Spirit of a Fighter – Chapter 438
मैंने सुक्खी बुआ को वहीं छोड़ा और दौड़ पड़ा।
अखाड़े का गेट बंद था, पर मैंने देखा — गेट के बाहर लुट्टन खड़ा था। वो अकेला था। उसका चेहरा पीला पड़ा था, होंठ सूखे हुए।
मैं उसके पास पहुँचा। मेरी साँस फूल रही थी।
"मेरी माँ कहाँ है?" मैंने कहा।
लुट्टन ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो डर था जो कल नहीं था। वो कुछ देर चुप रहा, फिर धीरे से बोला, "वो अंदर नहीं है।"
मेरा हाथ अपने आप उसके कॉलर तक पहुँच गया। "कहाँ है?"
लुट्टन ने मेरा हाथ नहीं छुड़ाया। "भैरव उसे कहीं और ले गया है।"
"कहाँ?"
"मुझे नहीं पता," लुट्टन ने कहा। "मैं सुबह आया तो वो यहाँ थी। पर भैरव ने उसे देखते ही कहा — 'इसे यहाँ नहीं रखना। ये औरत यहाँ रही तो पूरा अखाड़ा जल जाएगा।' और फिर वो उसे लेकर चला गया।"
"किस तरफ़?"
लुट्टन ने अपना सिर हिलाया। "मैंने दौड़कर पीछे जाने की कोशिश की, पर दरवाज़े पर उसके दो आदमी खड़े थे। उन्होंने मुझे धकेल दिया।"
मैंने उसे छोड़ दिया। मैं गेट की तरफ़ बढ़ा, पर लुट्टन ने मेरा हाथ पकड़ लिया।
"सुन," उसने कहा। उसकी आवाज़ बदल गई थी। "भैरव ने आज सुबह मुझे भी नहीं बताया कि वो कहाँ जा रहा है। ये पहली बार है। वो जानता है कि मैं तेरी तरफ़ हो गया हूँ।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसका हाथ काँप रहा था। वो उस ज़हर से अभी पूरा ठीक नहीं हुआ था — मीरा ने बताया था कि उसे आराम चाहिए।
"तू यहाँ क्यों खड़ा है?" मैंने पूछा।
"क्योंकि मुझे लगा तू आएगा," लुट्टन ने कहा। "और मुझे तुझसे एक बात कहनी थी।"
"क्या?"
"जब भैरव तेरी माँ को लेकर जा रहा था, तो तेरी माँ ने उसके मुँह पर थूक दिया।" लुट्टन की आवाज़ धीमी थी। "और कहा — 'तू मेरे बेटे को नहीं जानता। वो तेरे ज़हर से नहीं, अपनी माँ के आशीर्वाद से लड़ेगा।'"
मेरी आँखें भर आईं।
मैंने लुट्टन के कंधे पर हाथ रखा। "तू अंदर जा। मीरा को बता। रणवीर सिंह को बता।"
"और तू?"
मैंने पीछे मुड़कर अखाड़े की दीवार देखी। वो ऊँची थी, मिट्टी की, पुरानी। और उसके पीछे कुआँ था — जहाँ से तहखाने तक रास्ता जाता था।
"मैं जानता हूँ वो कहाँ होगा," मैंने कहा।
लुट्टन ने मेरी तरफ़ देखा। "कहाँ?"
"तहखाना," मैंने कहा। "जहाँ उसने मेरे पापा को गाड़ा था। जहाँ उसने सबसे बड़ा राज़ छिपाया है। वो माँ को वहीं रखेगा — क्योंकि वो जानता है कि अगर मैं वहाँ पहुँचा, तो मुझे अपना सबसे बड़ा डर झेलना पड़ेगा।"
लुट्टन ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में कुछ था — शायद पहली बार शर्म।
"मैं तेरे साथ चलूँ?" उसने पूछा।
मैंने उसकी तरफ़ देखा। यही आदमी कल तक मुझे धमकाता था। आज वो साथ चलने की बात कह रहा था।
"नहीं," मैंने कहा। "तू मीरा के पास जा। उसे बता कि माँ तहखाने में है। अगर मैं वक़्त पर न लौटूँ, तो वो पंचायत को सीधे तहखाने ले आए।"
लुट्टन ने सिर हिलाया।
मैं पलटा और दीवार के पीछे की तरफ़ बढ़ा। मेरे पीछे लुट्टन की आवाज़ आई — "वीर!"
मैं रुका।
"तेरी माँ ठीक है," उसने कहा। "मैंने उसे देखा था जाते वक़्त। वो डर नहीं रही थी। वो… वो जैसे किसी चीज़ का इंतज़ार कर रही थी।"
मैंने कुछ नहीं कहा। मैं आगे बढ़ता गया।
नीम के पेड़ के पास पहुँचा। वहीं वो पुराना रास्ता था जो कालू काका ने दिखाया था। मैंने झाड़ियों को हटाया। ज़मीन पर पत्थरों का ढेर था। मैंने एक-एक करके पत्थर हटाए।
और तभी मुझे पीछे से आवाज़ आई।
"मैं जानता था तू यहीं आएगा।"
मैं पलटा।
भैरव सिंह खड़ा था। अकेला। उसके हाथ में कुछ नहीं था। पर उसकी आँखें — वो आँखें जो हमेशा ठंडी थीं — आज उनमें कुछ और था। थकान।
"मेरी माँ कहाँ है?" मैंने कहा।
भैरव ने अपनी मूँछों पर हाथ फेरा। "वो सुरक्षित है। मैंने उसे कुछ नहीं किया।"
"क्यों लाया उसे?"
