Spirit of a Fighter – Chapter 440
और उनके सामने, कुर्सी पर, भैरव सिंह बैठा था।
मेरी साँस रुक गई।
"मैं जानता हूँ तू आ रहा है, वीर," भैरव कह रहा था। उसकी आवाज़ शांत थी। इतनी शांत कि डर लगे। "मैंने पुलिस बुला ली है। तेरे आते ही, वो तुझे अखाड़े का सोना चुराने के इल्ज़ाम में पकड़ लेंगे। और फिर तेरी माँ…" वो रुका। "तेरी माँ को मैं यहाँ से नहीं जाने दूँगा।"
माँ ने उसकी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में डर नहीं था।
"तू मेरे बेटे को पकड़वा," उन्होंने कहा। "पर एक बात सुन ले, मोहन। आज तेरे पास जो बचा है, वो सिर्फ़ डर है। और डर से लड़ी लड़ाई कभी नहीं जीती जाती।"
भैरव उठा। उसका भारी शरीर कुर्सी से अलग हुआ, और कमरे की हवा भारी हो गई।
"तू मुझे डराती है?" उसने कहा। "तू? एक चक्की चलाने वाली औरत?"
"मैं तुझे नहीं डरा रही," माँ ने कहा। "मैं तुझे याद दिला रही हूँ। तेरे पापा, शेर सिंह, आख़िरी साँस तक अकेले थे। कोई नहीं था उनके साथ। और तू भी अकेला ही मरेगा, मोहन। बस फर्क इतना है — उनके पास कोई था जिसे वो प्यार करते थे। तेरे पास क्या है?"
भैरव की मुट्ठी कसी। उसका चेहरा लाल हो गया।
"चुप कर!"
"तेरे पास ये कमरा है," माँ ने कहा, आवाज़ नहीं बदली। "ये मिट्टी है, ये बोतलें हैं, और एक आदमी है जो तुझे बाप कहता है पर तेरी माँ का नाम तक नहीं लेता। बता, मोहन — इनमें से कौन तेरे साथ तेरी चिता पर आएगा?"
भैरव ने हाथ उठाया।
मैंने ईंट हटाई और खिड़की से कूद गया।
मैं उसके बीच आ गया — माँ और उसके हाथ के बीच।
"अपनी माँ से हाथ हटा," मैंने कहा।
भैरव रुका। उसका हाथ हवा में था। मेरी आवाज़ सुनकर वो पीछे हटा।
"आ गया तू," उसने कहा। उसके होंठों पर एक अजीब-सी मुस्कान आई। "मैं जानता था। तेरी माँ ही तेरी सबसे बड़ी कमज़ोरी है, वीर।"
"नहीं," मैंने कहा। "मेरी माँ मेरी ताकत है। कमज़ोरी वो होती है जिसे तू खुद नहीं जानता। और तू आज तक नहीं जान पाया कि मैं कितना जानता हूँ।"
मैंने अपनी जेब से पीतल की छोटी चाबी निकाली — हरनाम की मुट्ठी में मिली चाबी। त्रिकोण और बिंदु का निशान।
"ये तेरी अलमारी की चाबी है," मैंने कहा। "हरनाम ने इसे अपनी जान से बचाकर रखा था। और उससे पहले, उसने मुझे कुछ बताया था। पर वो तेरी बीमारी से मर गया, भैरव। तेरे ज़हर से।"
भैरव का चेहरा बदला। पहली बार, उसकी आँखों में कुछ और आया — शक नहीं, डर।
"हरनाम मरा?"
"मरा," मैंने कहा। "और मरने से पहले उसने एक काग़ज़ छोड़ा। जिस पर लिखा था — भैरव का असली नाम मोहन है, और मोहन का बाप शेर सिंह नहीं…"
मैं रुका। भैरव की साँस फूलने लगी।
"…माधव सिंह है।"
कमरे में सन्नाटा छा गया। इतना गहरा कि मुझे अपनी धड़कन सुनाई दे रही थी।
भैरव ने एक क़दम पीछे लिया। फिर दूसरा। उसका भारी शरीर कुर्सी से टकराया।
"तू झूठ बोल रहा है," वो बोला। पर उसकी आवाज़ में वो ताकत नहीं थी। "मेरे बाप शेर सिंह थे। मैं उनका बेटा हूँ। मैं—"
"तू माधव सिंह का बेटा है," माँ ने कहा। उन्होंने अपना ढक्कन नीचे रख दिया। "बीस साल पहले, जिस रात तेरे पापा शेर सिंह मरे, माधव सिंह ने तेरा हाथ पकड़ा था। कालू ने देखा था। और माधव ने कहा था — अब तू मेरा है। तूने कभी सोचा, मोहन, माधव तुझे बीस साल तक क्यों पालता रहा? क्यों तेरे हर पाप को छुपाता रहा? क्यों तेरे ज़हर के कारोबार में पैसा डालता रहा?"
भैरव की आँखें फैल गईं।
"क्योंकि तू उसका बेटा है," माँ ने कहा। "और वो तुझे अखाड़े का मालिक बनाना चाहता था। पर तू कभी नहीं बना। क्योंकि तू हर बार ज़हर को चुना। जब तुझे पसीना चुनना था, तूने बोतल चुनी। जब तुझे दोस्त चुनने थे, तूने चेले चुने।"
भैरव एक कुर्सी पकड़कर बैठ गया। उसके हाथ काँप रहे थे। बड़े-बड़े हाथ, जो बीस साल से बोतलें भरते आए थे — आज पहली बार खाली लग रहे थे।
"तो अब क्या?" उसने धीरे से कहा। "तू मुझे पकड़वा देगा?"
