Spirit of a Fighter – Chapter 432
मैंने पलटकर देखा। रणवीर सिंह अपनी व्हीलचेयर पर थे, और उन्हें धकेल रहा था — कालू काका। बूढ़े की कुबड़ी कमर सीधी थी, और उसकी आँखों में कुछ था जो मैंने पहले कभी नहीं देखा — डर का बिलकुल अभाव।
भीड़ चीरती हुई व्हीलचेयर आगे आई। रणवीर सिंह का चेहरा लाल था, और मूँछें काँप रही थीं।
"बोल, भैरव," रणवीर सिंह ने कहा। "कौन से बाकी काग़ज़? जो तूने बीस साल से अपनी अलमारी में छिपा रखे हैं? जो तेरे ठेकेदार हरनाम ने लिखे, और जिन पर तेरे ज़हर से मरे ग्यारह पहलवानों के नाम हैं?"
भीड़ में सनसनी फैल गई। किसी ने कहा, "ग्यारह?" किसी ने कहा, "हरनाम? जो कल मरा?"
भैरव ने एक कदम पीछे लिया। उसका चेहरा अब वो मीठा नहीं था। वो अब वो था जो वो अंदर से था।
"तू… तू बोलने की हालत में नहीं है," भैरव ने रणवीर सिंह से कहा। उसकी आवाज़ धीमी और ज़हरीली थी। "तेरे पैर सून्न हैं, तेरा दिमाग भी सून्न हो गया है। बूढ़ा हो गया है तू।"
"बूढ़ा हूँ," रणवीर सिंह ने कहा। "पर अंधा नहीं हूँ।"
फिर उन्होंने कमर से एक और काग़ज़ निकाला — छोटा, मुड़ा हुआ, पीला।
"ये चिट्ठी शेर सिंह ने मरने से पहले लिखी थी," रणवीर सिंह ने कहा, और उनकी आवाज़ भर्रा गई। "शेर सिंह — जिसे तू अपना बाप बताता है। इस चिट्ठी में शेर सिंह ने लिखा है कि उसका बेटा मोहन…" उन्होंने रुककर भैरव की तरफ़ देखा। "…मोहन नाम का एक लड़का, जो उसका बेटा नहीं था। जिसे माधव सिंह ने शेर सिंह के घर में रखवाया था।"
मंच पर माधव सिंह की कुर्सी खिसकी। मैंने देखा — सरपंच का चेहरा पहली बार बदला। वो उठ खड़े हुए और भैरव की तरफ़ देखा।
भैरव ने उनकी तरफ़ नहीं देखा। भैरव की आँखें सिर्फ़ रणवीर सिंह पर थीं।
"तू झूठ बोल रहा है," भैरव ने कहा। पर उसकी आवाज़ में वो दम नहीं था जो अभी था।
"झूठ?" रणवीर सिंह ने कहा। "तो ये बता — तेरा असली नाम क्या है?"
सन्नाटा। इतना गहरा कि मुझे अपनी साँस सुनाई दे रही थी।
भैरव ने होंठ खोले, फिर बंद कर दिए।
"बोल," रणवीर सिंह ने कहा। "या मैं बोलूँ? तेरा नाम मोहन है। और तू शेर सिंह का बेटा नहीं है। तू माधव सिंह का बेटा है — वो माधव सिंह, जो आज इस मंच पर तेरे पीछे बैठा है, और जिसने चालीस साल पहले मेरे पिता के काग़ज़ चुराए थे।"
माधव सिंह ने कुछ कहना चाहा, पर भीड़ ने उन्हें सुनना ही नहीं चाहा। चार सौ लोगों की आवाज़ एक साथ उठी। किसी ने कहा "क्या?", किसी ने कहा "धोखा!", और एक बूढ़ी औरत ने अपना सिर पीट लिया।
मैं भैरव को देख रहा था। वो खड़ा था, और उसका शरीर काँप रहा था। उसके हाथ की मुट्ठी कसी हुई थी। वो भीड़ से नहीं डर रहा था। वो उस काग़ज़ से डर रहा था जो रणवीर सिंह के हाथ में था।
और मैंने उस पल में कुछ सूँघा। मैंने अपनी आँखें बंद कीं। हवा में कई गंध थीं — पसीना, मिट्टी, धूप में सूखती धोती, भीड़ की साँस। पर उन सबके नीचे, एक गंध थी जो सिर्फ़ उसी की थी। तेल लगी मूँछों की गंध। सोने की चेन की गंध। और उसके नीचे — वो कड़वी, गुड़ जैसी मिठास। वही ज़हर।
वो आज भी पीकर आया था।
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसने मेरी आँखों में कुछ देखा और उसका चेहरा कस गया। वो समझ गई थी।
तभी भैरव हँसा। अचानक, ज़ोर से, ऐसे जैसे किसी ने उसके पेट में हाथ डाल दिया हो। वो हँसा और उसकी हँसी में कुछ ऐसा था जो डरा देता है — एक आदमी जब हार के कगार पर हो और उसके पास कुछ बचा न हो, तो ऐसे हँसता है।
"ठीक है," उसने कहा। "ठीक है।" उसने अपनी आँखें पोंछीं। "तूने मेरा नाम खोल दिया। बड़ी बात कर दी।" उसने भीड़ की तरफ़ देखा। "पर एक बात सोच, रामपुर के लोगों — मैंने तुम्हारे बेटों को बीमार नहीं किया। मैंने उन्हें ताकत दी। जिसने मेरा पानी पिया, वो जीता। जो नहीं पिया, वो मिट्टी में मुँह के बल गिरा। ये मैंने नहीं कहा, ये तुम्हारे अखाड़े का हिसाब है।"
