Spirit of a Fighter – Chapter 39
अखाड़े तक का रास्ता आज छोटा लगा। गाँव के लोग रास्ते में खड़े थे। कुछ ने हाथ उठाया। कुछ ने मुँह फेरा। कोई बोला "जीत जा, बेटा।" कोई बोला "पागल है, बीस साल में कोई भैरव से नहीं जीता।"
सुक्खी बुआ नहर के मोड़ पर खड़ी थीं, चमकीली हरी साड़ी में, हाथ में पान का बीड़ा। वो मुझे देखते ही चलने लगीं, मेरे साथ-साथ, तेज़ कदमों से।
"अरे वीर, सुन — मैंने तो सुना है कि भैरव ने रात में किसी को तेरे घर भेजा था।"
"बुआ —"
"अरे रुक, सुन तो। मैंने ये भी सुना है कि वो तुझे मिट्टी में गिराने के लिए खास तेल मँगवाया है शहर से।" उन्होंने आवाज़ धीमी की। "पर एक बात और सुनी — रणवीर सिंह आज खुद अखाड़े आ रहे हैं। बीस साल बाद। मैंने तो सुना है वो —"
"बुआ," मैंने रोका। "आज मैं लड़ने जा रहा हूँ। बाद में सब सुनूँगा।"
"अरे बाद में क्या —" वो रुकीं, फिर मेरे कंधे पर हाथ रखा। उनका हाथ भारी था। "जीत जा, बेटा। मैं गाँव की सबसे बड़ी चुगलखोर हूँ, पर आज मैं सच बोल रही हूँ — तू जीतेगा। मुझे पता है।"
मैं रुक गया। उन्हें देखा।
"कैसे पता?"
"क्योंकि तेरी आँखों में वो बात है जो रघुवीर की आँखों में थी।" उन्होंने कहा, और आगे बढ़ गईं, पान थूकती हुई।
अखाड़े का गेट खुला था। अंदर भीड़ थी। पूरा रामपुर आया था। दीवार पर चढ़े बच्चे, चबूतरे पर बैठे बूढ़े, औरतें दूर खड़ी, सिर पर दुपट्टा। मिट्टी लाल थी और उसमें से भाप उठ रही थी, जैसे अभी-अभी किसी ने पानी छिड़का हो।
मैंने नाक से साँस ली।
मिट्टी की गंध आई। पर उसके नीचे कुछ और था। तेल। चिकना, भारी, मशीनों वाला। मैंने कदम रोके।
कालू काका दीवार के पास खड़े थे, हाथ में गमला। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा और आँख से इशारा किया — "ऊपर। ऊपर की परत।"
मैं समझ गया। भैरव ने ऊपर तेल मिली मिट्टी बिछा दी थी। पर नीचे, गहरे में, कालू काका की बिछाई पुरानी परत थी — रघुवीर की परत।
मैं मैदान में उतरा। पैर धोती से बाहर। मिट्टी पहले ठंडी लगी, फिर गरम। मैंने आँखें बंद कीं और साँस ली। पापा की गंध। पुरानी, हल्की, पर वहाँ थी। जैसे कोई बहुत दूर से हाथ हिला रहा हो।
भैरव आया। लाल धोती, सोने की चेन, तेल लगी मूँछें। उसके पीछे लुट्टन था, और लुट्टन के हाथ में गिलास — वही पीतल का, जिसमें हल्का हरा पानी था।
भैरव ने हाथ उठाया। भीड़ चुप हुई।
"रामपुर वालो," उसकी आवाज़ मीठी थी, जैसे गुड़ का शीरा। "आज का दिन बड़ा है। आज रघुवीर का बेटा मैदान में उतरा है। मैं तो कहूँगा — ये बात ही बड़ी है।" वो मेरी तरफ़ मुड़ा। "पर हमारा अखाड़ा का नियम है। हर पहलवान पहले ये पानी पीता है। ताकत का पानी।"
वो गिलास मेरी तरफ़ बढ़ा।
भीड़ में सन्नाटा। किसी ने साँस तक नहीं ली।
मैंने गिलास देखा। फिर भैरव को देखा।
"नहीं।"
भैरव का हाथ वहीं रुका। उसकी मुस्कान थोड़ी सी टेढ़ी हुई।
"बेटा, ये रीत है। रीत तोड़ने वाला —"
"ये ज़हर है।" मैंने कहा।
मेरी आवाज़ ऊँची नहीं थी। पर इतनी साफ़ थी कि दीवार पर बैठा बच्चा भी सुन गया।
"ये पानी ज़हर है। इसमें वो चीज़ घोली गई है जो पहले ताकत देती है, फिर उम्र खा जाती है। मेरे पापा ने ये पिया था। रघुवीर ने पिया था। और यही पीकर वो धोखे से हारे थे — और फिर मरे।" मैंने भीड़ की तरफ़ देखा। "इसी पानी से ग्यारह पहलवान गए। ग्यारह!"
लोगों में हलचल हुई। कोई बोला "क्या?" कोई बोला "सच में?" सुक्खी बुआ सबसे आगे खड़ी थीं, मुँह खुला, पान का बीड़ा हाथ में ही रुका हुआ।
भैरव का चेहरा उतरा। पर बस एक पल। फिर वो फिर मुस्कुराया — और वो मुस्कान मुझे पहले से ज़्यादा डरावनी लगी।
"बेटा, तेरे पापा दुखी थे। उनके दिमाग़ में —"
"मेरे पापा के दिमाग़ में कुछ नहीं था।" मैंने कहा। "उनके दिमाग़ में सच था। और वो सच तुझे रास नहीं आया।"
भैरव की आँखें ठंडी हो गईं। उसने गिलास लुट्टन को वापस दिया।
"ठीक है।" उसकी आवाज़ अब मीठी नहीं थी। "जो रीत नहीं मानता, उससे रीत नहीं मानी जाती। लुट्टन!"