"नहीं," मैंने कहा। "तू खुद पकड़ा जाएगा।"
मैंने चाबी जेब में रखी और माँ की तरफ़ देखा।
"माँ, तू यहीं रुक। मैं बाहर जाकर सबको बताऊँगा।"
"नहीं," माँ ने कहा। वो उठीं। उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा। "आज मैं तेरे साथ चलूँगी। मैं बीस साल से इस अखाड़े की मिट्टी को झूठ बोलते देख रही हूँ। अब मैं इसे सच बोलते सुनूँगी।"
हम बाहर निकले। लुट्टन रास्ते में खड़ा था, हाथ जोड़े।
"मैं भी चलूँगा," उसने कहा। "मैं गवाही दूँगा।"
मैंने उसे देखा। उसका चेहरा अब पीला नहीं था। थोड़ा सा लाल था — जैसे पहली बार किसी ने उसे धूप दिखाई हो।
"चल," मैंने कहा।
मैदान में लौटे तो भीड़ और बढ़ गई थी। माधव सिंह मंच पर खड़े थे, हाथ में माइक। रणवीर सिंह अभी भी व्हीलचेयर पर थे, पर उनका चेहरा किसी चीज़ का इंतज़ार कर रहा था।
मीरा ने मुझे देखा। उसकी आँखें भरी हुई थीं, पर उसके होंठ कसे हुए थे। वो मेरी तरफ़ आई।
"तुम ठीक हो?" उसने धीरे से पूछा।
"अब ठीक हूँ," मैंने कहा।
माधव सिंह ने माइक पकड़ा।
"रामपुर के लोगो," वो बोले। "आज हम सब यहाँ इसलिए इकट्ठे हैं कि अखाड़े का सच सामने आए। मुझे बताया गया है कि अखाड़े का सोना चोरी हुआ है। और चोर कोई बाहर का नहीं—"
"रुकिए," मैंने कहा।
मेरी आवाज़ ऊँची नहीं थी। पर मैदान में फैल गई। क्योंकि मैंने वो आवाज़ अपनी माँ की आँखों से निकाली थी।
मैं मंच की तरफ़ बढ़ा। भीड़ हटती गई। मैं सीढ़ियाँ चढ़ा।
"सरपंच जी," मैंने कहा, "सोना चोरी नहीं हुआ। मैंने खुद अभी अंदर जाकर देखा है। सोना वहीं है। आपने झूठ बोला।"
माधव सिंह का चेहरा बदला। "तू इल्ज़ाम—"
"मैं इल्ज़ाम नहीं लगा रहा," मैंने कहा। "मैं सवाल पूछ रहा हूँ। आपने क्यों कहा कि सोना चोरी हुआ? क्यों पुलिस को पहले से बुला रखा था? क्यों भैरव को कहा कि मुझे तहखाने के पास पकड़वा दे?"
भीड़ में हलचल मची। माधव सिंह का माइक काँपा।
"ये सब झूठ है," वो बोले।
"झूठ?" मैंने कहा। "तो फिर ये बताइए — भैरव का असली नाम क्या है?"
माधव सिंह रुके।
"मोहन," मैंने खुद जवाब दिया। "और मोहन का बाप कौन है?"
कोई नहीं बोला।
मैंने अपनी जेब से वो आधा जला काग़ज़ निकाला — हरनाम के हाथ का। और उसे ऊपर उठाया।
"हरनाम ठेकेदार ने मरने से पहले ये लिखा था। और हरनाम आपका हिसाब रखने वाला था, सरपंच जी। वो जानता था कि भैरव को पैसा कहाँ से आता है। वो जानता था कि जिन पहलवानों की मौत को आपने 'बीमारी' कहकर रिकॉर्ड में लिखा, वो असल में ज़हर से मरे थे।"
मैंने भीड़ की तरफ़ देखा।
"आप में से कितने लोगों ने अपने बेटे को अखाड़े भेजा? कितनों ने सोचा कि उसका बेटा पहलवान बनेगा? और कितने बेटे लौटे? कितने?"
भीड़ में एक औरत रोने लगी। एक बूढ़ा आदमी अपनी लाठी के सहारे खड़ा हुआ।
"मेरा बेटा भी मरा था," उसने कहा। आवाज़ काँप रही थी। "दो साल पहले। बुखार बताया था।"
"मेरा भी," किसी और ने कहा।
"मेरा भी।"
आवाज़ें उठने लगीं। धीरे-धीरे, फिर तेज़।
माधव सिंह ने माइक छोड़ दिया। वो पीछे हटे।
तभी मैदान के दूसरे कोने से भैरव निकला। धीरे-धीरे चलता हुआ। उसके पीछे लुट्टन था, और लुट्टन के पीछे माँ।
भैरव सीधा माधव सिंह के सामने आकर रुका।
"बाप," उसने कहा। बस एक शब्द। पर उस एक शब्द में इतनी सारी चीज़ें थीं — सवाल, गुस्सा, और एक अजीब-सी उम्मीद।
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