Spirit of a Fighter – Chapter 442
"तो मैं अँगूठा नहीं लगाऊँगी," माँ ने कहा। उनकी आवाज़ पहली बार तेज़ हुई। "और तू चाहे कुछ भी कर ले, मैं अपने बेटे को झूठा नहीं बनाऊँगी।"
भैरव हँसा।
"तब तेरा बेटा जेल जाएगा," उसने कहा। "सोना चोरी के इल्ज़ाम में। और तू जानती है कि इल्ज़ाम सच्चा है, क्योंकि सोना मेरे आदमी ने तेरे घर में रखवाया था।"
मैंने एक कदम आगे बढ़ा। मेरे हाथ मुट्ठी में बंध गए।
"तू मेरे घर में सोना रखवाया?"
"हर चीज़ का हिसाब होता है, वीर," भैरव ने कहा। "तूने मेरा अखाड़ा बर्बाद किया। तूने मेरा नाम खराब किया। अब मैं तेरा घर बर्बाद करूँगा।"
मीरा ने मेरा हाथ पकड़ लिया। उसकी पकड़ कसकर थी।
"वीर," उसने धीरे से कहा, "रुक। ये वही कर रहा है जो उसे चाहिए — तुझे गुस्सा दिलाना।"
मैंने गहरी साँस ली। मेरे सीने में आग जल रही थी, पर मीरा की आवाज़ में कुछ था जो मुझे रोक रहा था।
"सुन," मीरा ने कहा, "मैंने इस काग़ज़ की कॉपी पहले ही ले ली है। मेरे बैग में है। और मैं इसे पंचायत के सामने पेश करूँगी। भैरव का झूठ सबके सामने खुलेगा।"
"पर पंचायत तो माधव सिंह के हाथ में है," मैंने कहा।
"माधव सिंह अब पुलिस के हत्थे में है," मीरा ने कहा। "और पंचायत में जो बैठे हैं, उनमें से आधे के बेटे अखाड़े से नहीं लौटे। वो अब माधव की बात नहीं सुनेंगे।"
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो चमक थी जो मैंने पहली बार अखाड़े के बाहर देखी थी — जब वो मुझे मिट्टी से बाहर धकेल रही थी।
"तो अब क्या करना है?" मैंने पूछा।
मीरा ने लुट्टन की तरफ़ इशारा किया, जो दूर खड़ा हमारी बातें सुन रहा था।
"लुट्टन," उसने कहा, "तूने कहा था कि नीम के पेड़ के पास पत्थरों के नीचे लोहे के छल्ले वाला रास्ता है। वो तहखाने तक जाता है?"
लुट्टन ने घबराकर इधर-उधर देखा।
"हाँ, मैडम," उसने कहा। "पर वो रास्ता… वो बहुत पुराना है। कालू काका ने एक बार मुझे दिखाया था। कहा था कि अगर कभी जान बचानी हो, तो इससे भाग जाना।"
"तो अब जान बचाने का वक़्त है," मीरा ने कहा।
उसने मेरी तरफ़ देखा।
"वीर, तेरी माँ को यहाँ से निकालना है। भैरव के आदमी चारों तरफ़ घूम रहे हैं। पुलिस माधव को ले गई है, पर भैरव के बाकी आदमी अभी भी मैदान में हैं।"
मैंने इधर-उधर देखा। भीड़ धीरे-धीरे छँट रही थी, पर कुछ आदमी अभी भी कोने में खड़े थे — भैरव की लाल धोती वाले।
"माँ," मैंने कहा, "तू मेरे साथ चल।"
माँ ने मेरी तरफ़ देखा। फिर उन्होंने भैरव की तरफ़ देखा।
"एक बात पूछूँ?" उन्होंने कहा। "जो तूने आज किया — सबके सामने सच कबूल किया — वो भी कोई चाल थी?"
