Spirit of a Fighter3 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 3

6 min read November 5, 2026

"रामदीन।" उसने धीरे से कहा। "मेरे पापा के पास उसका नाम का एक काग़ज़ है। पुराने रिकॉर्ड में।"

"काग़ज़?"

"पुराने पहलवानों का हिसाब। कौन आया, कौन गया, कब बीमार पड़ा। मैंने कभी ध्यान नहीं दिया था। सोचा था बुढ़ापे का हिसाब है।"

वो चुप हो गई। मैं भी चुप। दोनों के बीच सिर्फ़ सुबह की ठंडी हवा थी, और दूर कहीं किसी कुत्ते के भौंकने की आवाज़।

तभी अखाड़े के अंदर से गिलासों की खनक आई।

मैं सिहर गया। वो आवाज़ — काँच का काँच से टकराना, फिर पानी का गिरना। मैं जानता था ये क्या है। ये वही गिलास है। वो वाला।

"मुझे जाना है," मीरा ने कहा। "पर सुनो—" उसने मेरी तरफ़ देखा, "कल सुबह फिर आना। इसी जगह। मैं अपने पापा के रिकॉर्ड देखूँगी। अगर तुम सच बोल रहे हो, तो ये सिर्फ़ पानी का सवाल नहीं।"

"और अगर मैं झूठ बोल रहा हूँ?" मैंने पूछा। पता नहीं क्यों पूछा। शायद ये देखना था कि वो क्या कहेगी।

वो मुड़ी, और उसके छोटे बाल हवा में हिले।

"तुम झूठ नहीं बोल रहे।" उसने कहा। "झूठे आदमी की आँखें इतनी थकी नहीं होतीं।"

वो अंदर चली गई। दरवाज़े पर वो एक बार रुकी, मुड़कर देखा, फिर अंदर।

मैं वहीं खड़ा रहा। मेरी जेब में दो रुपये की ठंडी गोली खड़खड़ाई। मेरी नाक में अभी भी वो कड़वाहट थी। मैंने धोती का कोना उठाकर नाक पोंछा। खून की पतली लकीर आ गई थी। ये तीसरी बार हुआ था इस महीने में। जितनी तेज़ सूंघता हूँ, उतना सिर भारी होता है।

मैं पलटा और तेज़ कदमों से वहाँ से हट गया। अखाड़े की लाल दीवार मेरे पीछे छूट गई। गाँव की गली में सुबह की धूप फूट रही थी, गोबर से लिपी दीवारें सूख रही थीं, किसी के घर से चूल्हे का धुआँ उठ रहा था।

तभी सामने से कोई आया।

"अरे भाई!"

मैंने सिर उठाया। टिंकू। सिर पर टोपी, कान के पीछे पेंसिल, हाथ में मिट्टी की कटोरी जिस पर कपड़ा ढका था। उसके चेहरे पर वो हमेशा वाली मुस्कान थी, जैसे दुनिया में कुछ भी गलत नहीं हो सकता।

"तू इतनी सुबह?" उसने कटोरी मेरी तरफ़ बढ़ाई। "ले, गरम है। अभी-अभी बनाई है।"

"नहीं टिंकू—"

"चुप।" उसने कटोरी मेरे हाथ में थमा दी। "मेरी माँ को लगता है दुकान पर बिक गई। तू चुप रहना बस। समझा?"

मैंने कटोरी देखी। ऊपर से कपड़ा हटाया। खीर। ऊपर बादाम की पतली कतरनें, और केसर की एक लकीर। भाप उठ रही थी।

मेरे हाथ काँपे।

मैंने पहला निवाला मुँह में डाला। और मेरी आँखें भर आईं।

भूख इतनी थी कि स्वाद आँसू बनकर निकला। मैंने जल्दी से दूसरा निवाला लिया ताकि टिंकू देख न ले। पर वो देख रहा था। वो हमेशा देखता है, बस बोलता नहीं।

"धीरे खा, भाई," वो बोला। "कोई चुरा नहीं रहा।"

"तू क्यों नहीं खाता?" मैंने मुँह भरकर पूछा।

"मैंने चख ली है।" उसने कहा। "बनाते वक़्त।" फिर वो मेरे पास बैठ गया, दीवार के सहारे। "सुन, एक बात बता। मेरा एक सपना है।"

"तू हर रोज़ नया सपना देखता है।"

"ये पक्का है।" उसने कान के पीछे की पेंसिल निकाली और हवा में कुछ लिखने लगा। "टिंकू मिष्ठान भंडार। भाई, टीन का शेड होगा, पर नाम बड़ा होगा। बड़ा वाला बोर्ड। ऊपर लिखा होगा — 'रामपुर का सबसे मीठा'। और अंदर दीवार पर एक तस्वीर लगी होगी।"

"किसकी?"

