Spirit of a Fighter – Chapter 441
माधव सिंह ने उसकी तरफ़ देखा। उनके चेहरे पर कोई प्यार नहीं था। सिर्फ़ हिसाब था — जैसे कोई दुकानदार अपनी बिगड़ी हुई चीज़ को देख रहा हो।
"तूने सब बिगाड़ दिया," माधव सिंह ने कहा। "मैंने तुझे बीस साल पाला। तेरे लिए ये अखाड़ा बनाया। तू सिर्फ़ एक काम नहीं कर पाया — चुप रहना।"
भैरव हँसा। पर वो हँसी नहीं थी। वो कुछ और थी — जैसे किसी पुराने घाव से पानी निकल रहा हो।
"तूने मुझे पाला?" भैरव ने कहा। "तूने मुझे खरीदा था। जिस दिन मेरे पापा मरे, तूने मेरा हाथ पकड़ा और कहा — अब तू मेरा है। मैं तेरा नौकर बना। तेरा ज़हर बनाने वाला। तेरा पैसा कमाने वाला। और तू कभी मेरे पास नहीं बैठा। कभी नहीं पूछा कि मैं क्या चाहता हूँ।"
"तू जो चाहता था, वो मैंने दिया," माधव सिंह ने कहा। "ताकत। पैसा। डर।"
"नहीं," भैरव ने कहा। "तूने मुझे सिर्फ़ एक चीज़ दी — तेरा नाम। और वो भी छुपाकर।"
वो पलटा। भीड़ की तरफ़ देखा।
"मैं भैरव हूँ," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में पहली बार कुछ सच्चा था। "और मेरा असली नाम मोहन है। मैंने बीस साल तक इन बोतलों को पानी में घोला। मैंने उन पहलवानों को ज़हर दिया जिन्होंने मुझ पर भरोसा किया। मैंने अपने हाथों से उन्हें बीमार किया।"
भीड़ सन्न रह गई।
"पर आज," भैरव ने कहा, "मैं उसी मिट्टी में लेटूँगा जिसमें मैंने ज़हर घोला। और जो मेरे साथ होगा, वो मेरे हक़ की है।"
वो घूमा। मेरी तरफ़ देखा।
"वीर," उसने कहा, "मैंने कहा था न — आज मैं खुद को हराने लड़ूँगा।"
वो मैदान के बीच गया। मिट्टी पर घुटने टेके। फिर अपनी लाल धोती फाड़ी और उससे अपने हाथ बाँधे।
"मैं हार गया," उसने ऊँची आवाज़ में कहा। "मैंने जो किया, वो सब कबूल करता हूँ। जो पहलवान मरे, वो मेरे ज़हर से मरे। और जो पैसा आया, वो माधव सिंह के पास गया।"
माधव सिंह ने पीछे हटने की कोशिश की। पर पुलिस पहले से वहीं थी — और अब वो माधव सिंह की तरफ़ बढ़ रही थी।
"सरपंच जी," इंस्पेक्टर ने कहा, "आपको भी चलना होगा।"
माधव सिंह ने भीड़ की तरफ़ देखा। उनकी आँखों में वो डर था जो भैरव की आँखों में नहीं था। वो बोलने लगे — कुछ ऐसा, जो सुनने में सफ़ाई जैसा लगे। पर किसी ने नहीं सुना।
मैं मैदान के बीच खड़ा था। मेरे हाथ में ढक्कन था। और मेरी माँ मेरे पास आकर खड़ी हो गईं।
"अब?" मैंने धीरे से पूछा।
"अब मिट्टी का काम," माँ ने कहा। "जो बोया था, वो काटना है।"
तभी मीरा मेरे पास आई। उसके हाथ में कुछ था — एक छोटी-सी पीली शीशी। वही शीशी जो हमें जली ईंटों के पास मिली थी। जिसे मैंने ज़हर पहचाना था।
"वीर," उसने कहा। उसकी आवाज़ धीमी थी, पर उसमें कुछ ऐसा था जिसने मेरा पेट ठंडा कर दिया। "मैंने इसे फिर से जाँचा। ये वो ज़हर नहीं है।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"क्या?"
"ये ज़हर नहीं है," मीरा ने कहा। "ये दवा है। असली दवा — जो रघुवीर बनाते थे। जो तहखाने की मिट्टी से बनती थी।" उसने शीशी मेरी तरफ़ बढ़ाई। "और वीर, इसमें एक चीज़ और मिली है।"
"क्या?"
"माँ के हाथ की हल्दी," मीरा ने कहा। "ये शीशी तुम्हारी माँ ने भरी थी। और उन्होंने इसे तुम्हारे दरवाज़े के बाहर जानबूझकर रखा था।"
मैं पलटा। माँ की तरफ़ देखा।
माँ ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में वो चमक थी जो मैंने बहुत कम देखी थी।
"माँ?" मैंने कहा। "ये सच है?"
माँ ने अपना हाथ मेरे गाल पर रखा। उनकी हथेली में हल्दी की गंध थी — वैसी ही जैसी इस शीशी में थी।
"बेटा," उन्होंने कहा, "कुछ बातें मैं तुझे अब तक नहीं बता पाई। और आज वो सब बाहर आएँगी — चाहे मुझे कितना भी डर लगे।"
मैंने उनकी आँखों में देखा। और मुझे पहली बार लगा कि मैं अपनी माँ को जानता नहीं हूँ। जिस माँ के बारे में मैं सोचता था कि वो सिर्फ़ चक्की चलाती है और खाना बनाती है — वो माँ मेरे सामने एक और चेहरा लेकर खड़ी थी।
और वो चेहरा मुझे डरा रहा था।
"माँ," मैंने धीरे से कहा, "तू क्या छुपा रही है?"
