Spirit of a Fighter – Chapter 5
"हाँ रे! दीवार पर पैरों के निशान मिले हैं। मिट्टी में। मटमैले।" उन्होंने पान चबाया। "कालू काका ने सुबह मिट्टी सींचते वक़्त देखे। कहते हैं — निशान बड़े पैरों के हैं। किसी जवान के।"
"तो?"
"तो क्या! कोई चोर घुसा होगा। या कोई जासूस।" उन्होंने आँखें सिकोड़ीं। "भैरव सिंह तो गुस्से में लाल हो रहे हैं। कह रहे हैं — जो भी है, पकड़ा जाएगा।"
मेरा गला सूख रहा था। कल रात। मैं कल रात यहाँ से गुज़रा था? नहीं। मैं अखाड़े के पीछे गया था। नहर के रास्ते से। पर पैरों के निशान…
"बुआ," टिंकू की आवाज़ आई। वो अपनी दुकान के बाहर से आ रहा था, हाथ में मिठाई की डिब्बी। "वो तो बंदर थे।"
सुक्खी बुआ रुकीं।
"बंदर?"
"हाँ बुआ। मैंने खुद देखे। दो बंदर। दीवार पर बैठे थे। मैं सुबह टहलने निकला था, तो देखा। उन्होंने मिट्टी उछाल दी थी।" टिंकू ने डिब्बी मेरी तरफ़ बढ़ाई जैसे कुछ हुआ ही न हो। "ये नई बर्फ़ी है। चख।"
"अरे पर कालू काका ने तो कहा—"
"कालू काका की आँखें अब कमज़ोर हो गई हैं बुआ। सत्तर पार के हैं। उन्हें बंदर और आदमी एक जैसे दिखते हैं।" टिंकू ने कंधे उचकाए। "आप भी न, हर बात का ढोल बना देती हैं।"
सुक्खी बुआ का मुँह बन गया। पान का बीड़ा उन्होंने ज़ोर से चबाया।
"हम तो सिर्फ़ खबर दे रहे थे," वो बोलीं। "तुम दोनों तो जैसे यहीं के चौकीदार हो।" वो झोला संभालकर चलीं। "अरे, एक बात और सुनी है — मीरा मैडम सुबह-सुबह नहर के रास्ते कहीं जाती दिखी। किसी से बात करती हुई।" उन्होंने पलटकर देखा। "तुम्हें कुछ पता है?"
"नहीं बुआ," मैंने कहा। "कुछ नहीं।"
वो गईं।
टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी मुस्कान गायब थी।
"तू कल रात यहाँ क्यों खड़ा था?"
"मैं तो—"
"मत बोल।" उसने डिब्बी मेरे हाथ में थमाई। "मुझे पता है। तू अखाड़े के पीछे गया था। मैंने तुझे नहर के रास्ते जाते देखा था। मैं तेरे पीछे आया था, पर तू बहुत दूर निकल गया था।"
मैं चुप हो गया।
"वीर।" उसने मेरा कंधा पकड़ा। "भैरव सिंह का अखाड़ा है वो। उसके आदमी रात को पहरा देते हैं। अगर उसने तुझे देख लिया होता—"
"उसने मुझे बुलाया है," मैंने कहा। "खुद। जीप से आकर।"
टिंकू का हाथ मेरे कंधे से खिसक गया।
"क्या?"
"कल सुबह। नई भर्ती। उसने कहा — तेरे जैसे जवानों को खुद ढूँढना चाहिए।"
टिंकू एक पल चुप रहा। फिर उसने डिब्बी का ढक्कन खोला। एक बर्फ़ी निकाली। अपने मुँह में डाली। चबाई। फिर बोला।
"तू पागल है।"
"हो सकता है।"
"पर मैं तेरे साथ हूँ।" उसने दूसरी बर्फ़ी निकाली। मेरी तरफ़ बढ़ाई। "कल सुबह। पाँच बजे। मैं दुकान बंद करके आऊँगा।"
"तू तो कहता था कसरत कल से शुरू करेगा।"
"तो कल से करूँगा ना।" उसने बर्फ़ी चबाई। "बस आज खीर बच गई है।"
मैं हँसा। पहली बार उस दिन। हँसी गले में अटकी, पर आई।
घर के अंदर गया तो गुड़िया दरवाज़े पर खड़ी थी। स्कूल से लौटी थी। दो चोटियाँ, हाथ में कॉपी, पैरों में धूल।
"भैया!" वो दौड़कर आई। "मैंने सुना — तू कल अखाड़े जा रहा है?"
"किसने बताया?"
"सुक्खी बुआ गली में चिल्ला रही थीं।" उसने आँखें बड़ी कीं। "सच कह रही थीं?"
"हाँ।"
गुड़िया एक पल मेरी तरफ़ देखती रही। फिर जेब में हाथ डाला। एक छोटी थैली निकाली। लाल कपड़े की। धूल भरी।
"ये क्या है?"
