Spirit of a Fighter – Chapter 42
रणवीर सिंह ने उसकी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में वो चीज़ थी जो बीस साल से दबी हुई थी — एक गुस्सा, जो अब सिर्फ़ थकान बनकर बहता था।
"मैंने तुझे बचाने के लिए चुप्पी चुनी थी," उन्होंने कहा। "सोचा, जो मैं नहीं बोलूँगा, वो तुझ तक नहीं पहुँचेगा। पर शायद…" उन्होंने साँस भरी, जो सीने में अटक गई, "…शायद मैंने तुझे सच से दूर कर दिया।"
मीरा ने उनका हाथ पकड़ा। उनकी हथेली ठंडी थी, जैसे कोई पुराना बर्तन।
"तो अब मत करो," उसने कहा। "अब मुझे सच से दूर मत करो।"
रणवीर सिंह ने उसका सिर सहलाया। उनकी उँगलियाँ काँप रही थीं। उन्होंने कहा, "तू मेरी बेटा है, बेटी नहीं।"
मीरा ने उनके हाथ को चूमा। उसकी आँखों से पानी बह रहा था, पर वो रोई नहीं। उसने पानी पोंछा और सीधी होकर बैठ गई।
"तो फिर मेरे साथ खड़े हो," उसने कहा।
रणवीर सिंह ने उसकी आँखों में देखा। बहुत देर। फिर सिर हिलाया। हल्का-सा। पर वो हिला ज़रूर।
"कल सुबह," उन्होंने कहा, "मुझे अखाड़े ले चल।"
मीरा चौंकी। "तुम्हारी हालत—"
"मेरी हालत बीस साल से खराब है," उन्होंने कहा। "आज एक दिन और सह लूँगा।" उन्होंने पर्ची की तरफ़ इशारा किया। "और वो काग़ज़ — जो तेरे हाथ लगा है — उसे मेरी तरफ़ से रख ले। जो आदमी मेरी दवा में भैरव का नाम लिखता है, वो मेरी मौत का भी हिसाब रखता है।"
मीरा ने पर्ची को सँभालकर अपने बैग में रखा। उसने कुछ और पूछना चाहा, पर पिता ने आँखें बंद कर लीं। थकान उनके चेहरे पर साफ़ दिख रही थी। मीरा उठी, दवा की शीशियाँ ठीक कीं, लैंप धीमा किया, और कमरे से बाहर आ गई।
बाहर बरामदे में उसने एक गहरी साँस ली। हवा में रात की ठंडक थी और दूर कहीं से कुत्ते के रोने की आवाज़ आ रही थी।
उसने अपने फ़ोन से वीर का नंबर निकाला — नहीं, वीर के पास फ़ोन कहाँ है। उसने सोचा, कल सुबह उससे मिलेगी। और उसे सब बताएगी।
उसने बैग से एक छोटा काग़ज़ निकाला और उस पर एक लाइन लिखी — "कल सुबह, अखाड़े के बाहर, पीपल के नीचे। सब बताना है।" फिर उसने सोचा, कैसे भेजे? टिंकू के हाथ? हाँ, टिंकू भेज देगा।
उसने काग़ज़ मोड़कर जेब में रखा।
वहीं, हमारे घर में, मैं सो नहीं रहा था। मैं आँगन में लेटा था, आँखें खुली, आसमान में देख रहा था। मन में सिर्फ़ एक बात घूम रही थी — कल सुबह। भैरव। अलमारी। पीला काग़ज़।
माँ ने कहा था — मिट्टी में डाला ज़हर पानी से दस गुना ज़हरीला।
मुझे समझ नहीं आ रहा था कि भैरव ऐसा क्यों करेगा। वो खुद मिट्टी में ज़हर डालेगा, तो अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारेगा। फिर याद आया — भैरव ने तो पहले ही नई मिट्टी मँगवा दी थी। ऊपर की परत। वो जानता है कि अगर मिट्टी में ज़हर डाला, तो सबसे पहले पुरानी मिट्टी मरेगी। रघुवीर की मिट्टी। जिस पर मेरा हक़ था।
वो मेरी जड़ खत्म करना चाहता था।
रात के तीसरे पहर मुझे नींद आ गई। सपने में कोई मेरे कान में कह रहा था — "जड़ काटेगा, तो पेड़ गिरेगा। पर तू पेड़ नहीं है। तू बीज है।"
सुबह मैं उठा, तो सूरज निकल चुका था। गुड़िया मेरे सिरहाने बैठी थी, कॉपी खोले। उसने कहा, "भैया, उठ। माँ ने नहाया है, तैयार है।"
मैं एक झटके में उठ बैठा। "कहाँ?"