माँ ने मेरा हाथ पकड़ा। उनकी पकड़ मज़बूत थी — उस औरत की पकड़ जिसने बीस साल तक चक्की चलाई थी, पर आज उनमें कुछ और था। कुछ ऐसा जो मिट्टी से आया था, चक्की से नहीं।
"वो शीशी मैंने रखी थी," उन्होंने कहा। "क्योंकि मुझे पता था कि एक दिन भैरव तक पहुँचेगी। और जिस दिन पहुँचेगी, उस दिन मुझे सच बोलना पड़ेगा।"
उन्होंने भैरव की तरफ़ देखा — जो अब भी मिट्टी पर बैठा था, हाथ बँधे।
"पर एक बात है जो मैंने आज तक किसी को नहीं बताई," माँ ने कहा। "और वो बात सिर्फ़ रघुवीर जानते थे। और अब… अब तू जानेगा।"
उन्होंने मेरे कान के पास मुँह लाया।
और जो उन्होंने कहा, उससे मेरे पैरों तले की मिट्टी खिसक गई।
मैंने उनकी तरफ़ देखा। मेरा गला सूख गया।
"माँ…" मैंने कहा। "तू मज़ाक कर रही है?"
माँ ने सिर हिलाया। उनकी आँखों में पानी था, पर होंठ कसे हुए थे।
"नहीं, बेटा," उन्होंने कहा। "और अब तुझे फ़ैसला करना होगा — कि तू इस सच का क्या करेगा। क्योंकि अगर ये बात बाहर आई, तो रामपुर का पूरा अखाड़ा नहीं, पूरा गाँव बदल जाएगा।"
मैंने मैदान की तरफ़ देखा। भीड़ अभी भी वहीं खड़ी थी। रणवीर सिंह व्हीलचेयर पर मेरी तरफ़ देख रहे थे। मीरा मेरे पास खड़ी थी, उसकी आँखों में सवाल था।
और मेरी माँ मेरे सामने खड़ी थीं — एक नए सच के साथ, जो मुझे अंदर से खोखला कर रहा था।
मैंने गहरी साँस ली।
और मैंने पहली बार सोचा — शायद भैरव का ज़हर सबसे बड़ा ज़हर नहीं था। सबसे बड़ा ज़हर वो सच था जो बीस साल से मेरी माँ के अंदर भरा हुआ था।
और आज वो सच मेरे सामने खुलने वाला था।
॥
मैंने माँ की आँखों में देखा, और मेरे अंदर कुछ टूट गया।
"माँ, तू क्या कह रही है?" मेरी आवाज़ काँप रही थी। "तूने क्या किया?"
माँ ने अपना हाथ मेरे गाल से हटाया और पीछे हटकर खड़ी हो गईं। उनकी आँखों में पानी था, पर आवाज़ में एक अजीब सी शांति।
"जो करना था, कर दिया," उन्होंने कहा। "अब तेरे हाथ में है।"
मीरा मेरे पास आई। उसके हाथ में एक मुड़ा हुआ काग़ज़ था। उसने मेरी तरफ़ देखा, फिर माँ की तरफ़।
"वीर," उसने धीरे से कहा, "ये काग़ज़ मैंने अभी-अभी उठाया है। ये भैरव के पास से गिरा था। उसने तुम्हारी माँ के हाथ में पकड़ाने की कोशिश की थी।"
मैंने काग़ज़ मीरा के हाथ से लिया। खोला।
और मेरा खून जम गया।
काग़ज़ पर लिखा था — "मैं सरस्वती, यह कबूल करती हूँ कि रघुवीर को ज़हर मैंने ही दिया था। उसकी मौत का ज़िम्मा मेरा है।" और नीचे अँगूठे के लिए एक जगह, खाली।
"ये क्या है?" मेरी आवाज़ फट गई। "ये किसने लिखा?"
"भैरव ने," मीरा ने कहा। "और वो तुम्हारी माँ से इस पर अँगूठा लगवाना चाहता था। मैदान के बीच, सबके सामने।"
मैंने माँ की तरफ़ देखा। माँ जमीन की तरफ़ देख रही थीं, जैसे उन्हें कोई सुनाई न दे रहा हो।
"माँ!" मैंने कहा। "तूने अँगूठा लगाया?"
माँ ने सिर हिलाया — ना में।
"नहीं, बेटा। मैंने कहा कि मैं अपने हाथ से अपने बेटे को पहाड़ नहीं बनाऊँगी।"
मैंने भैरव की तरफ़ देखा। वो मिट्टी पर बैठा था, हाथ बँधे, और उसके होंठों पर एक अजीब सी मुस्कान थी। वो मुस्कान जो हारे हुए आदमी के चेहरे पर नहीं होती।
"तू हँस क्यों रहा है?" मैंने कहा।
भैरव ने सिर उठाया।
"क्योंकि तू अभी भी नहीं समझा," उसने कहा। "ये काग़ज़ सिर्फ़ काग़ज़ है। पर माधव सिंह ने पहले ही पंचायत में बोल दिया है कि तेरी माँ ने ही रघुवीर को ज़हर दिया। सबने सुन लिया। और मैं सिर्फ़ एक अँगूठे का इंतज़ार कर रहा था।"
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