Spirit of a Fighter – Chapter 4
उन्होंने सिर उठाया। माथे पर हल्दी का टीका, सफ़ेद होती चोटी। आँखों में वो चमक।
"आ गया? हाथ-मुँह धो ले। गुड़िया स्कूल जाने वाली है।"
"माँ, एक बात पूछनी है।"
उन्होंने चक्की रोक दी। ऐसा कभी नहीं करतीं। चक्की उनका घड़ी की तरह चलता है, रुकता नहीं। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
"पूछ।"
"अखाड़े में नई भर्ती है। कालू काका ने कहा है। बाहर वालों को भी मौका है।"
माँ ने एक लंबी साँस ली। उन्होंने आटे से भरे हाथ अपनी साड़ी पर पोंछे। फिर धीरे से बोलीं, "तू जानता है तेरे पिता कैसे गए?"
मैंने सिर हिलाया। मैं जानता था। पूरा गाँव जानता था।
"तो फिर पूछ क्यों रहा है?" उनकी आवाज़ में गुस्सा नहीं था। कुछ और था। जैसे किसी पुराने ज़ख्म को छूने की आवाज़।
"क्योंकि मैं उस पानी को सूंघ सकता हूँ, माँ।" मेरी आवाज़ धीमी थी। "मैं पहचान सकता हूँ। जो उसे पीएगा, वो बीमार पड़ेगा — मुझे पता चल जाएगा। मैं उसे पीने से रोक सकता हूँ।"
माँ ने मेरी तरफ़ देखा। एक लंबा पल। उनकी आँखें भर आईं, पर उन्होंने कोई आवाज़ नहीं की। फिर उन्होंने चक्की फिर से चलानी शुरू कर दी।
"जा," वो बोलीं, चक्की की आवाज़ के बीच। "पर एक बात याद रखना — भूखे पेट की दुआ सीधी ऊपर जाती है, बेटा। और जो दुआ ऊपर से आती है, उसे कोई चुरा नहीं सकता।"
मैं आँगन में खड़ा रहा। चक्की चल रही थी। माँ की पीठ झुकी हुई थी। और मेरे अंदर कुछ और मज़बूत हो रहा था — या शायद वो डर था जो मज़बूत हो रहा था।
तभी गुड़िया दौड़ती हुई आई, स्कूल की कॉपी हाथ में, दो चोटियाँ हवा में। "भैया! भैया! पता है, मैंने आज प्रार्थना में क्या माँगा?"
"क्या माँगा?" मैंने पूछा।
"कि भैया पहलवान बन जाएँ," उसने हाँफते हुए कहा, "और मेरे हाथ में मिठाई की डिब्बी दें। पूरे अखाड़े में बाँटूँगी।"
मैंने उसके बाल सहलाए। वो मुस्कुराई और दौड़कर स्कूल चली गई।
मैं आँगन में खड़ा रहा। सुबह की धूप अब तेज़ हो रही थी। दीवार पर लगी वो टूटी घड़ी जो कभी ठीक नहीं हुई।
मेरी जेब में दो रुपये की ठंडी गोली खड़खड़ाई।
मैंने उसे निकाला। दो रुपये। बस इतने। और नई भर्ती का फ़ीस क्या होगा? मुझे पता नहीं था।
तभी गली से आवाज़ आई। गाड़ी की घरघराहट। मैंने मुड़कर देखा।
एक जीप आ रही थी। पुरानी, धूल भरी। और उसमें बैठा था — भैरव सिंह।
मेरी साँस रुक गई।
उसने जीप से ही मेरी तरफ़ देखा। आँखें ठंडी, चेहरे पर मुस्कान जैसे गुड़। उसने हाथ उठाकर मुझे रुकने का इशारा किया। जीप मेरे सामने रुकी।
उसने खिड़की से सिर निकाला। मूँछों के सिरे तेल से चमक रहे थे।
"वीर सिंह," उसकी मीठी आवाज़ आई। "सुनने में आया कि तू मेरे अखाड़े के बाहर रोज़ खड़ा रहता है।"
मेरा गला सूख गया। पर मैंने आँखें नहीं हटाईं।
"हाँ," मैंने कहा। "देखता हूँ।"
"देखने में क्या हर्ज है।" वो मुस्कुराया। "पर सुन — सुबह-सुबह मेरे अखाड़े के बाहर खड़े होने वाले लोग मेरे अखाड़े के अंदर नहीं आते। कभी।" वो रुका। उसकी मुस्कान वैसी ही रही। "तू चाहे तो नियम बदल सकता है। कल सुबह आ जा। नई भर्ती है। तेरे जैसे जवानों को तो खुद ढूँढना चाहिए।"
वो हँसा। और जीप चल पड़ी।
मैं वहीं खड़ा रहा, धूल मुँह पर पड़ रही थी। मेरी नाक में उसकी गंध थी — तेल, पसीना, और कुछ और। कुछ जो मैं पहचानता था। वही कड़वाहट।
बहुत हल्की। बहुत पुरानी। जैसे किसी ने उसे बहुत साल पहले पिया हो।
मेरा दिल ज़ोर से धड़का। मैंने धोती का कोना मुँह पर रखा।
माँ आँगन के दरवाज़े पर खड़ी थीं। उन्होंने सब सुना था। उनकी आँखें मेरी तरफ़ थीं।
"माँ," मैंने कहा, "मैं कल जाऊँगा।"
