैठा आदमी दूरबीन से हमें देख रहा था।
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसने भी देखा था। उसके चेहरे का रंग उड़ गया।
"वो कौन है?" मैंने पूछा।
"नहीं पता," उसने धीरे से कहा। "पर वो कल भी वहीं खड़ा था। जब हम अखाड़े से निकले थे।"
मैंने फिर देखा। स्कूटर वाले ने दूरबीन नीचे की, और फिर स्कूटर स्टार्ट किया। आवाज़ दूर से आई — भिनभिनाती, छोटी। वो पेड़ों के पीछे गायब हो गया।
मेरे पेट में ठंडी सी एक चीज़ हिली।
"माँ," मैंने कहा।
वो मेरी तरफ़ देखने लगीं।
"कालू काका को बीस साल तक उस दरवाज़े के पार किसने रखा?"
माँ ने कालू काका की तरफ़ देखा। वो अब भैरव के पास खड़े थे, और पुलिस की तरह कुछ लोग गाँव से दौड़कर आ रहे थे।
"मुझे लगा भैरव ने रखा," माँ ने धीरे से कहा।
॥
माँ ने जवाब दिया भी नहीं, और सवाल वहीं अधूरा रह गया। क्योंकि उस वक़्त गाँव से आए लोगों की भीड़ बढ़ने लगी थी, और उनके पीछे-पीछे भागते पैरों की आवाज़ आ रही थी।
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