भीड़ में कुछ लोग सिर नीचा किए खड़े थे। कुछ पहलवान जिन्होंने वो पानी पिया था। बूढ़े लुट्टन को मैंने देखा — वो सबसे आगे खड़ा था, और उसकी आँखों में आँसू थे।
"और तू?" भैरव ने मेरी तरफ़ देखा। "तू क्या है? तू तो वो लड़का है जो कुएँ के बाहर खड़ा रहता था और अंदर झाँकता था। तूने कोई कुश्ती नहीं जीती। तूने सिर्फ़ अंदर आने की ज़िद की।"
"जीती है," मैंने कहा। "लुट्टन से।"
भैरव रुका।
"और आज तेरे से जीतूँगा," मैंने कहा। "यही सबके सामने, इसी मिट्टी में। तूने कहा था तीन दिन बाद। तो सुन — तीन दिन नहीं। आज। तेरे पास मिट्टी है, तेरे पास ज़हर है, तेरे पास चार सौ लोगों का डर है। मेरे पास सिर्फ़ ये है।"
मैंने अपनी हथेली खोली। उसमें मिट्टी थी — लाल, गीली, उसी अखाड़े की।
"ये किसी की जागीर नहीं है," मैंने कहा। "जिसके पसीने से सिंची जाए, वो उसकी है।"
भैरव की आँखें सिकुड़ीं। वो मेरी तरफ़ झुका और उसकी आवाज़ धीमी हो गई, सिर्फ़ मेरे लिए।
"तुझे पता है ना," वो फुसफुसाया, "कि तेरी माँ अभी भी मेरी रसोई में काम करती है? और तेरी बहन आज स्कूल से अकेली लौटेगी?"
मेरे हाथ काँपे। मैंने अपनी हथेली कसकर बंद कर ली।
"मेरी माँ आज तेरी रसोई में नहीं है," मैंने कहा। "वो वहाँ खड़ी है।"
मैंने इशारा किया। भीड़ के बीच, गुड़िया के पीछे, सरस्वती खड़ी थीं। उन्होंने अपनी साड़ी के पल्लू से अपना सिर ढक लिया था और वो सीधी खड़ी थीं — दुबली, सूखे हाथ, माथे पर हल्दी का टीका। वो डरी नहीं थीं। वो बस देख रही थीं।
"और मेरी बहन?" मैंने भैरव से कहा। "वो भी वहीं खड़ी है। तेरे आदमी उसे क्या करेंगे, भैरव? चार सौ लोगों के सामने?"
भैरव ने भीड़ की तरफ़ देखा। और पहली बार मैंने उसकी आँखों में कुछ देखा — वो चीज़ जो सिर्फ़ तब आती है जब एक आदमी को लगे कि उसके हाथ से सब कुछ फिसल रहा है।
वो सीधा खड़ा हुआ।
"ठीक है," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में अब वो मिठास लौट आई थी। "आज। ठीक है, वीर। पर एक शर्त है।"
"बोल।"
"मैदान में सिर्फ़ हम दो होंगे। कोई ज़हर नहीं, कोई पानी नहीं, कोई गवाही नहीं। और अगर मैं जीता, तो तू और तेरी माँ और तेरी बहन — तीनों रामपुर छोड़कर जाओगे। हमेशा के लिए।"
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसने मुझे देखा और उसके होंठ हिले — "मत कर।" पर मैंने सिर हिलाया।
"और अगर मैं जीता," मैंने कहा, "तो तू अपनी अलमारी खोलेगा। सबके सामने।"
भैरव हँसा। "अलमारी?"
"अलमारी," मैंने कहा। "वो जो तेरी कमरे में है। और उस चाबी से खुलेगी जो तेरी कमर में बंधी है।"
भैरव ने अपनी कमर की तरफ़ हाथ किया। चाबी वहीं थी। उसने उसे छुआ, और मैंने देखा कि उसकी उँगलियाँ ज़रा-सी काँपी।
"मंज़ूर," उसने कहा।
भीड़ में रणवीर सिंह की आवाज़ उठी। "वीर! रुक!" पर मैंने उनकी तरफ़ देखा और सिर हिलाया — मैं जानता हूँ क्या कर रहा हूँ।
मैंने अपनी धोती सँभाली — पापा की धोती — और मैदान की तरफ़ बढ़ा।
तभी कालू काका ने मेरी बाँह पकड़ी। उनका हाथ सूखा और मज़बूत था।
"बेटा," उन्होंने धीरे से कहा, "ये मैदान आज अलग है। भैरव ने कल रात मिट्टी बदलवा दी है। ऊपर सिर्फ़ नई मिट्टी है। असली मिट्टी — वो नीचे है। जहाँ पैर धँसे और नरम लगे, वहीं दाँव लगाना। बाकी सब फिसलन है।"
मैंने उनकी आँखों में देखा।
"काका," मैंने कहा, "तूने मुझे ये पहले क्यों नहीं बताया?"
"क्योंकि मैं डरता था," उन्होंने कहा। और उनकी आवाज़ में कोई शर्म नहीं थी। सिर्फ़ सच। "बीस साल डरता रहा। आज नहीं डरता।"
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