वो कुछ नहीं बोलीं। बस चक्की की तरफ़ मुड़ गईं। और चक्की फिर चलने लगी — धीरे, भारी, जैसे कोई दुआ पढ़ रहा हो।
मैंने जेब में हाथ डाला। दो रुपये की गोली। मैंने उसे मुट्ठी में भींचा।
कल। कल मैं अखाड़े के अंदर जाऊँगा। जहाँ मेरे पिता गए थे। जहाँ से वो लौटकर बीमार पड़े थे।
और जिस आदमी ने अभी-अभी मुझे हँसकर बुलाया है, उसकी गंध में वही कड़वाहट है जो उस पानी में है।
मेरी मुट्ठी और कस गई।
पर मुझे नहीं पता था कि कल अखाड़े में सिर्फ़ भर्ती नहीं होने वाली थी। कुछ और भी होने वाला था। कुछ ऐसा जो मेरी नाक पकड़ लेगी, और मेरी ज़िंदगी हमेशा के लिए बदल देगी।
दूर, नहर की तरफ़ से किसी के चलने की आवाज़ आई। मैंने पलटकर देखा।
मीरा थी। कंधे पर बैग, हाथ में एक लिफ़ाफ़ा। वो तेज़ी से आ रही थी। उसके चेहरे पर वो ज़िद थी, पर आँच भी।
वो मेरे पास रुकी। हाँफ रही थी।
"मैंने पापा के रिकॉर्ड देखे," उसने कहा। "पिछले दस साल के।" उसने लिफ़ाफ़ा मेरी तरफ़ बढ़ाया। "भैरव के हाथ से लिखा हुआ है। पर एक नाम है जो हर साल दोहराया गया है। बीमारी में। मौत में। सब में।"
"कौन?"
उसने लिफ़ाफ़ा खोला। एक काग़ज़ निकाला। उस पर उँगली रखी।
"रामदीन," उसने धीरे से कहा। "जो पिछले साल बीमार पड़ा। वो मरा नहीं। वो गाँव से गया नहीं।" उसने मेरी आँखों में देखा। "वो अखाड़े के पीछे, बंद कुएँ के नीचे है। और वो अभी भी ज़िंदा है।"
मेरे हाथ से काग़ज़ फिसल गया।
॥
काग़ज़ हवा में लहराकर गिरा। मैंने उसे उठाया। उँगलियाँ काँप रही थीं।
"तुम्हें कैसे पता?" मैंने पूछा। आवाज़ फटी हुई निकली।
मीरा ने बाल पीछे किए। उसके माथे पर पसीना था, साँस अभी भी तेज़।
"रिकॉर्ड में लिखा है — रामदीन, पिछले साल चैत्र में बीमार। घर भेज दिया गया। फिर मौत दर्ज है।" उसने उँगली काग़ज़ पर रखी। "पर जिस दिन मौत दर्ज हुई, उस दिन मैं गाँव में थी। मैंने उसका अंतिम संस्कार होते नहीं देखा। किसी ने नहीं देखा। मैंने पूछा तो सबने कहा — 'भैरव सिंह जी ने खुद इंतज़ाम कर दिया, हमें क्यों पड़ी।'"
"और तुम्हें कैसे पता कि वो कुएँ के नीचे है?"
"क्योंकि पिछले हफ़्ते मैं अखाड़े के पीछे गई थी। जड़ी-बूटी ढूँढ रही थी।" उसने आवाज़ धीमी की। "कुएँ से एक आवाज़ आई। खाँसी। जैसे कोई अंदर से खाँस रहा हो। मैंने डरकर पत्थर फेंका। फिर आवाज़ आई — 'पानी।'"
मेरी नाक फिर से हरकत में आई। जैसे उस पल को सूँघ रही हो।
"तुम पापा से क्यों नहीं कहतीं?"
मीरा का चेहरा बदला। एक पल को वो ज़िद टूटी।
"क्योंकि पापा मुझे कुछ नहीं बताते।" उसने काग़ज़ मोड़ा। "वो मुझे बच्ची समझते हैं। कहते हैं — 'तू पढ़ाई कर, ये सब तेरे लिए नहीं।'" उसने काग़ज़ बैग में डाला। "पर मैं अब बच्ची नहीं हूँ।"
वो मुड़कर जाने लगी। फिर रुकी।
"कल भर्ती है। तुम आओगे?"
"आऊँगा।"
"अच्छा।" वो चली, पर फिर पलटी। "और वीर सिंह — इसे किसी को मत बताना। कुएँ वाली बात। अभी नहीं।"
वो गई।
मैं वहीं खड़ा रहा। हाथ में वो काग़ज़ था जो उसने भूलकर छोड़ दिया था। रामदीन का नाम। और उसके नीचे भैरव की लिखाई — "बीमारी के कारण मृत्यु।"
मैंने काग़ज़ जेब में रखा। जेब में वो दो रुपये की गोली भी थी। दोनों साथ।
घर पहुँचा तो सूरज सिर पर था। दरवाज़े के बाहर सुक्खी बुआ खड़ी थीं। चमकीली पीली साड़ी, हाथ में पान का बीड़ा, और आँखों में वो चमक जो किसी नई खबर की भूखी हो।
"अरे वीर!" वो मेरी तरफ़ बढ़ीं। "मैंने तो सुना है — कल रात कोई अखाड़े की दीवार पर चढ़ा था।"
मेरा दिल एक झटके में धड़का। पर चेहरा सपाट रखा।
"अच्छा?"
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