Spirit of a Fighter – Chapter 393
माँ ने मेरी आँखों में देखा। और फिर वो बोलीं जो मेरे रोंगटे खड़े कर गया।
"क्योंकि तहखाने में वो चीज़ है जो उसने खुद छिपाई है। और अगर तू उसे ढूँढ लेगा, तो कल की कुश्ती की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी।"
उन्होंने मेरा हाथ कसकर पकड़ा।
"आज रात जाना है, तो अभी चल। कालू काका का इंतज़ार मत करना। जो चीज़ कल सुबह तक का इंतज़ार करेगी, वो आज रात खत्म हो जाएगी।"
॥
माँ ने मेरा हाथ पकड़ा और मैं चल पड़ा। पर टिंकू की आवाज़ फिर आई — "भाई, रुक।"
वो काग़ज़ माँ ने अपनी साड़ी में रख लिया था। पर टिंकू के हाथ में एक और चीज़ थी। छोटी सी। चमक रही थी रात की लालटेन में।
"ये भी चबूतरे के नीचे था," उसने कहा। "काग़ज़ के साथ।"
मैंने हाथ बढ़ाया। एक चाँदी की अंगूठी थी। पुरानी, घिसी हुई। उस पर सिर्फ़ एक निशान खुदा था — तिरछी रेखा, जैसे किसी ने चाकू से खींच दी हो।
माँ ने अंगूठी देखी और उनका हाथ मेरे कंधे पर रुक गया। कसकर। जैसे किसी ने अचानक दीवार पकड़ ली हो।
"माँ?"
"ये रघुवीर की अंगूठी है," उन्होंने धीरे से कहा। "तेरे पापा की। उन्होंने इसे उस दिन उतारा था जिस दिन उन्होंने अखाड़े में आख़िरी बार पैर रखा था। बोले थे — जब तक अखाड़े की मिट्टी मेरी नहीं होती, इसे नहीं पहनूँगा।"
मैंने अंगूठी मुट्ठी में भींच ली। धातु ठंडी थी, पर मेरी हथेली में उसका ठंडापन धीरे-धीरे पिघल रहा था।
"भैरव ने ये क्यों भेजी?"
माँ ने मेरी आँखों में देखा। उनकी आवाज़ में वो ठंडक अब भी थी, पर उसमें कुछ और भी था। डर। "वो नहीं भेज रहा है।"
"तो कौन?"
"जो तहखाने में है।"
रात के सन्नाटे में हम तीनों खड़े रहे। टिंकू ने कुछ कहना चाहा, पर चुप रहा। मैंने देखा उसके हाथ भी काँप रहे थे — नहीं, वो ठंड से नहीं। डर से।
"जो तहखाने में है," मैंने धीरे से दोहराया। "मतलब?"
माँ ने साड़ी का पल्ला ठीक किया। "तेरे पापा ने मुझसे एक बात कही थी, मरने से तीन रात पहले। बोले थे — सरस्वती, अगर मैं न रहूँ और ये अंगूठी कभी वापस आए, तो समझ लेना कि मेरा सच अब अकेला नहीं है। उसे कोई बुला रहा है।"
"कौन?"
"वही जिसने इसे तहखाने में रखा था।"
मेरे पैर जैसे ज़मीन में धँस गए। "तो फिर ये भैरव ने नहीं भेजी। ये उसने भेजी जो अंदर बंद है।"
माँ ने सिर हिलाया। "और जिसने इतने सालों बाद इसे बाहर निकाला, वो चाहता है कि तू नीचे आए।"
टिंकू ने अचानक कहा, "तो चलो। अभी।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसका चेहरा पसीने से भीगा था, पर आँखों में वो ज़िद थी जो मैंने पहले कभी नहीं देखी। "टिंकू—"
"भाई, मैं पूरी ज़िंदगी डरता रहा हूँ। खीर बनाते डरा, दुकान खोलते डरा, तेरे साथ अखाड़े तक आते डरा। पर आज जब तू जाएगा, तो मैं तेरे पीछे-पीछे आऊँगा। चाहे जो हो।"
मैं कुछ नहीं बोला। गला भर आया था, और अगर बोलता तो आवाज़ तोड़ देता।
माँ ने टिंकू के सिर पर हाथ रखा। "तेरी माँ को पता है तू इतना बोलता है?"
टिंकू ने हँसने की कोशिश की। "नहीं। वो सोचती है मैं बस मिठाई बनाता हूँ।"
"तो जब ये सब खत्म हो," माँ ने कहा, "तू खुद उसे बताना। और मैं तेरी माँ को बताऊँगी कि उसका बेटा उस दिन कहाँ खड़ा था।"
टिंकू का हँसना अब सच्चा हो गया। हल्का, थोड़ा टूटा हुआ, पर सच्चा।
घर की तरफ़ चलते वक़्त मैंने अंगूठी को जेब में रखा और उसका ठंडापन मेरी जाँघ से चिपक गया। हर कदम पर वो मुझे छूता रहा। जैसे कोई उँगली से कह रहा हो — मैं यहाँ हूँ।
घर पहुँचकर माँ ने चूल्हा जलाया। रात के करीब एक बज रहे थे। मैंने कहा, "माँ, अब क्यों? सुबह—"
"बैठ," उन्होंने कहा। और उनकी आवाज़ में वो बात थी जो कोई बहस नहीं करता।
मैं बैठ गया। माँ ने दाल रखी, थोड़ी रोटी गरम की। और फिर वो मेरे सामने बैठीं, अपने हाथों को आँचल में छिपाकर।
"मैंने तुझे एक बात नहीं बताई," उन्होंने कहा। "बीस साल से।"
मेरे पेट में ठंडा झटका लगा। "क्या?"
