Spirit of a Fighter – Chapter 44
मैंने गहरी साँस ली। मेरी नाक के अंदर एक तेज़ चुभन हुई। जली हुई लकड़ी, गरम लोहा, और कुछ और… कुछ मीठा-सा, जैसे गुड़ जल रहा हो। ये कोई आम आग नहीं थी। यहाँ कुछ ऐसा जलाया गया था जो मिट्टी में मिला हुआ था। भैरव कुछ मिटा रहा था। कुछ ऐसा जो उसके खिलाफ़ बोल सकता था।
"देख लिया?"
मैंने पलटकर देखा। कालू काका हाथ में लालटेन लिए खड़े थे। उस पुरानी लालटेन की रोशनी में उनका चेहरा और भी झुर्रीदार लग रहा था, जैसे मिट्टी की दीवार पर बारिश की लकीरें पड़ गई हों।
"काका, उसने कुछ जलाया है," मैंने कहा। "नीचे से गंध आ रही है।"
कालू काका ने लालटेन को कुएँ के मुँह के ऊपर लटकाया। पीली रोशनी अंधेरे में नीचे गई, पर सिर्फ़ दो हाथ तक दिखा। उसके बाद सब काला।
"वो जला नहीं रहा," उन्होंने धीरे से कहा। "वो तहखाने का रास्ता जला रहा है। मिट्टी में जो काग़ज़ दबे थे, जो निशान दबे थे — सब राख कर रहा है।"
मेरा सीना जकड़ गया। "तो फिर सबूत—"
"सबूत मिट्टी में नहीं रहते, बेटा," उन्होंने कहा, और मेरी तरफ़ पलट गए। "सबूत आदमी में रहते हैं। जिसने देखा है, उसकी आँख में। जिसने सुना है, उसके कान में। जिसने सहा है, उसके घाव में।"
उन्होंने लालटेन मेरी तरफ़ बढ़ाई। "अब वक़्त आ गया। मेरे पीछे आ।"
वो अखाड़े की दीवार के साथ-साथ चलने लगे। मैं पीछे-पीछे। उनकी कमर झुकी हुई थी, एक हाथ में लालटेन और दूसरा हाथ दीवार पर टिकाया हुआ। कभी-कभी वो रुकते और दीवार के पत्थर को छूते, जैसे कोई पुराना दोस्त पहचान रहे हों।
हम अखाड़े के पीछे पहुँचे। यहाँ दीवार नीची थी, पत्थर ज़्यादा मोटे और जगह-जगह काई लगी थी। सामने पुराना नीम का पेड़ था — इतना बड़ा कि उसकी जड़ें दीवार के नीचे से घुसकर अंदर तक गई थीं। पेड़ के ठीक पीछे, झाड़ियों के बीच, एक चौकोर पत्थर पड़ा था। उस पर बेलें चढ़ी हुई थीं, और बीच से घास उग आई थी।
कालू काका रुके। उन्होंने लालटेन मुझे पकड़ाई, फिर अपनी धोती का पल्ला कमर में खोंसा और दोनों हाथों से बेलें खींचने लगे।
"ये पत्थर देख रहा है?" उन्होंने ज़ोर लगाते हुए कहा। "इसे पाँच सौ साल पुराना कहते हैं। जब यहाँ कोई अखाड़ा नहीं था, तब यहाँ साधु आते थे। वो इसी पत्थर से नीचे जाते थे।"
"साधु?" मैंने पूछा।
"उस ज़माने में जो लड़ना सीखना चाहता था, वो पहले इसी गुफा में बैठता था। यहाँ की मिट्टी में इतनी ताकत है कि आज भी अगर कोई साफ़ मन से इस पर लेटे, तो उसका सारा थकान, सारा डर, सारा ज़हर इसके अंदर खिंच जाता है।" उन्होंने बेलों का एक मोटा गुच्छा तोड़कर फेंका। "पर सिर्फ़ साफ़ मन वाले का। लालची आदमी के लिए ये सिर्फ़ मिट्टी है। पत्थर है।"
पत्थर अब आधा खुल गया था। उसके नीचे एक काला छेद दिख रहा था। ठंडी हवा ऊपर आ रही थी, और उसके साथ एक गंध भी — गीली मिट्टी की, पुरानी मिट्टी की। ऐसी गंध जो सालों से बंद कमरे में पड़ी हो।
"मुझे नीचे जाना है?" मैंने पूछा। मेरी आवाज़ सूखी थी।
कालू काका मेरी तरफ़ पलटे। लालटेन की रोशनी उनके चेहरे पर पड़ी। और तब मुझे कुछ दिखा जो मैंने पहले कभी उनके चेहरे पर नहीं देखा था। उनकी आँखें भरी हुई थीं। बूढ़ी आँखें, जिनमें बीस साल का सन्नाटा बैठा था।
"मैं तुझे एक बात बताने आया हूँ," उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ धीमी थी, काँप रही थी। "बीस साल से ये बात मेरे अंदर घूम रही है। रात को सोते वक़्त, दिन में मिट्टी सींचते वक़्त, हर वक़्त। और आज तेरी आँखें देखकर लगता है कि ये बात कहने का वक़्त आ गया।"
वो पत्थर के किनारे पर बैठ गए। हड्डियाँ चटकीं। उन्होंने लालटेन अपने पैरों के बीच रखी और दोनों हाथ घुटनों पर टिका लिए।
