Spirit of a Fighter – Chapter 439
और अंदर, दीवार के सहारे, एक चटाई पर मेरी माँ बैठी थीं। हाथ में वो पीतल का ढक्कन। आँखें बंद।
"माँ?" मैंने धीरे से कहा।
उन्होंने आँखें खोलीं। मुझे देखा। और मुस्कुरा दीं।
"मैं जानती थी तू आएगा," उन्होंने कहा। "मैंने रोटी चूल्हे पर छोड़ी थी — ताकि तू समझ जाए कि मैं जल्दी में गई हूँ, पर तू पीछे आएगा।"
मैं उनके पास गिरा। उनके पैर पकड़ लिए।
"माँ," मैंने कहा, "तू क्यों आई? वो ढक्कन लेकर? वो तेरी जान ले सकता था।"
उन्होंने मेरा सिर सहलाया। "बेटा, भूखे पेट की दुआ सीधी ऊपर जाती है। और आज मैंने कुछ नहीं खाया। सिर्फ़ दुआ बची थी।"
मैंने अपना सिर उनकी गोद में रख दिया। मेरी आँखें भर आईं।
और तभी ऊपर से आवाज़ आई — भारी पैरों की। कई आदमी।
माँ ने मेरा कंधा थपथपाया। "अब जा। मैं यहाँ सुरक्षित हूँ।"
"नहीं—"
"जा," उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ में वो मिट्टी जैसी मज़बूती थी। "मैदान तेरा इंतज़ार कर रहा है।"
मैं उठा।
मैंने उनके हाथ से ढक्कन लिया और अपने सीने से लगाया।
"माँ," मैंने दरवाज़े से पलटकर कहा, "आज मैं तेरे नाम से लड़ूँगा।"
उन्होंने सिर हिलाया। "मेरे नाम से नहीं, बेटा। अपने नाम से। अपनी मिट्टी के नाम से।"
मैं सीढ़ियाँ चढ़ने लगा। ऊपर की रोशनी मेरी आँखों में चुभ रही थी।
और मेरे हाथ में पीतल का ढक्कन था — बीस साल का सच।
अखाड़े की दीवार के बाहर निकला तो सूरज सिर पर आ चुका था।
दूर, गाँव की तरफ़ से आवाज़ें आ रही थीं। ढोल। भीड़।
और फिर मैंने देखा — अखाड़े का गेट खुला था। और उसके अंदर, मैदान के बीच, मिट्टी पर भैरव सिंह खड़ा था। उसके पीछे सरपंच माधव सिंह। और दूसरी तरफ़, दीवार के सहारे, रणवीर सिंह व्हीलचेयर पर। मीरा उनके पास खड़ी थी।
मैंने अपनी जेब में हाथ डाला। रोटी का टुकड़ा — आधा जला हुआ, ठंडा।
मैंने उसे मुँह में रखा। माँ के हाथ का स्वाद आया।
फिर मैंने ढक्कन को ऊपर उठाया।
भीड़ चुप हो गई।
और मैं मैदान की तरफ़ बढ़ा।
॥
मैं मैदान की तरफ़ बढ़ा, और भीड़ मेरी तरफ़ देख रही थी। पर मेरे कदम अचानक रुक गए।
क्योंकि मेरी नाक में एक गंध आई — तेज़, चुभती, जैसे कोई जले हुए बालों को पानी में बुझा रहा हो।
और वो गंध भैरव की तरफ़ से नहीं आ रही थी। वो गंध अखाड़े के पीछे से आ रही थी। कुएँ की तरफ़ से।
मैं पलटा।
लुट्टन दीवार के कोने पर खड़ा था, हाथ जोड़े, चेहरा पीला। वो मुझे देखकर पीछे हटने लगा।
मैं तीन लंबे क़दम में उसके पास पहुँचा और उसका गला पकड़ लिया।
"माँ कहाँ है?"
"भाई—"
"माँ कहाँ है, लुट्टन?" मेरी आवाज़ मेरी अपनी नहीं लग रही थी। "तूने अभी कहा था भैरव उसे तहखाने ले गया। मैं तहखाने से आ रहा हूँ। वहाँ कोई नहीं था। सिर्फ़ चटाई थी और उस पर माँ का रुमाल।"
लुट्टन की आँखों में पानी आ गया। उसने मेरा हाथ नहीं छुड़ाया। बस गिर गया — मेरे पैरों पर।
"माफ़ कर दे, भाई," वो रोया। "मैं झूठ बोला। माँ तहखाने में नहीं है। भैरव ने उसे तहखाने के पास वाले कमरे में बंद किया है — वो पुराना कमरा, जहाँ पहले पहलवानों के औज़ार रखे जाते थे। और… और वो तुझे फँसाना चाहता है।"
मेरा हाथ ढीला पड़ा।
"फँसाना?"
"कहा है उसने — अगर वीर तहखाने के पास आया, तो उस पर चोरी का इल्ज़ाम लगा देना। अखाड़े का सोना चोरी हुआ है, ऐसा दिखाना है। पुलिस पहले से बुला रखी है। वो गड्ढे के पास खड़ी है। जैसे ही तू अंदर घुसेगा, वो तुझे पकड़वा देगा।"
मैंने आँखें बंद कर लीं।
मेरे सामने सब साफ़ हो गया। भैरव ने मुझे तहखाने तक जाने दिया। माँ को वहाँ रखा। मुझे वहाँ आने दिया। ताकि मैं उसी कमरे से निकलूँ जहाँ से सोना चोरी हुआ है। और फिर पूरा गाँव कहे — मज़दूर का बेटा, चोर निकला।
"भैरव कहाँ है?" मैंने पूछा।
"मैदान में। लेकिन भाई, वो तेरा इंतज़ार नहीं कर रहा। वो तेरे पकड़े जाने का इंतज़ार कर रहा है।"
मैंने लुट्टन को उठाया। उसके कंधे पकड़े।
"तू मेरे साथ चल।"
उसकी आँखें फैल गईं। "क्या?"