"क्योंकि वो मेरे पास सबूत लेकर आई थी," भैरव ने कहा। "वो ढक्कन। मैंने सोचा था वो जल गया। पर तेरी माँ ने उसे बचा लिया। बीस साल तक।"
वो कुछ देर चुप रहा। फिर बोला, "तू जानता है, तेरी माँ सबसे पहले मेरे पास आई थी? जब तेरे पापा मरे थे। उसने कहा था — 'मैं जानती हूँ तूने किया है। और मैं तुझे बर्बाद करूँगी।' मैंने उसे डराया। धमकाया। पर वो नहीं डरी।"
मेरे हाथ मुट्ठी में बंध गए।
"आज मैंने उसे अपने सामने बैठाया," भैरव ने कहा, "और पूछा — 'अब क्यों नहीं डरती?' तो उसने कहा…"
वो रुका।
"क्या कहा?" मैंने पूछा।
"उसने कहा — 'क्योंकि अब मेरा बेटा बड़ा हो गया है।'" भैरव ने मेरी तरफ़ देखा। "और मैं तुझे बताता हूँ, वीर — तेरी माँ की आँखों में जो था, वो मैंने बीस साल में किसी में नहीं देखा।"
मैंने अपनी साँस रोकी।
"तो अब क्या?" मैंने कहा। "तू मुझे डराने आया है? या माँ को छोड़ने की शर्त बताने?"
भैरव हँसा। पर वो हँसी नहीं थी। "शर्त नहीं। मैं तुझे एक बात बताने आया हूँ। आज अखाड़े में जो होगा, वो कुश्ती नहीं होगी। वो फ़ैसला होगा।"
"मुझे पता है," मैंने कहा।
"नहीं, तुझे नहीं पता," भैरव ने कहा। उसने अपनी धोती से कुछ निकाला। एक छोटी, लाल रंग की पोटली। "ये तेरी माँ ने मुझे दी थी। जब वो मेरे पास आई थी।"
मैंने पोटली ली। खोली। अंदर सूखी हल्दी, थोड़ी काली मिर्च, और एक लाल धागा था — वही धागा जो गुड़िया ने सुबह मेरी कलाई पर बाँधा था।
मेरा गला भर आया।
"वो चाहती थी कि मैं ये तुझे दूँ," भैरव ने कहा। "उसने कहा — 'मेरा बेटा लड़ेगा, और तू उसे जीतने देगा।'"
"और तू?" मैंने पूछा। "तू क्यों दे रहा है मुझे ये?"
भैरव ने कुछ देर मेरी तरफ़ देखा। फिर उसने कहा, "क्योंकि मैं थक गया हूँ, वीर। बीस साल हो गए। हर रोज़ वही ढक्कन। वही बोतलें। वही आदमी। और आज तेरी माँ ने मुझे एक बात कही जो मैं भूल नहीं पा रहा।"
"क्या कही?"
"उसने कहा — 'तेरे पापा ने भी तुझे इसी तरह ज़हर दिया था, मोहन। और तू भी वहीं पहुँचेगा।'"
भैरव का चेहरा सफ़ेद पड़ गया। जैसे किसी ने उसका नाम — असली नाम — उसकी आँखों के सामने रख दिया हो।
"वो जानती थी?" उसने धीरे से पूछा।
"मेरी माँ सब जानती है," मैंने कहा। "बस बोलती नहीं।"
भैरव ने अपनी आँखें बंद कीं। कुछ देर वो वहीं खड़ा रहा। फिर उसने अपनी आँखें खोलीं और कहा, "तेरी माँ अखाड़े के पीछे वाले कमरे में है। तीन आदमी पहरा दे रहे हैं। पर वो अंदर से ताला लगाकर बैठी है — मैंने उसे बंद करते वक़्त देखा।"
"तूने उसे बंद क्यों नहीं किया?"
"क्योंकि मैं नहीं चाहता था कि वो आज मर जाए," भैरव ने कहा। "मैं चाहता हूँ कि वो देखे — मैं जीतता हूँ या हारता हूँ।"
वो पलटा। कुछ क़दम चला। फिर रुका।
"वीर," उसने पीछे मुड़कर कहा, "आज मुकाबले में मैं हारूँगा।"
मैं चौंका।
"क्या?"
"मैं जानता हूँ तू जीतेगा," भैरव ने कहा। "पर मैं तुझे हराने के लिए नहीं लड़ूँगा। मैं अपने आप को हराने के लिए लड़ूँगा।"
वो चला गया। उसकी धोती मिट्टी में घसीटती रही।
मैं वहीं खड़ा रह गया। हाथ में लाल पोटली।
और मैंने पहली बार सोचा — शायद सबसे बड़ा ज़हर वो नहीं जो बोतल में था। ज़हर वो था जो बीस साल से एक आदमी के अंदर भरा हुआ था।
मैंने पोटली अपने सीने से लगाई। फिर पत्थर हटाए। रास्ता खुला।
मैं अंदर उतरा। सीढ़ियाँ पुरानी थीं, पर पत्थरों के बीच से रोशनी आ रही थी। मैं नीचे गया।
तहखाने का दरवाज़ा खुला था।
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