Spirit of a Fighter – Chapter 447
तभी माधव सिंह ने आख़िरी कोशिश की। उन्होंने झुककर बंदूक उठाई, और उसे मेरी तरफ़ घुमाया।
"तूने मेरा बेटा छीन लिया," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ फटी हुई थी। "तूने मेरा अखाड़ा छीन लिया। तूने मेरा नाम छीन लिया। अब मैं तेरा नाम छीनूँगा।"
उनका हाथ काँपा। उनकी उँगली ट्रिगर पर थी। और मैंने वो देखा जो मैंने पहले कभी नहीं देखा — उनकी आँखों में वो आग नहीं थी जो भैरव की आँखों में थी। उनकी आँखों में सिर्फ़ थकान थी। बीस साल की थकान।
और मैंने एक कदम आगे रखा।
"मार दो," मैंने कहा।
मीरा ने मेरी बाँह पकड़ी। "वीर!"
पर मैंने अपनी बाँह छुड़ाई। मैं उनके सामने खड़ा हो गया।
"मार दो," मैंने दोहराया। "पर मारने से पहले एक बात सुन लो। आज तुम जो भी करोगे, वो सच नहीं बदलेगा। सच ये है कि तुमने अपने बेटे को ज़हर पिलाया। सच ये है कि तुमने बीस बेटों को मारा। सच ये है कि तुम्हारी धोती पर रघुवीर का तेल लगा है। और सच ये है कि आज इस तहखाने में जो भी होगा, उसका गवाह ये मिट्टी होगी। और ये मिट्टी झूठ नहीं बोलती।"
माधव सिंह का हाथ काँपा।
"तू मुझे डरा रहा है?" उन्होंने कहा। "मिट्टी से?"
"नहीं," मैंने कहा। "मैं तुम्हें याद दिला रहा हूँ कि तुम किस पर खड़े हो।"
और फिर मैंने अपना पैर ज़मीन पर मारा। ज़ोर से। एक बार, दो बार, तीन बार।
तहखाने का पुराना फ़र्श हिला। ऊपर से मिट्टी गिरने लगी। दीवार में दरार आई — वो दरार जो कालू काका ने बीस साल पहले देखी थी, जो आज सुबह हमारे ऊपर से गुज़रते वक़्त चरमराई थी।
माधव सिंह ने ऊपर देखा। एक पल के लिए उनका ध्यान भटका।
और उसी पल में माँ ने छलाँग लगाई।
वो उनके हाथ पर झपटीं। बंदूक छूटी। ज़मीन पर गिरी। और मैंने उसे उठाकर दीवार की तरफ़ फेंका।
बंदूक दीवार से टकराई और दूर जा गिरी।
भैरव ने एक कदम आगे बढ़ाया — मेरी तरफ़ नहीं, बल्कि अपने बाप की तरफ़। और माधव सिंह को ज़मीन पर पटक दिया।
"बस," भैरव ने कहा। उसकी आवाज़ रुँधी थी। "बस करो बापू। बहुत हो गया।"
माधव सिंह ज़मीन पर पड़े थे। उनकी धोती मिट्टी में लिपटी थी। उनके बाल बिखरे थे। वो कुछ बोलना चाहते थे, पर आवाज़ नहीं निकल रही थी।
दरवाज़े पर फिर आहट हुई।
इंस्पेक्टर साहब अंदर आए। उनके पीछे चार सिपाही।
उन्होंने माधव सिंह को ज़मीन पर देखा, भैरव को उनके सामने घुटनों पर, और माँ को — जो अपनी धोती ठीक कर रही थीं, जैसे अभी कुछ हुआ ही न हो।
"सब कुछ रिकॉर्ड हो गया?" इंस्पेक्टर ने पूछा।
मीरा ने अपना मोबाइल जेब से निकाला। स्क्रीन पर रेड वाला बिंदु जल रहा था।
"जी सर," मीरा ने कहा। "पहले मिनट से। भैरव का इकरार, माधव सिंह की धमकी, बंदूक — सब।"
इंस्पेक्टर ने सिर हिलाया। "माधव सिंह, आप गिरफ़्तार हैं। और भैरव सिंह — आप भी।"
सिपाही आगे बढ़े। माधव सिंह को उठाया गया। उनके हाथों में हथकड़ी लगी।
और जब वो ऊपर जाने वाली सीढ़ियों की तरफ़ बढ़े, तो माधव सिंह ने पलटकर देखा।
"एक बात," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ अब भी सूखी थी, "तुम सोचते हो तुम जीत गए? तुमने सिर्फ़ मुझे हराया। पर जो मैंने बोया है, वो तुम्हारे खेत में उगेगा। इस गाँव में हर बेटा जानता है कि उसके बाप को किसने मारा। और वो तुम्हारा नाम लेगा — वीर सिंह का।"
मैं उनके सामने खड़ा रहा।
"जानता हूँ," मैंने कहा। "और मैं उस दिन का इंतज़ार करूँगा। ताकि मैं उन्हें बता सकूँ कि उनके बाप को तुमने मारा था — और मैंने तुम्हें रोका था।"
माधव सिंह हँसे। पर हँसी में अब कुछ नहीं था। वो सीढ़ियाँ चढ़ गए।
भैरव बाक़ी था। वो अब भी घुटनों पर था। इंस्पेक्टर ने उसकी तरफ़ देखा, फिर मेरी तरफ़।
"इसके लिए वॉरंट है," उन्होंने कहा।
"एक मिनट," मैंने कहा।
मैं भैरव के सामने घुटनों के बल बैठ गया।
"मोहन," मैंने कहा।
उसने सिर उठाया। उसकी आँखें लाल थीं।
"तेरा बाप तुझे ले जा रहा है," मैंने कहा। "पर एक बात याद रखना। तू शेर सिंह का बेटा है। वो शेर सिंह जो इस अखाड़े में बीस साल तक अजेय रहा। वो तेरे अंदर है, माधव सिंह के अंदर नहीं। जिस दिन तू इसे पहचानेगा, उस दिन तू मुझे हरा सकेगा।"
भैरव ने मेरी तरफ़ देखा। उसके होंठ हिले, पर कुछ नहीं निकला।
फिर उसने सिर झुकाया — मेरे सामने नहीं, माँ के सामने। और चला गया।
तहखाना खाली हो गया। सिर्फ़ हम बचे — मैं, माँ, मीरा, कालू काका, और लुट्टन, जो दरवाज़े पर खड़ा खुद को सँभाल रहा था।
माँ ने मेरी तरफ़ देखा।
"अच्छा किया," उन्होंने कहा।
"क्या?"