भैरव ने कुछ देर उन्हें देखा। फिर उसने धीरे से कहा, "नहीं। ये चाल नहीं थी। थकान थी। बीस साल की थकान।"
माँ ने सिर हिलाया।
"तो सुन," उन्होंने कहा। "जो तूने आज किया, वो अगर आधा भी सच था, तो भी तू अपने बाप से बेहतर है।"
भैरव ने कुछ नहीं कहा। उसने अपनी आँखें बंद कर लीं।
मैंने माँ का हाथ पकड़ा और उन्हें साथ लेकर चला।
नीम के पेड़ तक पहुँचने में हमें ज़्यादा दूर नहीं जाना था। मैदान के पीछे से होते हुए, कुछ झाड़ियों के बीच से। टिंकू पहले से वहीं खड़ा था — उसने हमें देखा और दौड़कर आया।
"भाई!" उसने कहा। "मैं डर गया था। मैंने सोचा कि तू…"
"बाद में," मैंने कहा। "अभी पत्थर दिखा।"
टिंकू ने पत्थरों की तरफ़ इशारा किया। दो बड़े पत्थर एक-दूसरे पर झुके हुए थे, और उनके बीच से लोहे के छल्ले की एक कड़ी दिख रही थी।
लुट्टन आगे आया।
"ये," उसने कहा। "ये खींचो।"
मैंने कड़ी पकड़ी और ज़ोर लगाया। पत्थर हिला, और एक छोटा सा रास्ता खुला — ज़मीन के अंदर जाती सीढ़ियाँ, जिन पर काई जमी थी।
"अंदर अंधेरा है," लुट्टन ने कहा। "मैं पहले जाऊँगा।"
वो अंदर उतरा। मैंने माँ की तरफ़ देखा।
"माँ, तू पीछे आ।"
माँ ने सिर हिलाया। उनके हाथ काँप रहे थे, पर चेहरे पर डर नहीं था।
मैं उतरा। सीढ़ियाँ उबड़-खाबड़ थीं, और हवा में नमी की गंध थी — गीली मिट्टी, पुरानी लकड़ी, और कुछ और… जला हुआ काग़ज़।
"यहाँ से आग की गंध आ रही है," मैंने कहा।
"हाँ," लुट्टन ने आगे से कहा। "भैरव ने कल रात काग़ज़ जलाए थे। यही रास्ता उसके कमरे के नीचे से जाता है।"
हम चलते रहे। सीढ़ियों के बाद एक सुरंग शुरू हुई — तंग, जिसमें दो आदमी भी बड़ी मुश्किल से साथ चल सकें। दीवारों पर पुराने निशान थे, जैसे किसी ने बहुत पहले यहाँ दीये रखे हों।
मीरा मेरे पीछे थी। मैं उसकी साँस सुन सकता था — धीमी, कसी हुई।
अचानक सुरंग मुड़ी, और सामने से हल्की रोशनी आई। लुट्टन रुक गया।
"तहखाने का पिछला हिस्सा है," उसने धीरे से कहा। "यहाँ से एक दरवाज़ा है जो सीधे उस कमरे में जाता है जहाँ माँ जी को बंद किया गया है।"
मैंने आगे बढ़कर देखा। दरवाज़े के पास एक दीया जल रहा था — हल्की, पीली रोशनी।
और तभी मैंने आवाज़ सुनी।
"मैं अँगूठा नहीं लगाऊँगी। तू मेरे बेटे को छोड़ दे।"
माँ की आवाज़। पर ये आवाज़ मेरे पीछे से नहीं आ रही थी। ये आवाज़ उस दरवाज़े के पार से आ रही थी।
मैं पलटा। माँ मेरे पीछे खड़ी थीं, और उनकी आँखें फैली हुई थीं।
"वीर," उन्होंने धीरे से कहा, "ये मेरी आवाज़ नहीं है।"
मेरा दिल धक् से रह गया।
"तो कौन है?" मैंने कहा।
मीरा ने मेरा हाथ कसकर पकड़ लिया।
"वीर," उसने कहा, "ये आवाज़… ये तुम्हारी माँ की आवाज़ है, पर जैसे कोई उनकी नकल कर रहा हो।"
लुट्टन का चेहरा सफ़ेद पड़ गया।
"भैरव के पास एक औरत है," उसने काँपते हुए कहा। "वो भैरव की चचेरी बहन है। वो आवाज़ें बदल सकती है। भैरव उसे इस्तेमाल करता है…"
मैंने दरवाज़े की तरफ़ देखा। मेरे हाथ मुट्ठी में बंध गए।
"तो अंदर मेरी माँ नहीं है?"
"है," लुट्टन ने कहा। "पर वो चुप है। और वो औरत उसकी आवाज़ में बोल रही है ताकि तेरा दिल कमज़ोर पड़े।"
मैंने गहरी साँस ली। मेरे अंदर गुस्सा भर रहा था — पर इस बार ठंडा गुस्सा। वो गुस्सा जो आदमी को अंधा नहीं, तेज़ बनाता है।
"मीरा," मैंने धीरे से कहा, "तू पीछे रुक। लुट्टन, तू मेरे साथ।"
मीरा ने मेरा हाथ नहीं छोड़ा।
"मैं पीछे नहीं रुकूँगी," उसने कहा। "मैं तुम्हारे साथ हूँ। और अगर तुझे लगता है कि मैं डर से काँप रही हूँ, तो देख — मेरे हाथ काँप रहे हैं, पर मेरे पैर नहीं।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसके होंठ कसे हुए थे, और उसकी आँखों में वो आग थी जो बारिश में भी नहीं बुझती।
"ठीक है," मैंने कहा।
मैं दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा। दरवाज़ा लकड़ी का था, पुराना, और उस पर भी वही त्रिकोण और बिंदु का निशान था — जैसा हरनाम की चाबी पर था।
मैंने दरवाज़ा धक्का दिया। वो खुल गया।
अंदर कमरा छोटा था, और उसमें एक दीया जल रहा था। माँ बैठी थीं — एक कोने में, पीतल का ढक्कन सीने से लगाए। उनकी आँखें बंद थीं।
और उनके सामने एक औरत खड़ी थी — लंबी, दुबली, काले कपड़ों में। उसका मुँह खुला था और वो माँ की आवाज़ में बोल रही थी।
"तू मेरे बेटे को छोड़ दे…"
मेरे अंदर कुछ ऐसा टूटा जो शब्दों में नहीं बताया जा सकता।
"बंद कर!" मैं चिल्लाया।
वो औरत पलटी। उसकी आँखें मुझ पर पड़ीं, और उसका मुँह बंद हो गया।
"तू आ गया," उसने कहा। उसकी आवाज़ अब सिर्फ़ उसकी थी — कर्कश, ठंडी। "भैरव ने कहा था तू आएगा।"
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