Spirit of a Fighter – Chapter 41
मैंने मिट्टी में पैर गड़ाए। भीड़ अब भी हँस रही थी, बच्चे उछल रहे थे, सुक्खी बुआ किसी को रघुवीर की जीत के किस्से सुना रही थीं। सब कुछ जैसे सामान्य था।
पर मेरे अंदर एक चीज़ बदल रही थी।
कल सुबह। भैरव। अलमारी। और वो पीला काग़ज़।
मैंने माँ की तरफ़ देखा। उन्होंने सिर हिलाया — बिना कुछ कहे। और मैं जान गया कि कल का मुकाबला सिर्फ़ कुश्ती का नहीं होगा।
कल का मुकाबला उस काग़ज़ का होगा। रघुवीर बनाम भैरव। बीस साल पुराना हिसाब।
मैंने धोती कसी। मिट्टी मेरे पैरों से चिपकी हुई थी। और मैंने उसे झाड़ा नहीं।
मैंने उसे सीने से लगाया।
॥
उस रात आँगन की मिट्टी ठंडी थी। मैं बैठा था, पीठ दीवार से टिकाकर, और हाथ में वो टूटी घड़ी थी। मीरा की दी हुई। सुइयाँ एक जगह अटकी हुईं, बारह बजे पर। जैसे वक़्त वहीं रुक गया हो और आगे बढ़ना भूल गया हो।
मैं उँगली से उसका काँच सहला रहा था। काँच पर एक बाल की दरार थी, जिसमें चाँद की रोशनी आकर फँस जाती थी।
पीछे से चप्पल की आवाज़ आई। माँ आईं और मेरे पास, उसी मिट्टी पर, बैठ गईं। उन्होंने कुछ नहीं पूछा। बस मेरे हाथ में देखा।
फिर बोलीं, "ये किसकी है?"
मैंने घड़ी को हथेली में ढक लिया। जवाब देने से पहले ज़ुबान सूख गई। माँ से झूठ नहीं बोल सकता, और सच बोलने में जान निकल रही थी। ये वही अजीब डर था — जो कुश्ती से नहीं, नाम लेने से आता है।
"अखाड़े की है," मैंने कहा।
माँ ने मेरी कलाई पकड़ी और घड़ी मेरी हथेली से खींच ली। उन्होंने उसे उलटा-पलटा। उँगली से काँच पर हाथ फेरा। फिर मेरी तरफ़ देखा।
"अखाड़े में घड़ियाँ रखी हैं?"
मैंने साँस भरी। "अखाड़े के मालिक की बेटी ने दी है।"
माँ देर तक चुप रहीं। इतनी देर कि मुझे लगा वो अब कुछ नहीं बोलेंगी। आँगन में एक टिड्डा कूदा, और माँ ने उसे देखा, जैसे उसी से पूछ रही हों।
"नाम?" उन्होंने पूछा।
"मीरा।" नाम मुँह से निकला और हवा में रखा रह गया, जैसे किसी ने गरम चूल्हे पर पानी की बूँद गिरा दी हो।
"वो शहर से आई है। आयुर्वेद पढ़ती है।" मैंने जल्दी से कहा, जैसे सफ़ाई दे रहा होऊँ। "उसके पिता बीमार हैं। वो उनका इलाज ढूँढ रही है।" मैं रुका। फिर धीरे से जोड़ा, "वो अच्छी है, माँ।"
माँ ने घड़ी मेरी हथेली पर वापस रख दी।
"मैंने कब कहा बुरी है?" उन्होंने कहा।
मैं चौंका। मुझे लगा था वो पूछेंगी — कैसे मिले, कब मिले, अखाड़े की बेटी से बात क्यों। पर उन्होंने कुछ नहीं पूछा। वो उठीं, दीवार पर टिकी लालटेन जलाई, और उसकी रोशनी मेरे चेहरे पर डाल दी।
"वो बाहर वाली है, वो मैं जानती हूँ," उन्होंने कहा। "शहर की लड़की है, तेरे जैसे घर की नहीं। पर मैं एक बात जानती हूँ — जो लड़की अपने बीमार बाप का इलाज ढूँढ रही है, उसका दिल खराब नहीं होता।"
मैंने गला साफ़ किया।
माँ मेरे सामने बैठ गईं। लालटेन उनके आधे चेहरे को पीला किए हुए थी।
"मैं उससे मिलना चाहती हूँ," उन्होंने कहा।
मैं एकदम सीधा हो गया। "क्या?"
"तू कान साफ़ करके सुन," माँ ने कहा। "मैं उससे मिलना चाहती हूँ। कल जब तू अखाड़े जाए, तो उसे साथ लेकर आ। या जहाँ वो कहे, मैं वहाँ आ जाऊँगी। पर मिलूँगी।"
"माँ, अभी वक़्त क्या है—"
"वक़्त सही है।" उन्होंने मेरी बात काटी। "कल की सुबह मैं देख सकती हूँ कि तेरे सामने खड़ा आदमी तुझे निगल जाए या नहीं। उससे पहले मैं देखना चाहती हूँ कि तेरे साथ खड़ी लड़की कैसी है। एक बात याद रख — जिस घर का बेटा अखाड़े में उतर रहा हो, उस घर की माँ को सब पता होना चाहिए। अंधेरे में लड़ने वाला बेटा और अंधेरे में बैठी माँ — दोनों एक ही दिन गिरते हैं।"
मैंने कुछ नहीं कहा। माँ की बातें इस तरह आती थीं जैसे कोई खुरपी से ज़मीन खोदकर जड़ निकाल दे। मैंने घड़ी को जेब में रखा। तभी कुछ हिला — जेब में जेब के भीतर, कुछ महसूस हुआ।
मैंने हाथ डाला। रघुवीर के नाम वाला काग़ज़ अब भी मेरे पास था। और उसके साथ — मीरा के बैग से गिरी एक छोटी पुड़िया, जिसमें घिसी हुई सोंठ और काली मिर्च थी। उसने कहा था — "सुबह खाली पेट लेना। कुश्ती से पहले।"
माँ ने पुड़िया देखी।
"क्या है?"
