Spirit of a Fighter – Chapter 37
मैंने कॉपी खोली। बड़े अक्षरों में लिखा था। मेरा गला भर आया।
"गुड़िया—"
"चुप रह।" वो बोली। "मैंने तेरी थाली में रोटी के टुकड़े डाल दिए हैं। जितने तूने आज तक नहीं खाए। खा ले।"
मैं हँसा। इस बार हँसी सच्ची थी।
"तू मेरी बहन कम, माँ ज़्यादा लगती है।"
"तो मान ले।" वो मुस्कुराई। "भैया, तू उन सबको पछाड़ दोगे, मुझे पता है।"
रात का खाना खत्म हुआ। गुड़िया सो गई। माँ कुछ देर बैठीं, फिर वो भी लेट गईं। पर मैं सो नहीं पाया। चारपाई पर लेटा, छत को देखता रहा। छत पर छिपकली बैठी थी, वो भी चुप।
तभी दरवाज़े पर हल्की दस्तक हुई।
मैं उठा। दरवाज़ा खोला।
टिंकू खड़ा था। उसके हाथ में एक छोटी मिट्टी की हांडी थी, और उसकी टोपी तिरछी हो रही थी।
"सो गया था?" उसने पूछा।
"नहीं।"
"अच्छा किया।" वो अंदर आया। "ये खीर है। मैंने खुद बनाई है। इसमें शक्कर कम है, नमक नहीं डाला — दोनों बार सोचा।"
मैंने हांडी पकड़ी। गरम थी।
"टिंकू, तू रोज़ आता है—"
"आज ज़्यादा ज़रूरी था।" वो बैठ गया। फिर सीधा मेरी तरफ़ देखा। "कल मैं तेरे साथ रहूँगा।"
"टिंकू, ये कुश्ती है, मिठाई की दुकान नहीं।"
"पता है।" उसने अपनी टोपी ठीक की। "मैं अखाड़े के किनारे खड़ा रहूँगा। और अगर तू हारा, तो मैं उसी मिट्टी में खुद उतर जाऊँगा। उस दिन तू मेरी खीर खा।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसकी आँखें हँस रही थीं, पर उसके हाथ काँप रहे थे।
"तू डर रहा है," मैंने कहा।
"बहुत।" उसने कबूल किया। "पर तेरे साथ डरना अलग बात है। अकेले डरना सहमना है, साथ में डरना हिम्मत है।"
मैंने खीर का पहला निवाला मुँह में डाला। मीठी थी। सच में मीठी।
"आज खीर ठीक बनी है," मैंने कहा।
"बस तेरे लिए ही ठीक बनी है। दुकान के लिए वाली में फिर नमक डाल दिया।" वो खिलखिलाकर हँसा।
हम दोनों हँसे। रात के सन्नाटे में हँसी अजीब लग रही थी, पर अच्छी लग रही थी।
टिंकू जाने लगा तो मैंने उसे रोका।
"टिंकू, एक बात।"
"बोल।"
"अगर कल मैं जीत गया, तो पहली मिठाई तेरी ही होगी। जीतने वाले पहलवान के मुँह में।"
टिंकू रुक गया। उसने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में कुछ चमका।
"भाई," उसने धीरे से कहा, "ये तूने बोल दिया, अब मत भूलना।" वो चला गया।
मैं वापस चारपाई पर लेटा। पर नींद नहीं आई। मैं उठकर दरवाज़े के पास बैठ गया। बाहर आँगन में चाँदनी थी। दीवार पर कोयले वाला लिखा अभी भी था — "अगली बार लालटेन नहीं, आग होगी।"
मैंने उसे देखा। मेरा गुस्सा फिर उभरा। मेरी उँगलियाँ मुट्ठी में बंध गईं।
तभी माँ की आवाज़ आई, पीछे से — "गुस्सा करके तू उसी की तरह बन जाएगा।"
मैं पलटा। माँ दरवाज़े पर खड़ी थीं।
"माँ, उसने गुड़िया की कॉपी फाड़ी है। मेरी बहन रोई है।"
"तो तू उसकी कॉपी फाड़ेगा?" वो मेरे पास आईं। "भैरव की ताकत उसके हाथों में नहीं, उसकी आदत में है। वो लोगों को डराकर चलाता है। अगर तू भी डर से लड़ा, तो तू भी वही हो जाएगा।" उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा। "गुस्सा रख, पर उसे हाथ की तरह इस्तेमाल कर। दिल की तरह नहीं।"
मैंने सिर हिलाया। माँ वापस जाने लगीं, फिर रुकीं।
"सुबह मैं अखाड़े आऊँगी," उन्होंने बिना पलटे कहा। "आज तक कभी नहीं आई। पर कल आऊँगी।"
"माँ—"
"बस।" वो चली गईं।
मैं सुबह तक जागता रहा। सोया नहीं, बस आँखें बंद करके लेटा रहा। और मन में वो बातें चलती रहीं जो कुएँ वाले आदमी ने कही थीं — "भैरव का ज़हर बनाने वाला मैं हूँ।"
जब सुबह की पहली किरण आई, मैं उठ चुका था। नहाया। धोती पहनी। बनियान पहनी। चप्पल पहनी — वही टूटी हुई। फिर सोचा, इसे बदल दूँ। पर फिर लगा, यही पहनूँगा। ये मेरी पहचान है।
आँगन में आया। माँ चूल्हे पर थीं। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा और बिना कुछ कहे रोटी पर घी लगाकर मेरी तरफ़ बढ़ाई।
"खा ले," उन्होंने कहा। "खाली पेट नहीं उतरना।"
मैंने खाया। दो रोटी। तीसरी माँ ने थमाई, मैंने मना किया। उन्होंने ज़बरदस्ती थमा दी। "खा।"
मैं हँसा। माँ के आगे किसकी चलती है।
गुड़िया दौड़ती हुई आई। उसने मेरी कलाई पर लाल धागा बाँधा।
"ये क्या है?"