"तेरे पापा मरे नहीं थे उस दिन।"
मैं सीधा हो गया। "क्या?"
"वो दो दिन और जीए थे। अखाड़े से लाकर उन्हें घर में रखा गया था। पर उनके मुँह से आवाज़ नहीं निकलती थी। सिर्फ़ आँखें खुलती थीं। और वो आँखें… वो आँखें तेरी तरफ़ देखती थीं। तू तब सिर्फ़ पाँच साल का था। तेरी माँ ने तुझे उनके पास बैठाया था। तूने उनका हाथ पकड़ा था।"
मेरी आँखें जलने लगीं। "मुझे याद नहीं।"
"तू छोटा था।"
"तो फिर किसने…"
"तीसरे दिन सुबह जब मैं पानी लेकर आई, तो उनके हाथ में कुछ था।" माँ ने मेरी तरफ़ देखा। "एक काग़ज़ का टुकड़ा। उन्होंने अपनी आख़िरी ताकत से कुछ लिखा था। बस दो शब्द।"
"क्या?"
माँ ने आँचल से एक छोटा काग़ज़ निकाला। ज़र्द पड़ा हुआ, मुड़ा हुआ। जैसे कोई उसे बीस साल से अपनी छाती पर रखे हुए हो।
"पढ़," उन्होंने कहा।
मैंने काग़ज़ खोला। उस पर काँपते हाथ की लिखाई थी, दो शब्द — मिट्टी नहीं।
मैंने माँ की तरफ़ देखा। "इसका मतलब?"
माँ की आँखों में पानी था, पर वो रो नहीं रही थीं। "मतलब ये कि उन्हें ज़हर पानी में नहीं मिला था। उन्हें ज़हर मिट्टी में मिलाकर दिया गया था। तभी वो अखाड़े में गिरे। ज़मीन उनके पैरों के नीचे से खिसक गई थी।"
मेरी साँस रुक गई।
"और तहखाने की मिट्टी," माँ ने धीरे से कहा, "वो अब भी वहीं है। भैरव उसी को उठाने जा रहा है। अगर वो उस मिट्टी को अपने पास ले गया, तो वो किसी को भी, कभी भी, कहीं भी गिरा सकता है। किसी को पता भी नहीं चलेगा कि हुआ क्या।"
मैंने रोटी छोड़ दी। भूख जैसे कहीं भाग गई थी।
"तो हमें उससे पहले पहुँचना होगा।"
"हाँ।"
"पर कैसे? कालू काका ने कहा था आधी रात को नीम के पेड़ के पास मिलना—"
"कालू काका आएँगे नहीं," माँ ने कहा।
मैं रुक गया। "क्या?"
"वो डर गए हैं।" माँ की आवाज़ में कोई इल्ज़ाम नहीं था, बस थकान थी। "शाम को उनका बेटा आया था। भैरव ने उसे धमकाया है। कालू काका ने मुझे पर्ची भेजी है।" उन्होंने जेब से काग़ज़ निकाला। "लिखा है — 'माफ़ करना बेटा। मेरी आँखें तेरे साथ हैं, पर मेरे पैर आज नहीं चलेंगे। रास्ता तू जानता है। नीम के पेड़ के पीछे तीसरा पत्थर। उसे उठा। उसके नीचे जो दिखे, वो तेरा रास्ता है।'"
मैंने पर्ची पढ़ी और मेरे हाथ काँपे। कालू काका, जिन्होंने मुझे मिट्टी गूंधना सिखाया। जो हर सुबह अखाड़े की दीवारों को सहलाते हैं जैसे कोई बूढ़ा अपने बच्चों को सहलाता हो। वो डर गए। और मैं उन्हें दोष नहीं दे सकता था। भैरव का डर सबसे बड़ा था।
"तो अब?" मैंने पूछा।
माँ ने मेरे हाथ पर हाथ रखा। उनकी हथेली गरम थी, चूल्हे की आँच से। "तू अकेला नहीं है।"
"पर कालू काका—"
"कालू काका ने तुझे रास्ता दे दिया। वो भी साथ है। बस अपने पैरों से नहीं।"
टिंकू ने खीर की कटोरी मेरी तरफ़ सरका दी। "खा। भूखे आदमी की आँखें धोखा देती हैं।"
मैंने एक चम्मच खाया। गुड़ की मिठास और दूध की गंध। और अचानक मुझे अपने पापा की याद आई — कैसे वो मुझे घुटनों पर बिठाकर खिलाते थे, और कहते थे — "वीर, खाने वाला ही लड़ने वाला होता है।"
मैंने पूरी कटोरी खत्म की।
फिर मैं उठा। माँ ने मुझे रोका नहीं। बस उठकर दीवार पर टँगी धोती की तरफ़ गईं। पापा की धोती। लाल, मोटी, किनारों पर हल्की घिसी हुई।
"इसे पहन," उन्होंने कहा। "आज रात कोई कुश्ती नहीं है। पर जब तू उस तहखाने से लौटे, तो तेरे पास पहनने के लिए कुछ हो।"
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