Spirit of a Fighter – Chapter 394
मैंने धोती पहनी। माँ ने सामने खड़े होकर कमर पर गाँठ बाँधी, ठीक से, जैसे बीस साल पहले बाँधी होगी। उनके हाथ काँप रहे थे, पर गाँठ मज़बूत थी।
फिर वो पीछे हटीं और मुझे देखा। लंबी नज़र से।
"तू बिलकुल उन जैसा लग रहा है," उन्होंने धीरे से कहा। और फिर उनकी आवाज़ टूट गई। "बिलकुल।"
मैंने कुछ नहीं कहा। क्योंकि अगर कहता, तो रो पड़ता।
गुड़िया दरवाज़े पर खड़ी थी। मुझे नहीं पता थी वो कब उठी। उसकी आँखें भीगी थीं, पर वो रो नहीं रही थी। उसने अपनी जेब से एक छोटी थैली निकाली — लाल मिट्टी की, वही जो उसने अखाड़े से चुपके से भरी थी।
"ले जा," उसने कहा। "मैंने इसे तेरे तकिये के नीचे रखा था। तू सो नहीं रहा था, इसलिए ले आई।"
मैंने थैली ली। उसे सीने से लगाया। मिट्टी की गंध — वही अखाड़े की, जो मेरे बचपन से मेरी नाक में बसी है।
"गुड़िया," मैंने कहा, "तू माँ के पास रहना।"
"मैं तेरे पास रहूँगी," उसने कहा। "माँ के पास तो मैं हमेशा हूँ।"
माँ ने उसकी चोटी पकड़कर हल्का खींचा। "तू घर में रहेगी। बस।"
गुड़िया ने मुँह बनाया, पर कुछ नहीं बोली।
टिंकू ने अपनी जेब से एक छोटी डिब्बी निकाली। लोहे की, ज़ंग लगी। "ये क्या है?" मैंने पूछा।
"मेरी माँ की। उनकी माँ की थी। इसमें सुहागा रखा जाता है।" उसने डिब्बी खोली। अंदर पीला पाउडर था। "सुहागा ज़हर को पहचानता है। अगर पानी या मिट्टी में ज़हर हो, तो इसे छूने से वो काला पड़ जाता है।"
मैंने डिब्बी ली। "तू ये कब से लिए फिर रहा था?"
टिंकू ने कंधे उचकाए। "कल रात से। सोचा, काम आएगा।" फिर वो हँसा। "देख, मैं बस खीर बनाना जानता हूँ। पर मेरी माँ कहती है — अच्छा रसोइया वो होता है जो अपनी रसोई की हर चीज़ को जानता है।"
मैंने डिब्बी अपनी जेब में रखी। फिर मैंने टिंकू के कंधे पर हाथ रखा।
"तू मेरे साथ आ रहा है," मैंने कहा। "पर एक शर्त है।"
"क्या?"
"डर लगे तो बोल देना। छिपाना मत।"
टिंकू ने एक पल सोचा। फिर बोला, "और तू?"
"मैं भी।"
हम दोनों हँसे। हल्का सा। जैसे बारिश में भीगी रस्सी को निचोड़ दिया हो।
रात के करीब दो बजे हम निकले। माँ दरवाज़े पर खड़ी रहीं। मैंने पलटकर देखा। उनके माथे पर हल्दी का टीका था, आँचल सिर पर, और हाथ जुड़े हुए। वो कुछ नहीं बोलीं। बस खड़ी रहीं। और मैं जानता हूँ कि जब तक मैं लौटकर नहीं आया, वो वहीं खड़ी रहेंगी।
गली के मोड़ पर मैंने पलटकर देखा। दरवाज़े पर कोई नहीं था। पर खिड़की के पीछे एक परछाई थी। माँ। दीया जलाकर खिड़की पर रख रही थीं।
मैंने कदम तेज़ किए।
नीम का पेड़ अखाड़े की पिछली दीवार के पास है। बाहर से। पुराना, सूखा-सा, पर अभी भी छाया देने लायक। उसके नीचे मैंने पत्थर ढूँढे। पहला, दूसरा, तीसरा।
तीसरा पत्थर थोड़ा अलग था। बैठा हुआ, ज़मीन में धँसा। मैंने उसे उठाया। टिंकू ने लालटेन नीचे की।
पत्थर के नीचे एक लोहे का छल्ला था। ज़ंग लगा। मैंने उसे खींचा। ज़मीन का एक टुकड़ा उठा — पत्थर की प्लेट, जिसके नीचे अंधेरा था।
टिंकू ने लालटेन अंदर की। सीढ़ियाँ। नीचे जाती हुईं। पुरानी, मिट्टी से ढकी, पर सीढ़ियाँ।
"ये तो…" टिंकू की आवाज़ धीमी थी।
"कुआँ नहीं है," मैंने कहा। "ये दूसरा रास्ता है। कालू काका ने बताया था — कुएँ के पीछे नीम के पास।"
"ये कुएँ के पीछे है?"
"तहखाने के पीछे।" मैंने उसकी तरफ़ देखा। "ये सीधा तहखाने में जाता है।"
टिंकू ने गला साफ़ किया। "तो… चलें?"
मैंने एक गहरी साँस ली। हवा में मिट्टी की गंध थी, पर उसमें कुछ और भी था। पुरानी। बहुत पुरानी। जैसे कोई बंद किताब खुली हो।
मैंने पहला कदम रखा।
सीढ़ियाँ संकरी थीं। मेरे कंधे दीवारों को छू रहे थे। नीचे जैसे-जैसे गया, हवा भारी होती गई। मीठी। गुड़ जैसी। पर उसमें एक कड़वाहट थी, जो मैं पहचानता था।
ज़हर।
मैं रुका। टिंकू मेरे पीछे था, उसकी साँस मेरी गर्दन पर लग रही थी।
"भाई?"
"रुक।"
मैंने सुहागे की डिब्बी निकाली। उँगली में थोड़ा पाउडर लिया। हवा में फेंका। पाउडर नीचे गिरा — और जहाँ गिरा, वहाँ हल्का काला पड़ गया।
मेरा दिल धक् से रह गया।
"यहाँ हवा में ज़हर है," मैंने कहा। "भैरव ने इसे फैला दिया है। शायद पहले से।"
टिंकू ने अपनी जेब से कपड़ा निकाला। फाड़कर दो टुकड़े किए। एक मुझे दिया। "मुँह पर बाँध ले।"
हमने बाँधा। कपड़े से साँस लेने में तकलीफ़ हो रही थी, पर अंदर ज़हर भी नहीं जा रहा था।
नीचे उतरते-उतरते सीढ़ियाँ खत्म हुईं। और मैं एक बड़े कमरे में खड़ा था।
लालटेन की रोशनी में मैंने देखा — मिट्टी की दीवारें, ऊँची। कमरा इतना बड़ा था कि अंधेरा दूर तक फैला था। और बीच में, ज़मीन पर, एक चौकोर गड्ढा था। जिसमें मिट्टी थी। लाल मिट्टी। चमकती हुई, जैसे अभी-अभी किसी ने उसे गूंधा हो।
और उस गड्ढे के किनारे, एक बूढ़ा आदमी बैठा था। कुबड़ा। सफ़ेद दाढ़ी। आँखें बंद। हाथ जुड़े हुए।
मैंने उसे पहचाना। गुरुजी। जिनसे मैं कुएँ में मिला था। जो रघुवीर के गुरु थे। जिन्हें भैरव ने बीस साल कुएँ में बंद रखा था।
पर वो तो कुएँ में थे। मैंने उन्हें खुद बाहर निकाला था। टिंकू के शेड में छिपाया था।
तो ये कौन है?
मैंने लालटेन ऊपर की। टिंकू ने भी देखा। उसकी साँस हकलाई।
"भाई… ये तो…"
आदमी ने आँखें खोलीं।
और मेरे हाथ से लालटेन गिर गई।
क्योंकि वो आदमी गुरुजी थे। बिलकुल गुरुजी। वही चेहरा, वही दाढ़ी, वही झुर्रियाँ। फ़र्क़ सिर्फ़ इतना था कि उनकी आँखें खुली थीं और उनमें कोई डर नहीं था।
"तू आ गया," उन्होंने कहा। आवाज़ सूखी, पर साफ़। "मैं जानता था तू आएगा।"
मैंने टिंकू की तरफ़ देखा। टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा। दोनों के चेहरे पर एक ही सवाल था।
"पर…" मैंने कहा। "आप तो…"
"हाँ," उन्होंने कहा। "मैं गुरुजी हूँ। और वो जो तूने कुएँ में देखा, वो मेरा भाई था। जुड़वाँ।"
मेरे पैर जैसे जम गए।
"बीस साल पहले," गुरुजी ने धीरे से कहा, "भैरव ने हम दोनों को पकड़ा। मुझे यहाँ बंद किया, और मेरे भाई को कुएँ में। हम दोनों को अलग-अलग रखा, ताकि हम एक न हो सकें। ताकि सच कभी पूरा न बने।"
"पर आपने कुएँ वाले गुरुजी से क्यों नहीं कहा—"
"क्योंकि मैं नहीं जानता था कि तू किससे पहले मिलेगा।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "और अगर भैरव का आदमी तेरे कान में ये डाल देता कि तहखाने में कोई है, तो तू यहाँ आता ही नहीं।"
मैंने गड्ढे की तरफ़ देखा। लाल मिट्टी। "ये क्या है?"
गुरुजी उठे। धीरे-धीरे। उनकी हड्डियाँ चटकीं। "ये वो मिट्टी है जिसे तेरे पापा ने बचाया था। असली मिट्टी। जो ताकत देती है, ज़हर नहीं।"
"पर भैरव—"
"भैरव उस दिन आने वाला है। आज रात।" गुरुजी ने मेरी आँखों में देखा। "और उसे लगता है कि ये मिट्टी ज़हर है। उसे कोई नहीं बताएगा कि यही वो चीज़ है जो उसके सारे ज़हर को बेअसर कर सकती है।"
मेरा दिल ज़ोर से धड़का।
"तो फिर…"
"तो तू इसे पहले उठाएगा," गुरुजी ने कहा। "और मैं तुझे बताऊँगा कि इसे कैसे इस्तेमाल करना है।"
उन्होंने हाथ बढ़ाया। मैंने अपना हाथ आगे किया। पर तभी ऊपर से आवाज़ आई। भारी। धातु की। जैसे कोई भारी दरवाज़ा खुल रहा हो।
गुरुजी का चेहरा सफ़ेद पड़ गया।
"वो आ गया," उन्होंने फुसफुसाया। "तू जल्दी कर।"
टिंकू ने मेरी बाँह पकड़ी। "भाई, ऊपर से आवाज़ आ रही है। कोई आ रहा है।"
मैंने गड्ढे की तरफ़ देखा। मिट्टी। लाल, चमकती हुई। जैसे बुला रही हो।
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