लुट्टन आगे आया। मोटा शरीर, छोटी मूँछें, आँखों में ज़हर से ज़्यादा गुस्सा। उसने कमर की रस्सी कसी और मेरी तरफ़ बढ़ा।
"आज ये लड़का सीखेगा," भैरव ने भीड़ से कहा, "कि अखाड़े में बड़ों से बोलने का क्या दाम है।"
पर मैंने सुना — भैरव ने लुट्टन से धीरे से कहा, "गिरा दे। बस गिरा दे। हड्डी तोड़ने की ज़रूरत नहीं। कल की नई मिट्टी के लिए इसे ज़िंदा चाहिए।"
मेरी नाक ने लुट्टन की साँस पकड़ी। वही कड़वाहट। वो भी पीता है। पहले से ही पीता है।
लुट्टन ने मुझ पर दाँव लगाया। भारी शरीर, तेज़ नहीं, पर ज़ोरदार। उसका हाथ मेरे कंधे पर पड़ा और मैं लड़खड़ाया। धोती का छोर मेरे पैर में उलझा। मैं गिरा।
मुँह में मिट्टी भर गई।
भीड़ में कोई हँसा। कोई चुप रहा। मैंने आँखें बंद कीं और मिट्टी को मुँह से निकाला। पर उससे पहले — मैंने उसे चखा।
और वो पहचानी हुई थी।
वो मिट्टी नहीं थी जो ऊपर बिछाई गई थी। वो नीचे की परत थी। गहरी। ठंडी। और उसमें वो गंध थी जो मैंने बचपन में माँ की अलमारी में रखी पापा की धोती में सूँघी थी।
पापा की मिट्टी।
मेरे पीछे लुट्टन का हाथ बढ़ा। मुझे दबाने के लिए। पर मैं पहले ही उठ चुका था। मेरे मुँह में मिट्टी थी, आँखों में मिट्टी थी, पर मेरे पैर नीचे की परत पर जमे थे — गरम मिट्टी। जहाँ कालू काका ने कहा था, वहीं।
"अब," मैंने फुसफुसाया। मुझे पता नहीं था किससे कह रहा हूँ। शायद पापा से।
लुट्टन फिर झपटा। मैं हटा। उसका भारी शरीर मेरे बगल से निकला और उसका पैर तेल वाली मिट्टी पर फिसला। वो लड़खड़ाया। और मैंने उस पल को पकड़ा — ऐसे जैसे सूखी घास में आग पकड़ती है।
मेरा हाथ उसकी कमर पर गया। मेरा पैर उसके पैर के पीछे। मैंने पूरा ज़ोर लगाया — कमर से, कंधे से, और उस मिट्टी से जो मेरे तलवों में थी।
लुट्टन गिरा।
भीड़ में सन्नाटा छा गया। इतना गहरा कि मुझे अपनी साँस की आवाज़ सुनाई दी।
भैरव का चेहरा सफ़ेद पड़ गया।
लुट्टन मिट्टी में पड़ा था। उसकी छाती ऊपर-नीचे हो रही थी। उसकी आँखों में सिर्फ़ हैरानी थी। डर नहीं। हैरानी।
"उठ," भैरव ने कहा। धीमी आवाज़ में। "उठ, कमीने।"
लुट्टन उठा नहीं। उसकी साँस फूल रही थी। और मैंने वो सुना जो बाकी किसी ने नहीं सुना — उसकी साँस में वो कड़वाहट अब और गहरी थी। जैसे ज़हर उसके अंदर बढ़ रहा हो। जैसे उसके फेफड़े छोटे हो रहे हों।
मैं उसके पास झुका।
"लुट्टन भाई," मैंने धीरे से कहा। "तू कब से पी रहा है?"
उसने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में पानी आ गया। "बीस साल से," उसने फुसफुसाया। "जब से यहाँ आया। वो कहता था — ये ताकत है।"
"ये ज़हर है।" मैंने उसका हाथ पकड़ा। "अब से मत पी।"
लुट्टन की आँख से आँसू गिरा। मिट्टी पर। और उस आँसू ने मिट्टी पर एक छोटा-सा गड्ढा बनाया।
भैरव ने अपनी धोती कसी। वो चिल्लाया, "भीड़ हटाओ! अखाड़ा बंद! आज का मुकाबला —"
"नहीं।" मैं खड़ा हुआ। "मुकाबला अभी खत्म नहीं हुआ।"
"बेटा —"
"तूने खुद चुनौती दी थी।" मैंने कहा। "कल सुबह, तूने कहा था। मैंने कबूल की थी। अब भी कबूल है। आज नहीं, तो कल। पर तेरे और मेरे बीच मुकाबला होगा।"
भैरव मेरी तरफ़ देखता रहा। उसकी मूँछें काँप रही थीं। फिर उसने अपनी आवाज़ संभाली, भीड़ की तरफ़ मुड़ा और कहा, "ये लड़का अभी बच्चा है। आज इसकी जीत एक सौभाग्य थी। पर मैं वादा करता हूँ — कल सुबह, इसी मिट्टी में, ये अपने पापा से मिलने जाएगा।"
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