Spirit of a Fighter – Chapter 446
मैंने उनकी बंदूक की नली देखी। छोटी थी, पर उसकी आँखें ठंडी थीं।
मेरे दिमाग़ में कालू काका की बात घूम गई — "मिट्टी झूठ नहीं बोलती, बेटा।"
मैंने अपने पैर के नीचे का पत्थर महसूस किया। तहखाने का फ़र्श — सैकड़ों साल पुराना, नरम, ठंडा, जैसे अभी-अभी उठा हो।
और मैंने वो किया जो कोई नहीं करता।
मैं धीरे-धीरे घुटनों के बल बैठ गया।
माधव सिंह रुक गए। उनकी भौंहें उठीं।
"घुटने?" भैरव ने कहा। "अब? इस वक़्त?"
पर मैं उनसे नहीं बोल रहा था। मैंने दोनों हाथ ज़मीन पर रखे, और माथा मिट्टी पर टिका दिया।
मैंने मिट्टी सूँघी।
मेरी नाक में जो आया, वो सिर्फ़ मिट्टी नहीं थी। वो बीस साल की साधना थी। वो किसी साधु का पसीना था जो सदियों पहले यहाँ बैठा था। वो उन सब पहलवानों का दर्द था जिन्हें इस अखाड़े ने जिया और खोया। वो मेरे पापा की गंध थी — रघुवीर की, जो यहीं लेटे थे।
और उस मिट्टी में, बहुत गहरे, एक और गंध थी।
मैं उठा। मेरे हाथ में मिट्टी लगी थी। मैंने उसे अपनी उँगलियों में मसला।
"ये मिट्टी," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ किसी और की लगी, "सबसे ताकतवर चीज़ है जो इस गाँव में है। और आपने इसे बीस साल तक पैरों से कुचला है।"
"क्या?" माधव सिंह ने कहा।
"आपने इस मिट्टी को कभी हाथ से नहीं सींचा," मैंने कहा। "आपने इसे कभी पैरों से नहीं गूंधा। आपने इसे सिर्फ़ पैरों तले रखा। इसलिए ये आपको नहीं पहचानती।" मैंने मिट्टी की तरफ़ देखा। "पर ये मुझे पहचानती है। क्योंकि मैंने इसमें पसीना डाला है।"
माधव सिंह हँसे। "ये मिट्टी तेरे को क्या बचाएगी? गोली से?"
"ये मिट्टी मुझे नहीं बचाएगी," मैंने कहा। "ये मुझे बताएगी कि आप कहाँ खड़े हैं।"
मैंने आँखें बंद कीं और सूँघा। तहखाने की हवा में — नमी, जंग, माँ के हाथों की हल्दी, मीरा के बालों से आती तुलसी, लुट्टन के पसीने में अब भी बची बोतल की कड़वाहट — और माधव सिंह की गंध।
सूखी लकड़ी। पुरानी अलमारी। और एक तीखी, धातु जैसी गंध — बारूद के पीछे जो आती है, वो नहीं। ये गेंदे के फूलों की गंध थी। और गाय के दूध की। और एक पुरानी चीज़, जो मैंने कभी नहीं सूँघी थी, पर पहचान ली — रघुवीर का तेल। जो अब सिर्फ़ माधव सिंह की धोती में लगा था।
"आपने पापा रघुवीर की धोती पहनी है," मैंने कहा, और आँखें खोल दीं।
माधव सिंह का हाथ काँपा। बंदूक हल्की नीचे झुकी।
"क्या बकवास है?" उन्होंने कहा।
"मेरे पापा की धोती में गेंदे के फूलों की गंध हमेशा रहती थी," मैंने कहा। "माँ रोज़ सुबह उनकी धोती में गेंदा रखती थीं। और आज आपने वही धोती पहनी है। जिस दिन आपने उन्हें मिट्टी में गाड़ा था, उस दिन आपने उनकी धोती उतार ली थी। और आज आपने उसे पहन लिया — क्योंकि आपको लगा कि आज आप जीत रहे हैं।"
भैरव ने माधव सिंह की तरफ़ देखा।
"बापू?" उसने धीरे से कहा। "ये सच है?"
"चुप रह," माधव सिंह ने कहा। पर उनकी आवाज़ में वो बात नहीं थी। उनका हाथ अब भी काँप रहा था।
"आपने उनकी धोती पहनी है," मैंने कहा, "इसका मतलब आपने उन्हें उस दिन नहीं छोड़ा। आपने उन्हें पहना। आप उन्हें बीस साल से पहने हुए हो। और आज ये धोती आपको छोड़ नहीं रही।"
माधव सिंह ने बंदूक ऊपर की। "एक और शब्द बोला तो—"
"तो क्या?" माँ ने कहा, और उन्होंने एक कदम आगे रखा। "गोली मारेगा? मार दे। पर तू ये धोती उतार नहीं सकता। क्योंकि ये तेरे शरीर पर चिपक गई है। जैसे रघुवीर का सच तेरे दिल पर चिपका है।"
माधव सिंह ने माँ की तरफ़ बंदूक घुमाई।
और मीरा ने वो किया जो मुझे उम्मीद नहीं थी।
वो आगे आई और माधव सिंह के सामने खड़ी हो गई। बंदूक की नली उसकी छाती के सामने थी, बस एक हाथ की दूरी पर।
"सर," मीरा ने कहा, और उसकी आवाज़ काँपी नहीं, "आप मेरे पापा के दोस्त थे। आप मेरे घर आते थे। आपने मुझे बचपन में कंधे पर बिठाया है। और अब आप मेरे सामने बंदूक लेकर खड़े हैं।"
माधव सिंह की नली हल्की हिली।
"हट जा, मीरा," उन्होंने कहा।
"नहीं," मीरा ने कहा।
"मैं तुझे मार नहीं सकता," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में पहली बार कुछ टूटा।
"तो बंदूक नीचे करो," मीरा ने कहा।
माधव सिंह की आँखें भर आईं। मैंने देखा — बूढ़े आदमी की आँखों में पानी। और फिर उन्होंने बंदूक नहीं नीचे की। उन्होंने उसे भैरव की तरफ़ घुमा दिया।
"तू," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में आग थी। "तूने सब बिगाड़ा। बीस साल मैंने तुझे सींचा। तू एक दिन में सब बेच दिया।"
भैरव पीछे हटा। उसका चेहरा सफ़ेद था।
"बापू, आप—"
"मैंने तुझे अपना बेटा कहा," माधव सिंह ने कहा, "और तूने मेरा नाम लिया। तूने सरस्वती के सामने, इस लड़के के सामने, अपना नाम लिया। तूने खुद को हरा दिया। और जो खुद को हारता है, वो अपने बाप को भी हरा देता है।"
उन्होंने कुंडी खींची।
मैंने आँखें बंद कर लीं।
पर गोली नहीं चली।
एक खट-खट की आवाज़ आई। और फिर माधव सिंह चिल्लाए।
मैंने आँखें खोलीं।
कालू काका दरवाज़े पर खड़े थे। उनके हाथ में एक पुरानी लोहे की छड़ थी, और माधव सिंह की बंदूक ज़मीन पर पड़ी थी। कालू काका ने बंदूक की कुंडी पर छड़ मारी थी — और कुंडी जाम हो गई थी।
"कालू?" माधव सिंह ने कहा, और उनकी आवाज़ में पहली बार डर था।
"बीस साल," कालू काका ने कहा। उनकी आवाज़ धीमी थी, वैसी ही जैसी हमेशा होती थी, जैसे पुरानी किताब पढ़ रहे हों। "बीस साल मैंने इस तहखाने की सीढ़ियाँ साफ़ कीं। बीस साल मैंने तुम्हें यहाँ आते देखा। बीस साल मैंने अपना मुँह बंद रखा।"
उन्होंने एक कदम आगे रखा। उनकी कुबड़ी आज सीधी लग रही थी।
"आज मैंने देखा," उन्होंने कहा, "कि तुम्हारा बेटा तुमसे भी बड़ा ज़ालिम निकला। और तुम्हारे हाथ काँप रहे हैं।"
माधव सिंह ने ज़मीन से बंदूक उठाने की कोशिश की। पर उनकी उँगलियाँ काम नहीं कर रही थीं — वो बूढ़े थे, और बंदूक भारी थी, और उनका दिल उनके साथ नहीं था।
भैरव ने एक कदम आगे बढ़ाया — अपने बाप की तरफ़ नहीं, दरवाज़े की तरफ़।
"रुक," मैंने कहा।
वो रुका। उसने मेरी तरफ़ देखा।
"तू जा कहाँ रहा है?" मैंने कहा। "तेरा बाप तेरे सामने खड़ा है। और तू भाग रहा है?"
"मैं नहीं भाग रहा," भैरव ने कहा। पर उसकी आवाज़ में वो ज़ोर नहीं था।
"तू बीस साल से भाग रहा है," माँ ने कहा। "उस दिन से भाग रहा है जिस दिन शेर सिंह मरा था। तू बच्चा था, और तूने सोचा कि तेरे बाप ने तुझे छोड़ दिया। पर तेरे बाप ने तुझे नहीं छोड़ा — तूने अपने बाप से मुँह मोड़ लिया।"
भैरव ने माँ की तरफ़ देखा। उसके होंठ काँप रहे थे।
"ताई," उसने कहा, और उसकी आवाज़ फिर वो धीमी हो गई जो नीम के पेड़ के नीचे हुई थी, "मैं आपका बेटा नहीं हूँ। मैं…"
"तू शेर सिंह का बेटा है," माँ ने कहा। "और शेर सिंह मेरे पति का दोस्त था। उसकी मौत के दिन मैंने तेरे सिर पर हाथ रखा था। याद है? तूने मेरी गोद में सिर रखा था और सो गया था। तेरे बालों में गेंदे का तेल लगा था।"
भैरव ने आँखें बंद कर लीं।
"मैंने वो दिन भुला दिया था," उसने धीरे से कहा।
"मैंने नहीं भुलाया," माँ ने कहा। "क्योंकि तू उस दिन से मेरे आँगन में नहीं आया। और मैं रोज़ सोचती थी — वो बच्चा कहाँ गया।"
भैरव ने अपने हाथों को अपने चेहरे पर रख लिया।
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