Spirit of a Fighter43 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 43

7 min read November 5, 2026

"अरे मैंने तो सुना है," वो बोलीं, और मेरे पास आकर रुकीं, "कि भैरव ने कुएँ की सीढ़ियाँ तुड़वा दी हैं। कल रात मज़दूर लाए थे। हथौड़े से।"

मेरे पैरों तले की ज़मीन खिसक गई।

"क्या?" मैंने कहा।

"हाँ, हाँ।" सुक्खी बुआ ने हाथ से हवा में चक्कर बनाया। "कहते हैं कुएँ के ढक्कन के नीचे कोई चीज़ है जो भैरव को पसंद नहीं। तो उसने सीढ़ियाँ तुड़वा दीं, और ऊपर से पत्थर।"

मैंने दीवार पकड़ी। मेरे हाथ में मिट्टी आई। तीन दिन बंद। और कुएँ की सीढ़ियाँ टूटी हुईं।

भैरव ने मुझे खेलने की जगह से ही बाहर कर दिया था।

मैं उलटा पलटा। माँ और मीरा पीछे दूर खड़ी थीं। मैंने उनकी तरफ़ देखा। माँ ने मेरी आँखें देखकर मेरा चेहरा पढ़ लिया। उन्होंने कुछ नहीं कहा, पर उनका हाथ अपने पेट पर चला गया, जैसे अंदर कुछ टूटा हो।

मीरा कुछ कहने के लिए आगे बढ़ी, पर मैंने हाथ उठाकर रोक दिया।

"नहीं," मैंने कहा। "ये मेरी लड़ाई है।"

मैं गेट की तरफ़ गया, ताले को हाथ लगाया। ठंडा था। नया ताला। चमकदार। भैरव ने कल रात ही लगवाया था।

मैंने काग़ज़ फाड़ा — वो नोटिस। फाड़कर ज़मीन पर फेंका।

सुक्खी बुआ ने मुँह पर हाथ रखा। "अरे, तूने—"

"बुआ," मैंने कहा, "अखाड़ा तीन दिन बंद है। पर भैरव का राज़ कब तक बंद रहेगा?"

मुझे नहीं पता था कि मैं वो क्यों कह रहा था। शायद गुस्से में। शायद डर में। पर जैसे ही वो शब्द निकले, अंदर की दीवार से एक आवाज़ आई।

मैंने दीवार के छेद से अंदर देखा।

भैरव खड़ा था। वो अभी आया था। उसने हमारी बात सुनी थी। उसकी आँखें सीधी मेरी आँखों से मिलीं। उसके चेहरे पर मुस्कान थी, पर वो मुस्कान नहीं थी। वो एक आदमी का चेहरा था जो तय कर रहा हो कि पहले किसकी टांग तोड़े।

वो धीरे-धीरे दीवार के पास आया। मेरे और उसके बीच सिर्फ़ एक दीवार थी, जिसमें छेद था।

"वीर सिंह," उसने मीठी आवाज़ में कहा। "तीन दिन बाद अखाड़ा खुलेगा। और तीन दिन बाद मैं तुझसे लड़ूँगा।" वो रुका। फिर बोला, "पर उससे पहले, तीन दिन में, तू अपनी माँ को खो देगा।"

मेरी साँस रुक गई।

"क्या कहा?"

"जो लड़की तेरे साथ खड़ी है," भैरव ने धीरे से कहा, "उसके बाप को मैंने बीस साल पाला है। उसके बाप की दवा मेरे हाथ में है। और तू — तू अपनी माँ को साथ लाया है।" उसने मुस्कुराकर कहा, "अब तीन दिन में मैं देखूँगा कि तू पहले अपनी माँ को बचाता है या अपनी लड़की को।"

मैंने दीवार पर हाथ रखा। मेरी उँगलियाँ काँप रही थीं।

"तू जो करेगा," मैंने कहा, "वो मुझे पता है।"

"अच्छा?" उसने कहा। "तो बता।"

"तू मेरी माँ या मीरा को नहीं छूएगा," मैंने कहा। "क्योंकि तू जानता है कि अगर तूने छुआ, तो मैं तेरी अलमारी खोल दूँगा। और उस अलमारी में वो काग़ज़ है जिसे तू खुद नहीं पढ़ पाया।"

भैरव की मुस्कान गायब हो गई। उसकी आँखें ठंडी हो गईं। वो दीवार के पास और आया। उसकी साँस की गंध मेरी नाक में आई — तेल, गुड़, और उसके पीछे कुछ और। कुछ पुराना। कुछ जला हुआ।

"तू जानता है क्या?" उसने धीरे से कहा। "उस काग़ज़ में?"

मैंने उसकी आँखों में देखा।

"मुझे पता है इसमें क्या लिखा है," मैंने कहा। "और मुझे पता है कि उसमें क्या छुपाया गया है।"

मैं झूठ बोल रहा था। मुझे सिर्फ़ इतना पता था जो माँ ने बताया था। पर मेरी आवाज़ में वो यकीन था जो झूठ में भी सच जैसा लगता है।

भैरव ने मेरी आँखों में देर तक देखा। फिर वो पीछे हटा।

"तीन दिन," उसने कहा। "तीन दिन में तेरे पास दो रास्ते हैं। या तू मेरे पास आकर उस काग़ज़ का राज़ पूछे, या तू मेरे खिलाफ़ अपना राज़ खोजे।" वो मुड़ा। "पर याद रख — तीन दिन बाद जब अखाड़ा खुलेगा, तो एक ही आदमी खड़ा होगा। और वो तू नहीं होगा।"

वो चला गया। उसके कदमों की आवाज़ दूर होती गई।

मैं दीवार से चिपका खड़ा रहा। मेरे हाथ अब भी काँप रहे थे। पीछे से माँ आईं और मेरा कंधा पकड़ा।

"क्या कहा उसने?" उन्होंने पूछा।

मैंने उनकी तरफ़ देखा। माँ का चेहरा शांत था। बहुत शांत। जैसे उन्होंने सब सुन लिया हो।

"उसने कहा," मैंने धीरे से शुरू किया, "कि तीन दिन बाद एक ही आदमी खड़ा होगा।"

माँ ने मेरा चेहरा दोनों हाथों में पकड़ा। उनकी हथेलियाँ ठंडी थीं, पर उनकी आँखें गरम।

"तो तू उस एक आदमी को बदल दे," उन्होंने कहा। "उस भैरव को नहीं — उस एक आदमी को। जो खड़ा हो, वो तू हो।"

मीरा पास आई। उसने मेरी कलाई पकड़ी, जहाँ लाल धागा बंधा था। उसने धागे को छुआ और कहा, "वो मेरे पापा को धमकाएगा। मुझे पता है। पर पापा अब डरते नहीं।" उसने मेरी आँखों में देखा। "और मैं भी नहीं डरती।"

मैंने उसका हाथ पकड़ा। मेरी उँगलियाँ अब भी काँप रही थीं, पर उसके हाथ में आकर रुक गईं।

"तीन दिन," मैंने कहा। "हमें तीन दिन चाहिए।"

"तीन दिन नहीं," कालू काका की आवाज़ आई। वो दीवार के उस पार से आई, गेट के पास के छेद से। मैंने झाँका। कालू काका दीवार से चिपके खड़े थे, उनके हाथ मिट्टी से भरे थे।

"तीन दिन नहीं, बेटा," उन्होंने धीरे से कहा। "तीन रात। भैरव दिन में अखाड़ा बंद रखेगा, पर रात में वो कुएँ के पास जाएगा। सीढ़ियाँ टूटी हैं, पर वो जानता है दूसरा रास्ता। उसी रास्ते से वो तहखाने तक पहुँचता है। और तीन रात में वो तहखाने की मिट्टी उठाकर अपने पास रख लेगा।"

"तो फिर?" मैंने कहा।

कालू काका ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें आज अलग थीं — डर नहीं, कुछ और। जैसे बीस साल का सन्नाटा टूट रहा हो।

"तो फिर," उन्होंने कहा, "तेरे पास एक रास्ता है। वही जो तू पहले जानता था। कुएँ की सीढ़ियाँ टूटी हैं, पर कुएँ के पीछे एक और रास्ता है। जो सिर्फ़ उन्हें पता है जो अखाड़े की मिट्टी में पले हैं।" उन्होंने अपना हाथ दीवार पर रखा। "मैं तुझे रास्ता दिखाऊँगा। पर शर्त है — तू मेरे साथ चलेगा, और मेरी बात मानेगा।"

मैंने माँ की तरफ़ देखा। माँ ने सिर हिलाया।

"जा," उन्होंने कहा। "पर तीन रात में लौट आ। वरना मैं खुद अंदर आऊँगी।"

मैंने हामी भरी।

कालू काका ने मिट्टी से भरे हाथ दीवार से हटाए और मुझे इशारा किया। "आज रात," उन्होंने धीरे से कहा, "कुएँ के पीछे। जहाँ पुराना नीम है। वहाँ मिल।"

उनकी आवाज़ में कुछ था जो मुझे कुश्ती से ज़्यादा डरा रहा था। जैसे वो मुझे रास्ता नहीं, कोई ज़िम्मेदारी दे रहे हों।

मैंने मिट्टी को मुट्ठी में भरा। वो अब भी गरम थी। जैसे किसी ने अभी छोड़ी हो।

और मेरे मन में एक ही बात घूम रही थी — भैरव ने कहा कि तीन दिन में मैं अपनी माँ को खो दूँगा। या मीरा को।

पर वो ये भूल गया कि जिसके पास माँ की दुआ हो और मिट्टी की गंध हो, वो कोई एक नहीं खोता।

वो सिर्फ़ एक चीज़ खोता है — डर।

और मैं वो डर आज रात कुएँ के पीछे छोड़ आऊँगा।

॥

रात के तीसरे पहर की हवा में एक अलग ही बदबू थी। जली हुई मिट्टी की। मैं दौड़ते हुए कुएँ की तरफ़ बढ़ रहा था, पैरों के नीचे सूखी पत्तियाँ चटक रही थीं। पीछे माँ की आवाज़ आई थी — "संभलकर जा" — पर मैंने पलटकर नहीं देखा। डर था कि पलटकर देखा तो लौटने का मन कर जाएगा।

कुएँ के पास पहुँचा तो मेरे पैर अपने आप रुक गए।

सीढ़ियाँ सच में टूटी पड़ी थीं। पत्थर नीचे बिखरे थे। ढक्कन एक तरफ़ सरका हुआ था, और उसकी जगह पर कुछ काला पड़ा था। मैंने झुककर देखा — कोयला। कोई जल्दी में चला गया था।

और फिर वो गंध आई।

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