"बीस साल पहले," उन्होंने शुरू किया, "मैं इसी अखाड़े में मज़दूरी करता था। रघुवीर सिंह तब सबसे बड़ा पहलवान था। और भैरव सिर्फ़ एक नया मैनेजर था। नया-नया आया था — शहर से। पढ़ा-लिखा, बोलने में मीठा, काम में तेज़। रणवीर सिंह ने उसे अपना दाहिना हाथ बनाया था।"
मैं खड़ा सुन रहा था। मेरी नाक में अब भी जली हुई मिट्टी की गंध थी, पर मैं सब भूलकर उनकी बात सुन रहा था।
"एक रात," कालू काका ने आगे कहा, "मैं यहाँ से गुज़र रहा था। तब ये जगह ऐसी नहीं थी। ये झाड़ियाँ नहीं थीं। यहाँ सिर्फ़ ये पत्थर था, और उसके नीचे से रोशनी निकलती दिख रही थी।" उन्होंने लालटेन की तरफ़ देखा। "मैं रुका। झुककर देखा। पत्थर सरका हुआ था। और नीचे, उन सीढ़ियों पर — भैरव खड़ा था। हाथ में एक मटका था। वो उस मटके से कुछ नीचे डाल रहा था।"
"क्या डाल रहा था?" मैंने पूछा।
"मुझे तब नहीं पता था," कालू काका ने कहा। "अब पता है। वो तहखाने की मिट्टी में ज़हर मिला रहा था।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "रघुवीर सिंह को हराने का यही तरीका था। ज़हर पानी में डालता तो कोई सूंघ लेता। ज़हर मिट्टी में डाला तो किसी को पता भी नहीं चलता। उस रात मैंने देखा, पर मैं चुप रहा। मैं डर गया था, बेटा।"
उनकी आवाज़ रुक गई। उन्होंने आँखें नीची कर लीं।
"और अगली सुबह," वो फिर बोले, "रघुवीर सिंह कुएँ में मरा मिला। सबने कहा — हाथ फिसला, गिर गया। किसी ने सवाल नहीं पूछा। और मैं"— उन्होंने अपनी छाती पर हाथ रखा — "मैं चुप रहा। रोज़ सुबह उस कुएँ के पास से गुज़रता था, मिट्टी सींचता था, और मेरा दिल कहता था — तूने देखा था, तूने देखा था। पर मैंने अपना दिल दबा दिया।"
मैं उनके सामने बैठ गया। मेरे घुटने काँप रहे थे।
"काका—"
"आज तक डरा हूँ," उन्होंने मेरी बात काटकर कहा। उनकी आँखें अब सूखी थीं, पर उनमें एक दर्द था जो बीस साल पुराना था। "हर रात सोचता हूँ — अगर उस रात मैंने आवाज़ दी होती, तो कितने पहलवान बच जाते? ग्यारह? बारह? कितनी माँ अपने बेटों को ज़िंदा देखतीं?"
उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा। उनकी हथेली खुरदरी थी, मिट्टी से भरी, पर उसमें गरमी थी।
"मैंने सोचा था मर जाऊँगा, तो ये बात मेरे साथ चली जाएगी," उन्होंने कहा। "पर आज तुझे देखकर लगता है कि मेरा डर खत्म होने का वक़्त आ गया है। तू वही नहीं है जो रघुवीर था। तू उससे भी कुछ है। तेरी नाक में वो बात है जो रघुवीर की नाक में नहीं थी।" उन्होंने मेरे कंधे को कसकर पकड़ा। "इसलिए मेरी बात मान। तहखाने की मिट्टी में ताकत है — बहुत ताकत। पर उस ताकत को छूने से पहले अपना मन साफ़ करना। क्योंकि जो मन अंदर से गंदा है, उसे वो मिट्टी और गंदा कर देगी। और जो मन साफ़ है, उसके अंदर से सारा ज़हर खींच लेगी।"
मैंने उनकी आँखों में देखा। उनकी उम्र के सौ साल के झुर्रियों में बीस साल का पछतावा भरा था। और मुझे पता चला कि आज रात मैं सिर्फ़ तहखाने में नहीं जा रहा। मैं किसी की बीस साल की चुप्पी का बोझ भी उठा रहा था।
"काका," मैंने कहा, "आप मेरे साथ चलिए।"
उन्होंने सिर हिलाया। "चलूँगा। पर सिर्फ़ नीचे तक। आगे तुझे अकेले जाना होगा। क्योंकि मेरा काम अब यहीं खत्म होता है — मुझे रास्ता दिखाना था, जिसे तू जाएगा।"
वो उठे। पत्थर हटाया। नीचे अंधेरा था, पर जैसे-जैसे हम उतरने लगे, मुझे एक और गंध पकड़ में आई। मीठी। कुछ जल रहा था। तहखाने के अंदर।
"रुकिए," मैंने कालू काका का हाथ पकड़ा। "वो अंदर है। भैरव।"
कालू काका रुके। उन्होंने सिर ऊपर किया, जैसे सुन रहे हों।
"दो आदमी हैं," उन्होंने धीरे से कहा। "एक भारी — भैरव। एक हल्का — कोई और। जूतों की आवाज़ सुन।"
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