"मैंने मंदिर से लिया है।" उसने गाँठ कस दी। "अब तू हार नहीं सकता।"
"गुड़िया, ये धागा जादू नहीं—"
"मुझे नहीं पता जादू क्या होता है।" वो बोली। "मुझे इतना पता है कि मेरा भैया कलाई पर ये बाँधकर लड़ेगा, तो घर में जो भी हो, मैं डरूँगी नहीं।"
मैंने उसे गले लगा लिया।
अखाड़े का रास्ता आज छोटा लग रहा था। मैंने चलते हुए सोचा — कल रात जब मैं इसी रास्ते से गुज़रा था, तो लालटेन जलाने की ज़रूरत थी। आज सूरज जल रहा था।
अखाड़े का गेट खुला था। और गेट पर लुट्टन खड़ा था।
उसके हाथ में लाठी थी। वो मुझे देखते ही मुस्कुराया — वो मुस्कान जो ताने वाली होती है।
"आ गया बाहर वाला।" उसने लाठी कंधे पर रखी। "भैरव सर ने कहा था तू आएगा। पर मैंने कहा — नहीं, ये तो डरकर भाग जाएगा।"
मैं उसके सामने आकर रुका।
"लुट्टन," मैंने कहा।
"हूँ?"
"तू रात को पसीने में तर होता है न?"
उसकी मुस्कान जम गई।
"क्या?"
"बाँह में झुनझुनी उठती है? सुबह देर से उठता है? और उठने के बाद भी थका लगता है?"
लुट्टन का चेहरा उतर गया। उसने लाठी कंधे से उतारी। "तू… तू बकवास कर रहा है।"
"मैं बकवास नहीं कर रहा।" मैंने उसकी आँखों में देखा। "तेरे पसीने की गंध बदल गई है, लुट्टन। मैं तुझे सुबह से जानता हूँ। पहले तेरे पसीने में नमक की गंध थी। अब उसमें कुछ और है। कुछ कड़वा। जो भैरव के मटके के पानी में है।"
लुट्टन पीछे हटा। उसका पैर पत्थर से टकराया और वो लड़खड़ाया। गिरा नहीं, पर लगभग।
अखाड़े में जो पहलवान कसरत कर रहे थे, रुक गए। सबने मेरी तरफ़ देखा।
एक पहलवान — जिसकी छाती पर पुराना निशान था — मेरे पास आया।
"लड़के," उसने कहा, "तूने अभी क्या कहा?"
"जो सच है।" मैंने उसकी तरफ़ देखा। "तू भी पीता है न? भैरव के हाथ से?"
उसका चेहरा कठोर हो गया। "तू ऐसा मत बोल—"
"तेरी बाँह में भी झुनझुनी है?" मैंने पूछा। "तेरे पसीने में भी वो कड़वाहट है?"
वो पीछे हटा। उसकी आँखों में डर था। और उस डर में सच था। वो चुप हो गया।
तभी भैरव बाहर आया। उसकी लाल धोती, तेल लगी मूँछें, और वो मीठी आवाज़।
"बेटा।" वो मुस्कुराया। "तू तो बड़ा होशियार निकला।"
वो मेरे चारों तरफ़ घूमा। धीरे-धीरे। जैसे दुकानदार सामान देखता है।
"मुझे लगा था तू गंध से बस मिट्टी पहचानता है।" उसने कहा। "पर तू तो पसीना भी पढ़ लेता है। बहुत खूब।" उसकी आवाज़ में तारीफ़ थी, पर आँखें कुएँ जैसी ठंडी। "पर बेटा, ताकत तो सबमें है, फर्क सिर्फ़ यह है कि किसकी ताकत किसके हाथ में है।"
"मेरी ताकत मेरे हाथ में है," मैंने कहा।
भैरव हँसा। उसकी हँसी भारी थी।
"तो फिर दिखा दे।" वो अखाड़े की तरफ़ मुड़ा और ज़ोर से बोला, "सब सुनो! ये बाहर वाला लड़का कहता है कि हमारा पानी ज़हर है। तो कल सुबह, इसी मिट्टी में, ये लड़ेगा।" वो मेरी तरफ़ मुड़ा। "मेरे सबसे अच्छे पहलवान से। हार गया तो ये अखाड़ा तेरे लिए हमेशा के लिए बंद।"
अखाड़े में सन्नाटा छा गया।
"किससे लड़ूँगा?" मैंने पूछा।
भैरव मुस्कुराया। उसने अपना हाथ उठाया और अपनी तरफ़ इशारा किया।
"मुझसे।"
मेरे पेट में झटका लगा।
"तू मैनेजर है," मैंने कहा। "तू नहीं लड़ सकता।"
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno