Spirit of a Fighter38 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 38

7 min read November 5, 2026

"मैं एक बार का पहलवान हूँ, बेटा।" भैरव ने अपनी छाती थपथपाई। "और अखाड़े का मालिक मैं ही हूँ। जब मैं खुद मैदान में उतरूँ, तो नियम मैं बनाता हूँ।" उसने मेरी तरफ़ झुककर कहा, "कल सुबह। अगर डर लगे तो अभी बोल दे। किसी को कुछ पता नहीं चलेगा।"

मैंने उसकी आँखों में देखा।

"कल सुबह," मैंने कहा।

भैरव हँसा। वो पलटा और अखाड़े के अंदर चला गया।

मैं वहीं खड़ा रहा। मेरे पैर काँप रहे थे। मैंने अपनी मुट्ठी कसी, पर उँगलियाँ काँप रही थीं।

लुट्टन मेरे पास से गुज़रा। उसने धीरे से कहा, "तू मर गया। बीस साल में जो भैरव के सामने उतरा, वो लौटकर नहीं आया।"

वो चला गया।

मैं घर लौटा। रास्ते में कुछ नहीं सोचा। बस चला। पैर अपने आप चल रहे थे।

घर पहुँचा तो माँ आँगन में खड़ी थीं। मैं उनके पास गया और सीधे उनके पैरों पर गिर पड़ा।

"माँ," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ टूट रही थी, "मैं डर रहा हूँ।"

माँ ने मेरा सिर उठाया। मेरी आँखों में पानी था। मैंने पोंछा नहीं।

"माँ, वो खुद लड़ेगा। मेरे सामने। भैरव सिंह खुद मिट्टी में उतरेगा।"

माँ ने एक पल मेरी तरफ़ देखा। फिर उन्होंने मेरा सिर अपनी गोद में रख लिया। उनके हाथ ठंडे थे। पीछे चक्की चल रही थी — कोई और चला रहा था। गुड़िया होगी।

"सुन," माँ ने कहा। "तेरे पापा भी उसी के सामने उतरे थे। और वो हार गए थे।"

मैं चुप हो गया।

"पर वो हारे नहीं थे," माँ ने कहा। "उन्होंने पानी पी लिया था। भैरव ने उन्हें उतरने से पहले पिला दिया था। तेरे पापा ने बाद में बताया था — मुझे लगा था मैं लड़ रहा हूँ, पर मेरे हाथ मेरे नहीं थे।"

मेरी साँस रुक गई।

"तो पापा हारे नहीं थे?"

"हारे नहीं थे।" माँ ने मेरा माथा चूमा। "वो धोखे से हारे थे। और तू… तू उस पानी को पहचानता है। तू उसके पास नहीं जाएगा। तू अपनी मिट्टी में खड़ा होगा।"

मैं उठा। चक्की की आवाज़ पीछे चल रही थी। गुड़िया चला रही थी। उसने मेरी तरफ़ देखा और हाथ हिलाया।

मैंने माँ की तरफ़ देखा।

"माँ, कल तू अखाड़े आएगी?"

"आऊँगी।" उन्होंने कहा। "और एक बात — तेरे पापा की धोती अलमारी के नीचे है। वो पहनकर उतरना।"

मेरा गला भर आया। मैंने सिर हिलाया।

रात हुई। मैं चारपाई पर लेटा। आज नींद आ रही थी। शायद इसलिए कि डर बोल दिया था। माँ से बोल दिया। टिंकू से बोल दिया।

तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई। हल्की। मैं उठा।

कालू काका खड़े थे। उनकी लालटेन बुझी थी। उनका चेहरा गंभीर था।

"बेटा," उन्होंने धीरे से कहा। "मैंने आज रात अखाड़े की मिट्टी में वो पुरानी परत बिछा दी है। जिसे तेरे पापा ने छुआ था।"

"थैंक्यू, कालू काका।"

"पर सुन।" उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा। उनका हाथ काँप रहा था। "भैरव तुझे जीतने नहीं देगा। वो मिट्टी में कुछ मिला देगा। चिकना तेल या कुछ और। जिससे पैर फिसल जाएँ।"

"तो मैं क्या करूँ?"

"तेरा दाँव अपनी मिट्टी से उठेगा।" उन्होंने मेरी आँखों में देखा। "जहाँ पैर नरम लगे, वहीं दाँव लगाना। जहाँ मिट्टी ठंडी लगे, वहाँ मत रुकना। जहाँ गरम लगे, वहीं जमना।"

मैंने सिर हिलाया।

वो जाने लगे, फिर रुके।

"और बेटा, एक बात और।" उनकी आवाज़ और धीमी हो गई। "कुएँ वाले ने मुझे आज रात कुछ बताया। उसने कहा — भैरव के पास एक दाँव है जो उसने बीस साल से किसी के सामने नहीं खेला। वो दाँव है — रणवीर सिंह।"

"रणवीर सिंह? मीरा के पिता?"

"हाँ।" कालू काका ने सिर हिलाया। "अगर भैरव हारने लगेगा, तो वो उस बूढ़े पहलवान को मैदान में ले आएगा। कहेगा — तेरे पापा ने मुझे नहीं हराया था, मैंने उसे छोड़ दिया था। और वो बात सच है। रणवीर सिंह आज भी उसका राज़ जानते हैं।"

"तो मैं क्या करूँ?"