"तू मेरे साथ चल," मैंने दोहराया। "कालू काका ने अखाड़े के पीछे, नीम के पेड़ के पास, एक गुप्त रास्ता बताया था। वो रास्ता माँ के कमरे तक जाता है। मुझे अंदर जाना है — बिना पकड़े गए। और तू मुझे रास्ता दिखाएगा।"
लुट्टन का चेहरा सफ़ेद पड़ गया। "भाई, वो रास्ता… वो गड्ढे के बगल से जाता है। पुलिस वहीं खड़ी है। अगर—"
"अगर तू मेरे साथ नहीं आया," मैंने कहा, "तो मैं अभी इसी मैदान में सबके सामने चिल्लाकर बताऊँगा कि तू भैरव का आदमी है। कि तू बीस साल से ज़हर पीता रहा और आज भी भैरव के लिए जासूसी कर रहा है।"
लुट्टन काँपने लगा।
"पर अगर तू आया," मैंने धीरे से कहा, "तो ये गाँव तुझे गवाह कहेगा। ज़हर का गवाह। और गवाह को कोई नहीं मारता।"
वो मेरी तरफ़ देखता रहा। बहुत देर।
फिर उसने अपना हाथ उठाया और आँसू पोंछे।
"चल," उसने कहा। आवाज़ टूटी हुई थी। "मैं रास्ता जानता हूँ।"
हम दीवार के साए में चले। धूप तेज़ थी और भीड़ का शोर पीछे छूट रहा था। लुट्टन मेरे आगे-आगे चल रहा था, कंधे झुकाए, जैसे कोई बोझ उठाए हो।
मैंने उसकी पीठ देखी। उसकी कमीज़ पसीने से भीगी थी। हाथ काँप रहे थे।
"लुट्टन," मैंने कहा।
वो नहीं रुका। "हाँ?"
"तूने बीस साल ज़हर पिया।"
वो रुका। पलटा। उसके चेहरे पर डर था — जैसे कोई मुझसे उसकी बीमारी का हिसाब माँग रहा हो।
"अब एक दिन सच के लिए पी," मैंने कहा।
वो खड़ा रह गया। मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा।
"तू मेरा दुश्मन नहीं है, लुट्टन। तू भी उसी बोतल का शिकार है जिसने मेरे दोनों पापा को मारा। फर्क सिर्फ़ इतना है कि तू मरा नहीं। अभी तक।"
लुट्टन का चेहरा ऐसा हुआ जैसे किसी ने उसके अंदर का ताला तोड़ दिया हो। उसने मेरी तरफ़ देखा, और उसकी आँखों से पानी बहने लगा — बिना आवाज़, बिना सिसकी। जैसे सूखा हुआ कुआँ अचानक भर आया हो।
"भाई," उसने कहा। बस इतना। पर उस एक शब्द में बीस साल थे।
मैंने सिर हिलाया।
"चल।"
हम नीम के पेड़ के पास पहुँचे। पेड़ की जड़ों के बीच पत्थरों का ढेर था। लुट्टन ने झुककर तीन पत्थर हटाए और नीचे से एक लोहे का छल्ला निकाला। छल्ला खींचा, और ज़मीन का एक हिस्सा हिला।
"ये रास्ता अखाड़े के नीचे से जाता है," उसने धीरे से कहा। "भैरव को भी नहीं पता कि मैं इसे जानता हूँ। मैंने एक रात कालू काका को यहाँ देखा था।"
"तो भैरव को पता नहीं चलेगा?"
"नहीं। पर भाई…" उसकी आवाज़ फिर काँपी। "अंदर अंधेरा है। और मुझे रास्ता आधा ही याद है।"
"तो आधे तक तू चलेगा। आधे में मैं तेरे साथ।"
हम उतरे। सीढ़ियाँ मिट्टी की थीं, नम, और ऊपर से हल्की रोशनी आ रही थी। मेरी नाक में गीली मिट्टी की गंध भर गई — वही गंध जो तहखाने की थी, पर कुछ अलग। इसमें मिट्टी के साथ-साथ जले हुए काग़ज़ की भी बू थी।
"यहाँ कुछ जला है," मैंने कहा।
"भैरव ने कल रात कुछ काग़ज़ जलाए थे," लुट्टन ने कहा। "मैंने उसे देखा था। वो कह रहा था — अब सबूत नहीं बचेंगे।"
मेरा दिल ज़ोर से धड़का। मैं तेज़ चलने लगा।
सुरंग ने हमें अखाड़े के पिछले हिस्से में निकाला — उसी पुराने कमरे के पीछे, जहाँ पहलवानों के औज़ार रखे थे। दीवार में एक छोटा-सा छेद था, जिसे ईंट से ढका गया था। मैंने ईंट हटाई और अंदर झाँका।
कमरे में माँ बैठी थीं। पीतल का ढक्कन उनके हाथ में था, और वो उसे दोनों हाथों से पकड़े हुए थीं — जैसे कोई ढाल पकड़े हो।
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