"खोल।"
मैंने खोला। अंदर लाल मिट्टी थी। बारीक। चिकनी। जैसे सदियों का पिसा हुआ गुस्सा।
"अखाड़े की मिट्टी है," गुड़िया ने धीरे से कहा। "मैंने चुपके से ली है। दीवार के नीचे से। निकलती पड़ी थी।" उसने मेरी मुट्ठी पर हाथ रखा। "इससे तेरे हाथ मज़बूत होंगे। मैंने सोचा — भैया रोज़ जाता है देखने, आज मिट्टी ही ले आए।"
मेरा गला भर आया। बारह साल की बच्ची। स्कूल जाती है, कॉपी भरती है, और रास्ते में अखाड़े की दीवार से मिट्टी खुरचकर लाती है। मेरे लिए। जबकि मैं खुद कुछ नहीं कर पा रहा। दीवार के बाहर खड़ा रहता हूँ, और ये बच्ची मिट्टी चुरा रही है।
"गुड़िया—"
"मत कहना कि मत लाओ।" उसकी आँखें चमकीं। "मैं रोज़ लाऊँगी। जब तक तू पहलवान नहीं बन जाता।"
"तेरे हाथ गंदे हो जाएँगे।"
"तो होने दो।" उसने हाथ पीछे छुपा लिए। "मैंने आज प्रार्थना में तेरे लिए दुआ माँगी। मैडम ने कहा — जो माँगो, सच्चे दिल से माँगो। मैंने माँगा कि भैया पहलवान बन जाए और जीत के बाद मिठाई बाँटे।" वो हँसी। "पर मैंने ये नहीं कहा कि मिठाई टिंकू भैया की हो। मैंने कहा — अच्छी मिठाई।"
मैं हँस पड़ा। इस बार हँसी गले में नहीं अटकी।
"तू बड़ी शातिर है।"
"तेरी बहन हूँ।" वो दौड़कर अंदर गई।
मैं आँगन में खड़ा रहा। हाथ में थैली। लाल मिट्टी।
और अंदर, चक्की की आवाज़ आ रही थी। धीमी। भारी। पर आज उसमें कुछ अलग था। बीच-बीच में रुक रही थी।
मैंने दरवाज़े से झाँका।
माँ चक्की पर बैठी थीं। पर आज कुछ गड़बड़ थी। उनका एक हाथ कमर पर था। पीठ झुकी हुई। और चेहरे पर पसीने की बूँदें।
मैंने डिब्बी रखी और अंदर गया।
"माँ।"
वो चौंकीं। हाथ झटके से चक्की पर रखा। और चक्की तेज़ चलने लगी। जैसे कुछ हुआ ही न हो।
"आ गया? खाना रखा है।"
"माँ, तेरी कमर—"
"कमर को क्या होगा।" उन्होंने चक्की तेज़ घुमाई। "बैठी रहती हूँ तो अकड़ जाती है। चलती हूँ तो ठीक है।"
पर उनका चेहरा झूठ बोल रहा था। पसीना अभी भी माथे पर था। और हाथ — हाथ काँप रहा था।
मैं पास गया। चक्की के पास बैठ गया। कुछ नहीं बोला। बस बैठ गया।
माँ ने एक पल मेरी तरफ़ देखा। फिर चक्की रोक दी।
"कल जा रहा है?"
"हाँ।"
"फ़ीस कितनी है?"
मैं चुप हो गया।
"पता नहीं।"
माँ ने चक्की का हत्था छोड़ा। उठीं। पीठ दर्द से टेढ़ी थी, पर उन्होंने दिखाया नहीं। वो दीवार पर टंगी टूटी घड़ी के नीचे गईं। वहाँ एक मिट्टी का घड़ा था। उन्होंने घड़े में हाथ डाला। कुछ निकाला।
एक पोटली। कपड़े में बँधी हुई।
"ले।"
मैंने खोली। सिक्के थे। गिने हुए। जैसे सालों से जोड़कर रखे हों।
"माँ, ये—"
"तेरे पिता के अखाड़े के दिनों से बचाए हैं।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें सूखी थीं, पर उनमें वो गहराई थी जो सिर्फ़ माँओं की होती है। "उन्होंने कहा था — 'एक दिन वीर को देना। अगर वो अखाड़े जाए तो।'" उन्होंने पोटली मेरे हाथ में भींच दी। "मैंने सोचा था, कभी नहीं दूँगी। पर आज…" उनकी आवाज़ रुकी।
"माँ—"
"भूखे पेट की दुआ सीधी ऊपर जाती है, बेटा।" उन्होंने माथे पर हल्दी का टीका छुआ। "तेरे पिता की दुआ भी सीधी गई थी। पर वो बीमार पड़े। मर गए।" उन्होंने मेरी आँखों में देखा। "मैं तुझे रोक नहीं रही। पर एक बात सुन ले — वहाँ जो पानी मिले, वो मत पीना। बस इतना।"
मैंने सिर हिलाया।
"और वीर।" उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा। "अगर वहाँ कुछ गड़बड़ दिखे, तो लड़ना मत। भाग आना। पहलवानी बाद में, जान पहले।"
"माँ, तू डर रही है?"
माँ ने हाथ छोड़ा। वो चक्की पर लौटीं।
"डर क्या? मैं तो बस अपना काम जानती हूँ।" उन्होंने चक्की का हत्था पकड़ा। "तू जा। मुझे आटा चाहिए।"
पर चक्की घूमी नहीं। उनका हाथ थम गया। एक पल को उनका शरीर झुका। फिर उन्होंने ज़ोर लगाया। चक्की धीरे से घूमी। फिर घूमी। फिर चलने लगी।
मैं वहीं खड़ा रहा। पोटली हाथ में। भारी।
मैंने थैली — गुड़िया वाली लाल मिट्टी वाली थैली — जेब से निकाली। उसे पोटली के साथ रखा। दोनों साथ।
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