कालू काका मुस्कुराए। पहली बार आज रात उनकी आँखों में हल्की रोशनी आई।

"तू कुछ मत कर।" उन्होंने कहा। "रणवीर सिंह खुद करेंगे। बीस साल से वो उस पल का इंतज़ार कर रहे हैं।"

वो चले गए।

मैं दरवाज़े पर खड़ा रहा। ठंडी हवा आ रही थी। दूर कहीं कुएँ की तरफ़ से वो सुर फिर उठा, पर इस बार वो गा रहा था। धीरे-धीरे। जैसे कोई लोरी गा रहा हो।

मैंने आँखें बंद कर लीं। मेरे हाथ अब नहीं काँप रहे थे।

सुबह होने में अभी देर थी। पर मैं जानता था — ये रात बहुत लंबी होगी। और कल, सूरज निकलने के साथ, मेरी ज़िंदगी का सबसे बड़ा दाँव लगेगा।

मैंने अलमारी खोली। नीचे से पापा की धोती निकाली। उसमें आज भी उनकी गंध थी। मैंने उसे सीने से लगाया।

"पापा," मैंने फुसफुसाया, "कल मैं तेरी मिट्टी में खड़ा होऊँगा।"

और तभी, उसी पल, मुझे कुछ सुनाई दिया। बाहर से। दरवाज़े के ठीक बाहर से।

किसी के ज़ोर से साँस लेने की आवाज़। और फिर एक फुसफुसाहट — "वीर सिंह, कल मैदान में मैं भी होऊँगा। पर मैं तेरे साथ नहीं, तेरे सामने नहीं — तेरे अंदर होऊँगा।"

मैंने दरवाज़ा खोला।

बाहर कोई नहीं था। बस ज़मीन पर एक छोटी सी शीशी पड़ी थी — हरी। वही हरी बोतल।

और उसके साथ एक पर्ची — "ये पी ले, तो कल जीत पक्की है। बस एक घूँट। तेरे पापा ने भी पी थी।"

॥

हरी शीशी मेरी हथेली में ठंडी लग रही थी। मैंने उसे उँगलियों से दबाया। अंदर का पानी हिला। हल्की-सी खड़खड़ाहट आई। जैसे कोई दूर से बुला रहा हो।

पर्ची मैंने दोबारा पढ़ी। "तेरे पापा ने भी पी थी।"

मेरा हाथ काँपा। एक पल को लगा — क्या पता सच में पापा ने पी थी? क्या पता एक घूँट से… नहीं। मैंने दाँत भींचे और शीशी को ज़मीन पर पटक दिया।

शीशी नहीं टूटी। लोहे जैसी मज़बूत थी। बस लुढ़ककर दूर जा गिरी।

मैं दरवाज़े पर खड़ा ही था कि माँ की आवाज़ आई, "कौन था?"

"कोई नहीं, माँ।" मैंने कहा। "कुछ गिर गया था।"

पर माँ की आँखें कुछ और कह रही थीं। वो चारपाई से उठकर आईं, मेरे हाथ से शीशी ली, ऊपर उठाकर दीपक के सामने की। लौ उस पर पड़ी, और शीशी के अंदर कुछ चमका — जैसे सोने के ज़र्रे तैर रहे हों।

"ये वही है," माँ ने फुसफुसाया। "यही रंग। यही चमक। मैंने इसे तेरे पापा के हाथ में देखा था।"

"माँ —"

"फेंक दे।" उन्होंने शीशी मेरी हथेली में वापस रख दी, ज़ोर से। "अभी फेंक दे।"

"मैं फेंक दूँगा।" मैंने कहा। "पर एक बात — अगर भैरव इसे मेरे दरवाज़े पर रख सकता है, तो वो समझता है कि मैं डर जाऊँगा। और अगर मैं डर गया, तो कल मैं हार जाऊँगा।"

माँ मेरी तरफ़ देखती रहीं। देर तक। फिर उन्होंने शीशी मेरे हाथ से ली और चूल्हे में डाल दी। आग भड़की। काँच पिघलने की बदबू आई — तेज़, कड़वी, जैसे जली हुई हल्दी।

"अब सो जा।" उन्होंने कहा। "सुबह मुझे जल्दी उठना है।"

मैं लेट गया। पर नींद नहीं आई। आँखें बंद थीं और कान खुले थे। बाहर हवा चल रही थी। नीम की पत्तियाँ खड़खड़ा रही थीं। दूर कहीं कुत्ता भौंक रहा था। और उसी में कहीं, बहुत धीरे, वो सुर फिर बज रहा था। पर इस बार वो कुएँ की तरफ़ से नहीं आ रहा था।

वो मेरे ही सीने से आ रहा था।

मैंने आँखें खोलीं। छत देखी। उस पर मिट्टी के पुराने पैबंद थे, जो पापा ने बारिश में लगाए थे। मैं उन्हीं को देखता रहा जब तक सुबह नहीं हो गई।

सुबह मैंने पापा की धोती पहनी। उसमें आज भी वही गंध थी — पुरानी मिट्टी, थोड़ी-सी हल्दी, और चक्की के आटे की। माँ ने मेरे माथे पर तिलक लगाया। गुड़िया ने मेरी कलाई पर लाल धागा कसकर बाँधा। उसके हाथ काँप रहे थे।

"डर रही है?" मैंने पूछा।

"नहीं।" उसने ठुड्डी ऊपर की। "पर अगर तू गिरा, तो मैं दौड़कर आऊँगी और तुझे उठाऊँगी। सबके सामने।"

मैं हँसा। पहली बार दो दिन में।

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