"तेरे साथ चलने को।" गुड़िया ने कॉपी बंद की। "उन्होंने साड़ी निकाली है। वो साड़ी जो शादी में पहनी थी।"
मैं जल्दी से उठा। आँगन में माँ खड़ी थीं। साड़ी पहनी हुई, माथे पर हल्दी का टीका, चोटी में तेल। वो आज किसी और जैसी लग रही थीं। जैसे उन्होंने बीस साल का ग़ुस्सा आज साड़ी की सिलवटों में छुपा दिया हो।
"चल," उन्होंने कहा। "पहले उससे मिलते हैं।"
मैंने पापा की धोती नहीं पहनी। सादा कुर्ता पहना। गुड़िया ने लाल धागा मेरी कलाई पर कसकर बाँधा — फिर से।
"आज भी?" मैंने कहा।
"रोज़ बाँधूँगी," वो बोली। "जब तक तू नहीं जीतता।"
हम निकले। रास्ते में माँ ने कुछ नहीं कहा। बस चलती रहीं। मैं उनके पीछे-पीछे। ये पहला मौका था जब मैं उन्हें घर से इतनी दूर चलते देख रहा था। गाँव वाले दरवाज़ों से झाँक रहे थे। सुक्खी बुआ ने दूर से ही आवाज़ दी, "अरे सरस्वती! आज कहाँ?" माँ ने कोई जवाब नहीं दिया। बस चलती रहीं।
अखाड़े के बाहर पीपल का पेड़ था। मैंने वहाँ आकर आँखें घुमाईं। दूर से एक कुर्ता-सलवार दिखा। मीरा आ रही थी, बैग कंधे पर, हाथ में एक और शीशी, और कुछ काग़ज़।
वो पास आई और माँ को देखकर ठिठक गई।
"माँ," मैंने कहा, "ये मीरा है।"
मीरा ने हाथ जोड़े। "नमस्ते माँ जी।"
माँ ने उसे ऊपर से नीचे देखा। देर तक। मीरा ने नज़र नहीं चुराई। सीधी खड़ी रही। माँ ने उसके कपड़े देखे, उसके चेहरे पर आई थकान देखी, और उसके बैग से झाँकती दवाइयाँ देखीं।
फिर माँ ने उसका हाथ पकड़ा। मीरा चौंकी, पर हाथ खींचा नहीं।
माँ ने उसकी हथेली बनाई, उसमें देखा। फिर बोलीं, "तेरे हाथों में औषधि की गंध है।"
मीरा ने धीरे से कहा, "हाँ। पढ़ाई करती हूँ।"
"अच्छा करती है।" माँ ने उसका हाथ छोड़ा। "जो हाथ दवा बनाते हैं, वो हाथ किसी का घर नहीं तोड़ते।" फिर उन्होंने मेरी तरफ़ देखा और कहा, "तेरी नाक तेज़ है, बेटा। पर तेरे साथ चलने वाले की नाक में माँ की गंध आनी चाहिए। ये लड़की तेरे लिए अच्छी है।"
मैं सन्न रह गया। मीरा की आँखें भर आईं। उसने जल्दी से पलकें झुकाईं और धीरे से बोली, "थैंक्यू, माँ जी।"
माँ ने सिर हिलाया। फिर उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
"अब तू जा।" उन्होंने कहा। "अखाड़े में। मैं यहीं रहूँगी।" फिर वो मीरा की तरफ़ मुड़ीं। "और तू भी। दोनों बाहर खड़े नहीं रहना।"
मीरा ने अपना बैग खोला और एक पुरानी पर्ची निकाली। "माँ जी," उसने कहा, "ये पापा की दवा की पर्ची है। इस पर भैरव का नाम लिखा है। मुझे लगता है कि भैरव ही पापा की बीमारी की जड़ है।"
माँ ने पर्ची देखी। उनके चेहरे पर कोई हैरानी नहीं थी। सिर्फ़ एक पुरानी थकान। "मुझे पता था," उन्होंने कहा। "जिस दिन तेरे पापा की कुर्सी आई थी, मैंने रघुवीर की आँखों में देखा था। वही आँखें मैंने तेरे पापा की आँखों में देखीं। दोनों आदमियों को एक ही आदमी ने बैठाया था।"
मीरा ने धीरे से कहा, "तो अब हम दोनों को साथ चलना है।"
माँ ने उसका हाथ थामा। इस बार नहीं छोड़ा।
"साथ चलना है," उन्होंने कहा। "पर पहले मेरा बेटा अखाड़े में जाएगा। अकेला।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "क्योंकि जो लड़ाई मिट्टी में लड़ी जाती है, वो अकेले लड़ी जाती है। उसके बाद जो लड़ाई सच की होगी — वो हम सब मिलकर लड़ेंगे।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो बात थी — "मैं तुम्हारे साथ हूँ।" उसने कुछ नहीं कहा, बस होंठ हिलाए। मैंने सिर हिलाया।
मैं अखाड़े की तरफ़ बढ़ा।
अखाड़े का गेट बंद था। बड़ा लोहे का गेट, जिसे आम दिनों में खुला रखा जाता था। आज बंद था, और उस पर एक बड़ा ताला लटक रहा था।
दीवार पर, गेट के ठीक बगल में, एक काग़ज़ चिपका था। बड़ा काग़ज़, चारों तरफ़ से पत्थर से दबाया हुआ। मैंने उसे पढ़ा।
"आज का मुकाबला रद्द। अखाड़ा तीन दिन के लिए बंद। — भैरव सिंह"
मैंने उस काग़ज़ को देखा, और मेरे हाथ मुट्ठी में बंध गए। फिर मैंने दीवार के ऊपर से अंदर झाँका।
मैदान सूना था। मिट्टी की जगह, बीचोबीच, एक बड़ा गड्ढा था। जैसे किसी ने मिट्टी खोदकर उठा ली हो। और उस गड्ढे के किनारे पर कोई खड़ा था — कालू काका। वो मिट्टी में हाथ डाले, सिर झुकाए खड़े थे।
तभी पीछे से सुक्खी बुआ की आवाज़ आई। वो हाँफती हुई आ रही थीं, साड़ी का पल्ला संभालती हुई।
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