"बंदूक के सामने खड़ा हो गया।" उनकी आवाज़ में डाँट थी, पर आँखों में कुछ और। "मैं तुझे इसलिए नहीं पाला था।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा, और मेरी आँखें भर आईं। मैंने उन्हें गले लगाना चाहा, पर माँ ने मेरा हाथ पकड़कर रोक दिया।
"बाद में," उन्होंने कहा। "अभी ऊपर चल। ये मिट्टी बोल रही है।"
हम सीढ़ियाँ चढ़ने लगे। पर मैंने पीछे मुड़कर देखा।
तहखाने की मिट्टी में — जहाँ माधव सिंह पड़े थे — एक जगह दबी हुई थी। और मुझे वहाँ से एक गंध आई।
मैं रुक गया।
"वीर?" मीरा ने कहा।
मैंने सूँघा। धीरे से, ताकि सिर में दर्द न हो।
वो गंध — पुरानी, दबी हुई, किसी बंद डिब्बे जैसी — वही थी जो मुझे सुबह कुएँ की तरफ़ से आई थी। जले हुए बालों जैसी। पर आज उसमें कुछ और मिला हुआ था। मिट्टी का तेल। और एक सूखी लकड़ी की गंध।
"माँ," मैंने कहा, "यहाँ कुछ है।"
कालू काका ने मेरी तरफ़ देखा। उनके चेहरे का रंग उड़ गया।
"वो मिट्टी हटाओ," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ काँप रही थी। "जल्दी।"
मैंने हाथ से मिट्टी हटाई। नीचे एक लोहे का ढक्कन था — छोटा, गोल।
कालू काका ने वो ढक्कन खोला। और अंदर देखते ही उन्होंने ढक्कन गिरा दिया।
"ये…" वो फुसफुसाए।
मैंने अंदर देखा।
और मेरे हाथ काँपने लगे।
अंदर एक सूखा कुआँ नहीं था। अंदर एक सुरंग थी — पतली, अंधेरी, जो दूर तक जाती थी। और उस सुरंग में कुछ चीज़ें रखी थीं। बोतलें। बहुत सी बोतलें। और उनके बीच एक पुराना बक्सा।
मैंने बक्सा उठाया। उस पर मिट्टी की मोटी परत थी। और उसके ऊपर, खुरदरे अक्षरों में, कुछ लिखा था।
मैंने पढ़ा।
"ये क्या है?" मीरा ने पूछा।
मेरी आवाज़ नहीं निकली। मैंने बक्सा माँ की तरफ़ बढ़ाया।
माँ ने पढ़ा। उनके हाथ काँपे।
"ये रघुवीर की लिखाई है," उन्होंने कहा।
माँ ने बक्से को अपने आँचल में दबा लिया, जैसे कहीं से कोई उसे छीन न ले। उनके होंठ हिल रहे थे, पर आवाज़ नहीं आ रही थी। मैंने उनका हाथ पकड़ा तो उँगलियाँ बर्फ़ जैसी ठंडी थीं।
"माँ?"
"तेरे बाप ने ये लिखा था," उन्होंने फिर कहा, इस बार आवाज़ में कुछ टूट रहा था। "मरने से तीन दिन पहले। मैंने इसे देखा था, पर पढ़ा नहीं। मैंने सोचा… सोचा कि जो बात उसने काग़ज़ पर लिखकर छोड़ी है, वो मेरे सहने की नहीं है।"
मैंने बक्से का ढक्कन खोला। अंदर सूखी लकड़ी की गंध उठी, और उसके नीचे एक और गंध — बारूद जैसी। ऊपर एक मुड़ा हुआ काग़ज़ था, और उसके नीचे — मेरी साँस रुक गई — दो लोहे की चाबियाँ।
कालू काका ने काग़ज़ उठाया। उनके हाथ काँप रहे थे, पर उन्होंने पढ़ना शुरू किया।
"जो इसे पढ़ रहा है, वो मेरे खून का है।" उनकी आवाज़ भारी थी। "मैं रघुवीर सिंह, आज सच लिख रहा हूँ। माधव सिंह ने मुझे नहीं मारा। वो तो बस मोहरा था। असली हाथ तो ऊपर वाला है — जो सरपंच की कुर्सी से बैठकर गाँव को बाँटता है।"
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