"उस पहलवान की जो मेरी मिठाई खाकर जीता हो।" उसने पेंसिल वापस कान के पीछे खोंस दी। "नाम भी साथ लिखा होगा। दोनों के।"

मैंने खीर का आख़िरी निवाला मुँह में डाला। मीठा। बहुत मीठा। पर मेरे गले से नीचे उतरते वक़्त वो मीठा कहीं और चला गया — सीधे छाती में, जहाँ से आँसू आते हैं।

"तू पहलवान बनेगा," टिंकू ने अचानक कहा। बिना हँसे। पहली बार बिना हँसे। "मुझे पता है। मैंने तेरी नाक देखी है। जो आदमी अखाड़े का पानी सूंघकर पहचान ले, वो पहलवानी भी सूंघ लेगा।"

"चुप कर।" मैंने कटोरी उसे लौटाई। "कहीं सुन ले तो हँसेंगे।"

"हँसने दो।" उसने कटोरी ली और उसमें बची एक बूँद को उँगली से साफ़ किया। "एक दिन वो हँसी रुक जाएगी।"

मैं उठा। घुटनों पर मिट्टी लगी थी। मैंने झटकी।

तभी पीछे से आवाज़ आई — तेज़, चमकीली, जैसे कोई बाज़ार में सबसे ऊँची आवाज़ में बोल रहा हो।

"अरे! अरे रुकना ज़रा!"

मैं पलटा। सुक्खी बुआ आ रही थीं। भरी साड़ी, चमकीला रंग, हाथ में पान का बीड़ा। ऐसे चल रही थीं जैसे पूरा गाँव उनका हो।

"अरे मैंने तो सुना है," वो शुरू हुईं, और मेरा हाथ ज़ोर से काँपा, "अखाड़े में आज कोई बाहर वाला घुसा था! सुबह-सुबह! लुट्टन ने ही बताया मेरे बहनोई को, और मेरे बहनोई ने दूध वाले को—"

कटोरी मेरे हाथ से छूटने को हुई। टिंकू ने फुर्ती से पकड़ ली।

"बुआ," टिंकू बोला, "कौन बाहर वाला? कोई नहीं था। लुट्टन तो खुद सुबह-सुबह नींद में बड़बड़ाता है।"

सुक्खी बुआ ने उसे ऐसे देखा जैसे वो उनका सबसे पुराना दुश्मन हो।

"टिंकू, तू अपनी मिठाई संभाल।" फिर उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें छोटी हो गईं। "और ये… वीर, तू इतनी सुबह इस तरफ़ क्या कर रहा था? तेरा काम तो ईंटों वाला है, ना?"

मेरी साँस रुक गई।

"बुआ, वो मेरे साथ था," टिंकू तुरंत बोला। "मैंने खीर दी थी, खा रहा था।"

"टिंकू की खीर?" सुक्खी बुआ का चेहरा बदला। "अरे तू तो कहता था सब बिक जाती है।"

टिंकू एक पल के लिए अटका। फिर मुस्कुराया। "बुआ, आपके लिए कभी नहीं बिकती। कल आपके घर पहुँचा दूँगा।"

बुआ का चेहरा खिल गया। "अच्छा? तो ठीक है।" वो पान चबाकर आगे बढ़ गईं, पर जाते-जाते मुड़कर बोलीं, "अच्छा, ये भी सुन ले — अखाड़े में आज कोई नई भर्ती हो रही है। कालू काका ने बताया। बाहर वालों को भी मौका मिलेगा, इतना कह रहे हैं।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "सोच ले, वीर। ईंट ढोने से अच्छा है, एक बार मिट्टी में पैर तो रख।"

वो चली गईं।

मैं वहीं खड़ा रहा। दिल ज़ोर से धड़क रहा था। टिंकू मेरी तरफ़ देख रहा था।

"नई भर्ती," उसने धीरे से कहा। "भाई, ये तेरा मौका है।"

"टिंकू—"

"नहीं, सुन।" उसने कटोरी मेरे हाथ में वापस थमा दी, खाली। "तू बाहर वाला है, तो क्या? मिट्टी किसी की जागीर नहीं होती। कालू काका ने खुद कहा है। जो मिट्टी में पसीना डालेगा, वो उसका होगा।"

मैंने कटोरी देखी। खाली। खीर खत्म। पर मेरे अंदर कुछ भर रहा था — या शायद खाली हो रहा था। पता नहीं।

"माँ को क्या बोलूँगा?" मैंने कहा। ये सवाल अपने आप निकला।

"सच बोल देना।" टिंकू उठा और अपनी टोपी ठीक की। "वो तुझसे ज़्यादा जानती है। और सुन—" वो हँसा, "अगर तू अखाड़े में घुसा, तो मेरी खीर रोज़ पहुँचेगी। फ्री में। मेरा भी तो कुछ फ़ायदा होना चाहिए।"

मैं हँसा। पहली बार आज सुबह। छोटी-सी हँसी, पर असली।

वो चला गया, टोपी हिलाता हुआ, कान के पीछे पेंसिल, हाथ में खाली कटोरी।

मैं घर की तरफ़ चला।

रास्ते में मेरी नाक से खून की एक और बूँद आई। मैंने पोंछ दी। पर सिर भारी था। जब भी मैं ज़्यादा सूंघता हूँ, ऐसा ही होता है। डर लगता है कभी-कभी — कहीं ये नाक मुझे किसी दिन बहुत बड़ी मुसीबत में न डाल दे।

घर पहुँचा तो आँगन में चक्की चल रही थी। माँ। सुबह के सात बजे। उनकी पीठ झुकी हुई थी, कमर पर हाथ टिकाया हुआ। मैंने पहले कभी ध्यान नहीं दिया था — उनकी कमर झुक रही है। धीरे-धीरे। जैसे चक्की।

"माँ।"

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