"मीरा ने दिया। सोंठ और काली मिर्च। कहती है ताकत बढ़ती है।"
माँ ने पुड़िया ली, खोली, सूँघी। मेरी नाक तेज़ है, पर माँ की नाक भी कम नहीं। उन्होंने कहा, "इसमें अदरक अच्छी है। सोंठ पुरानी है, पर चलेगी।" फिर उन्होंने पुड़िया मुझे लौटाई और एक बात जोड़ी — "जो दवा देते वक़्त अपनी माँ को याद करके दे, वो दवा कभी ज़हर नहीं बनती। ये बात याद रख।"
मैं हँसा। बहुत दिन बाद। हल्की सी हँसी, जो गले से निकलकर हवा में ही मर गई।
माँ उठकर अंदर चली गईं। दरवाज़े पर रुककर बोलीं, "सुबह जल्दी उठ। मैं तेरे साथ चलूँगी।"
"कहाँ?"
"उससे मिलने।" उन्होंने कहा, और दरवाज़ा बंद कर दिया।
मैं आँगन में अकेला रह गया। ऊपर आसमान में तारे थे, और मुझे लगा कि आज वो पहले से ज़्यादा करीब हैं। जैसे कोई ऊपर बैठा हमारा हिसाब लिख रहा हो।
मैंने घड़ी निकाली। उस टूटे काँच में अपना चेहरा देखा। वो चेहरा मुझे अजीब लगा — किसी और का, जो अब बच्चा नहीं रहा।
उसी वक़्त, दूसरी तरफ़, अखाड़े के बड़े घर में, एक कमरे की लाइट जल रही थी।
मीरा अपने पिता के कमरे में बैठी थी। सामने मेज़ पर दवाइयों की तीन शीशियाँ, एक कटोरी, और पुरानी पर्चियों का ढेर था। कमरे में तेल और कपूर की गंध थी, जो बीमार लोगों के कमरों में रहती है।
रणवीर सिंह बिस्तर पर लेटे थे। साँस धीमी, और छाती ऊपर-नीचे हो रही थी, जैसे कोई भारी बोरी उठाने की कोशिश कर रहा हो।
मीरा ने एक पुरानी पर्ची उठाई। काग़ज़ पीला पड़ गया था, किनारों से फट रहा था। उस पर डॉक्टर की घसीट लिखाई थी — कोई दवा, कोई तारीख़। मीरा ने उसे करीब लाकर देखा। तारीख़ के नीचे एक लाइन थी, जो डॉक्टर की नहीं थी। किसी और की थी। छोटी, साफ़ लिखाई।
उस लाइन में एक नाम लिखा था। भैरव।
मीरा की साँस रुकी। उसने पर्ची को लैंप के नीचे रखा। पर्ची पर लिखा था — "भैरव से पूछ लेना, दवा कब बदलनी है।"
ये कोई दवा की बात नहीं थी। ये किसी और चीज़ की बात थी। किसी और चीज़ की, जिसे पिता ने छुपाया था।
पीछे बिस्तर पर हलचल हुई। रणवीर सिंह ने आँखें खोलीं। उन्होंने देर तक मीरा को देखा। फिर धीरे से बोले, "तू क्यों पीछे पड़ी है?"
मीरा ने पर्ची उनकी तरफ़ बढ़ाई।
"ये क्या है, पापा?"
रणवीर सिंह ने पर्ची नहीं देखी। उन्होंने नज़र हटा ली, छत की तरफ़ देखने लगे। उनका जबड़ा कसा हुआ था, जैसे दाँत भींच रहे हों।
"पुरानी पर्ची है," उन्होंने कहा। "फेंक दे।"
"इसमें भैरव का नाम है। किसी दवा के लिए। तुम्हारी दवा के लिए।"
"मैंने कहा फेंक दे।"
मीरा ने पर्ची नहीं फेंकी। उसने उसे मेज़ पर रख दिया और पिता के बिस्तर के पास कुर्सी खींचकर बैठ गई। उसकी आवाज़ धीमी थी, पर साफ़।
"तुम्हारे पैर झूठ नहीं बोलते, पापा।"
रणवीर सिंह की आँखें भर आईं। उन्होंने मुँह फेर लिया। कमरे में सन्नाटा था, बस दीवार पर लगी पुरानी घड़ी की टिक-टिक, जो सिर्फ़ एक सुई से चल रही थी।
"बीस साल से मैं ये सुन रहा हूँ," उन्होंने धीरे से कहा। "कि मेरे पैर कुदरत के सितम से गए। कि पहलवानी का बदला शरीर लेती है।"
"तो कुदरत ने क्या किया था?" मीरा ने पूछा।
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