Spirit of a Fighter – Chapter 430
"ये राख भैरव की है," मैंने कहा। "मैंने उसके पानी को सूँघा था, मीरा। याद है? उस बोतल में जो था, उसमें वो कड़वाहट थी जो मुँह में नहीं, नाक में लगती है। ये वही है। उसने काग़ज़ जलाए, और उसके हाथ से जो पानी टपका, वो इन काग़ज़ों पर गिरा। इन काग़ज़ों में उसी की बोतल का ज़हर सूखा है।"
मीरा ने एक पल सोचा। फिर उसने अपनी जेब से एक छोटी थैली निकाली — वही जिसमें वो जड़ी-बूटियाँ रखती थी — और उसमें मेरी मुट्ठी की राख उँडेल दी।
"ये लैब जाएगी," वो बोली। "अगर इसमें ज़हर है, तो ये काग़ज़ नहीं, ये हथियार है।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। मेरे हाथ अब भी राख से भरे थे।
"तूने कब सोचा ये सब?"
"अभी," वो बोली। "जब तूने कहा कि गंध रह जाती है।" उसकी आवाज़ में वो नरमी आई जो कभी-कभी आती थी, बहुत कम, जैसे बंद कमरे में हल्की हवा। "तू गंध से देखता है, वीर। मैं काग़ज़ से देखती हूँ। दोनों मिलकर एक पूरा सच बनते हैं।"
टिंकू ने हम दोनों की तरफ़ देखा, फिर अपना सिर खुजाया।
"मैं तो बस इतना जानता हूँ," वो बोला, "कि अगर ये राख लैब में जा रही है, तो मुझे उस डिब्बी में खीर नहीं रखनी। मेरी खीर और तेरी राख — दोनों एक जैसी दिखती हैं, भाई।"
मैं हँसा। उस वक़्त हँसना अजीब था, पर हँसी आ गई, और उसके साथ कुछ और भी निकला — वो डर जो सीने में जमा था, वो थोड़ा सा ढीला हुआ।
फिर मेरी नज़र फर्श पर गई। राख के बीच, एक कोने में, कुछ और था। मैंने उसे उठाया।
आधा जला हुआ काग़ज़। बहुत छोटा, उँगली के दो पोर जितना। किनारे भूरे, मुड़े हुए। उस पर सिर्फ़ तीन शब्द बचे थे, बाकी सब जल चुका था।
"…चौधरी का बेटा…"
मैंने उसे मीरा को दिया। वो उसे लालटेन के पास ले गई, इतने पास कि मुझे लगा जल जाएगा।
"बस यही?" टिंकू ने कहा। "तीन शब्द?"
"तीन शब्द भी बहुत होते हैं," मीरा ने कहा। वो उसे घुमा रही थी, उलट रही थी। "चौधरी… चौधरी कौन?"
मेरे दिमाग़ में कुछ चला। धीमा, जैसे कीचड़ में पहिया।
"चौधरी," मैंने कहा। "गाँव के बाहर, नहर के पार, पुराना चौधरी का घर है। जो अब खंडहर है। माँ कहती थी कि बीस साल पहले वहाँ एक परिवार रहता था। चौधरी ज़मीनदार थे। फिर एक रात सब चले गए। किसी को कुछ पता नहीं चला।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा।
"बीस साल पहले," वो बोली। "वही साल जब मेरे पापा व्हीलचेयर पर आए। वही साल जब शेर सिंह मरे। वही साल जब भैरव अखाड़े का मैनेजर बना।"
हम तीनों चुप हो गए। लालटेन की लौ हिल रही थी, और हमारी परछाइयाँ दीवार पर नाच रही थीं।
"तो भैरव यहाँ आया था," मीरा ने धीरे से कहा। "रात में ही। उसने संदूक से सब कुछ निकाला, जला दिया, और…"
वो रुकी। उसकी नज़र दीवार पर गई। और उसका चेहरा बदल गया।
"वीर," वो बोली। उसकी आवाज़ बहुत धीमी थी। "देख।"
मैंने पलटकर देखा।
दीवार पर, कोयले से, बड़े-बड़े अक्षरों में कुछ लिखा था। ताज़ा लिखा था — कोयला अभी भी कहीं-कहीं चमक रहा था, जैसे अभी हाथ लगाकर छोड़ा हो।
"अगली बार यहाँ तेरी माँ की लाश होगी, वीर सिंह।"
मेरे पैरों के नीचे की ज़मीन खिसक गई। मुझे वो एहसास हुआ जो डूबते वक़्त होता है — जब पानी ऊपर आता है और पैर तले कुछ नहीं रहता।
उसके नीचे, छोटे अक्षरों में:
"कल सुबह अखाड़े में आख़िरी कुश्ती। तेरे हाथ में एक ही रास्ता है — मर या हार।"
टिंकू ने अपना मुँह हाथ से ढक लिया। मीरा ने मेरा हाथ पकड़ा। उसकी उँगलियाँ ठंडी थीं।
मैं उस लिखाई को देखता रहा। कोयले के अक्षर, दीवार पर, उसी तहखाने में जहाँ बीस साल पहले मेरे पापा को मिट्टी में गाड़ा गया था। जहाँ से मैंने अपनी माँ का नाम लिखा हुआ काग़ज़ निकाला था। जहाँ मिट्टी में अब भी ताकत थी, और उस ताकत को भैरव अपने पास रखना चाहता था।
मैंने अपनी मुट्ठी खोली। उसमें अब भी राख थी, और उस राख की गंध मेरे अंदर तक गई।
"न मरूँगा, न हारूँगा," मैंने धीरे से कहा। मेरी आवाज़ मेरी अपनी नहीं लग रही थी — किसी और की लग रही थी, किसी ऐसे की जो बहुत अंदर से बोल रहा हो। "तीसरा रास्ता है — तुझे मिट्टी में मिला दूँगा।"
मीरा ने मेरा हाथ कसकर पकड़ा। उसकी हथेली गरम हो गई थी।
"तीसरा रास्ता हम दोनों का है," वो बोली। "अकेले नहीं।"
टिंकू ने बीच में आकर अपना हाथ हम दोनों के हाथों पर रख दिया।
"तीन का," वो बोला। "मैं भी हूँ। भले ही मैं भागूँ, पर मैं तुम्हारा भागने वाला हूँ।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा और कुछ कहा नहीं। कुछ बातें कहनी नहीं होतीं।
हम बाहर निकले तो आसमान गुलाबी हो चुका था। नीम के पेड़ के नीचे कालू काका खड़े थे, लाठी हाथ में, और उनके सामने दो आदमी थे जिन्हें मैंने पहचाना नहीं। शायद भैरव के आदमी। वो कुछ कह रहे थे, और कालू काका सिर हिला रहे थे — ना में।
मेरे पैरों ने रफ़्तार पकड़ी। पर जैसे ही मैं आगे बढ़ा, कालू काका ने मेरी तरफ़ देखा और अपनी लाठी ज़रा सी ऊपर की — एक छोटा सा इशारा। रुक जा।
मैं रुक गया।
टिंकू ने मेरे कंधे पर हाथ रखा।
"वो सँभाल लेंगे," उसने कहा। "कालू काका बीस साल से इस अखाड़े में हैं। उन्होंने भैरव को बच्चा देखा है। वो इन दो को क्या, चार को सँभाल लेंगे।"
हम पीछे के रास्ते से निकले — नहर के किनारे, झाड़ियों में से। मेरी जेब में चाबी थी, मीरा की थैली में राख, और मेरे सीने में वो गंध जो अब मेरे अंदर थी, मेरी अपनी साँस की तरह।
सुबह की पहली किरण जब नहर के पानी पर पड़ी, तो मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसके बाल बिखरे हुए थे, कुर्ते पर कीचड़ के छींटे थे, और वो चलते-चलते अपनी थैली को सीने से लगाए हुए थी, जैसे उसमें सोना हो।
"मीरा," मैंने कहा।
"हाँ।"
"तेरे हाथ में जो राख है… अगर वो लैब में साबित हो गई, तो भैरव को पकड़ने के लिए काफ़ी है?"
उसने मेरी तरफ़ देखा।
"अकेले नहीं," वो बोली। "पर ये उस कमरे की कुंजी है। मेरे पास बोतलों का पानी है, मेरे पापा की गवाही है, हरनाम का काग़ज़ है, और अब ये राख है। चार चीज़ें। एक-एक करके कमज़ोर हैं। चारों मिलकर एक मुट्ठी हैं।"
"और मेरे पास चाबी है," मैंने कहा।
"और तेरे पास तेरी नाक है," उसने कहा। फिर थोड़ा मुस्कुराई। "जिस पर अब मुझे भी भरोसा है।"
अखाड़े के फाटक पर जब हम पहुँचे, तो सूरज पूरा निकल चुका था। फाटक बंद था, पर अंदर से आवाज़ें आ रही थीं — किसी के चिल्लाने की, किसी के रोने की।
मैंने टिंकू की तरफ़ देखा।
"तू कहता है मैं बड़ी-बड़ी बातें करता हूँ," मैंने कहा। "आज एक छोटी बात कर। अंदर जाकर पता कर कि क्या हुआ।"
टिंकू ने एक लंबी साँस ली, अपनी टोपी ठीक की, और दीवार के छेद की तरफ़ बढ़ा। मेरा दिल ज़ोर से धड़क रहा था — क्योंकि अगर भैरव ने अपनी धमकी पूरी करने के लिए कुछ और किया था, अगर उसने माँ को कुछ कहा था, अगर गुड़िया का स्कूल का रास्ता रोका था, तो मैं उस आदमी को इस बार मिट्टी में नहीं, उससे भी गहरे कहीं गाड़ देता।
टिंकू झाँककर लौटा। उसका चेहरा पीला था।
"भाई…" उसकी आवाज़ काँप रही थी। "अखाड़े में भैरव ने सबको बुला रखा है। पूरा गाँव है। और वो… वो मंच पर खड़ा है, और उसके हाथ में एक काग़ज़ है।"
"क्या काग़ज़?"
टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो डर था जो मैंने पहले कभी नहीं देखा था।
"वो कह रहा है," टिंकू ने धीरे से कहा, "कि तेरी माँ ने ही रघुवीर को ज़हर दिया था।"
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